बस्ती। जिले के प्रभारी मंत्री आशीश पटेल को विकास के लिए जनता याद करे या न करे, लेकिन इन्हें उस अन्याय के लिए अवश्य याद करेगी, जो इन्होंने 14 लोगों के मौत के जिम्मेदार जिला आबकारी अधिकारी को मात्र नोटिस की सजा देकर छोड़ दिया। यह सजा सुनाकर मंत्रीजी बैठक में हंसी का पात्र बनकर रह गए, बैठक के बाद लोग कहने लगे, कि ऐसा प्रभारी मंत्री, पहली बार देखा गया, जो इतने गंभीर मामले को इतने हल्के में लिया। लगता है, कि मानो, मंत्री और अधिकारी को इन मौतों का कोई दुख और अफसोस नहीं हैं, अगर होता तो एफआईआर दर्ज कराने का फरमान सुनाने के साथ निलंबित करवाने की बात करते, न कि नोटिस जारी करने का फरमान सुनाकर छोड़ देते। ऐसा करके मंत्रीजी ने 14 लोगों के मौत के परिवारों के जख्मों पर मरहम लगाने के बजाए नमक लगाने का काम किया। इससे मरे हुए लोगों की आत्मा को शांति भी नहीं मिली होगी। मंत्री और अधिकारी से अधिक विधायक दयाराम के सहयोगी फूलचंद्र श्रीवास्तव और एमएलसी प्रतिनिधि हरीश सिंह को अफसोस और दुख हुआ, अगर न हुआ होता तो मंत्रीजी से सवाल न करते, लेकिन इन्हें क्या मालूम था, सवाल सुनकर मंत्रीजी को गुस्सा आने के बजाए उनका ही मजाक उड़ाने लगेंगे। ऐसा लगता था, कि मानो, इन्होंने मंत्रीजी से सवाल पूछ कर कोई गुनाह कर दिया हो, कि जब होली के दिन शराब की दूकान बंद थी तो फिर कैसे शराब पीकर रोड एक्सीडेंट में इतने लोगों की मौतें हुई? मंत्रीजी की बेशर्मी तो देखिए, अधिकारी के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने के बजाए, सवाल पूछने वाले विधायक के सहयोगी को ही अपमानित कर दिया, कहा कि फूलचंद्र जी घबराए नहीं आप की व्यवस्था जिला पंचायत अध्यक्ष संजय चौधरी कर देंगे, मंत्रीजी का इशारा दारु और पैसे से था। पहले तो फूलचंद्र को समझ में नहीं आया, लेकिन जब हरीश सिंह ने इसे लेकर मंत्रीजी को हथौड़ा, तब फूलचंद्र श्रीवास्तव के समझ में आया, कि मंत्री ने उनका सम्मान नहीं बल्कि एक शीशी बंटी और बबली समझने वाला विधायक का सहयोगी समझा। जिला आबकारी अधिकारी भले ही बाद में मंत्रीजी को और अन्य को चाहें जितना सफाई दें, कि शासन की ओर से ही चार बजे दिन से दुकान खोलने का आदेश था। लेकिन आबकारी अधिकारी को शायद यह नहीं मालूम कि जितने भी रोड एक्सीडेंट में मौतें हुई, वे सभी दिन के चार बजे से पहले हुई। हालांकि आबकारी अधिकारी को इसकी भारी कीमत त्यौहारी के रुप में चुकानी पड़ी, लेकिन वह कीमत उन्होंने वेतन से नहीं बल्कि उन दुकानदारों से वसूलकर चुकाया, जिन दुकानों के खुले रहने से मौतें हुई।

मंत्रीजी भी खुश और विभाग के अधिकारी भी खुश। दुख में वह परिवार रहा, जिसने अपनों को खोया। जिला आबकारी अधिकारी के द्वारा एक भी दुकानदार के खिलाफ कार्रवाई न करना, यह बताता है, कि 14 लोगों की मौत का और कोई नहीं बल्कि जिला आबकारी अधिकारी ही जिम्मेदार है। कहा जा रहा हैं, जब जिला आबकारी अधिकारी और उनकी टीम प्रत्येक कंपोजिट दुकानों से पांच-पांच हजार और देशी के दुकानों से दस-दस हजार महीना वसूलेंगे, तो दारु की दुकानें होली के दिन खुलेगी ही। होली की त्यौहारी वसूलने में टीम मस्त रही। यही वसूली मंत्रीजी को त्यौहारी के रुप में देने का दावा विभाग के लोगों के द्वारा किया गया। अब आप लोग समझ गए होगें कि मंत्रीजी के नजर में मौत की कीमत क्या है? इस मामले में प्रशासन को भी उतना ही दोशी माना जा रहा है, जितना मंत्री और जिला आबकारी अधिकारी को। अगर प्रभारी मंत्री ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं किया, तो प्रशासन ने भी नहीं किया। मीडिया बार-बार उन जनप्रतिनिधियों के सहयोगियों को सलाह देती आ रही है, कि जब भी बैठक में जाएं पूरा होम वर्क करके जाएं, वरना फूलचंद्र श्रीवास्तव जैसा अपमानित होना पड़ेगा। सहयोगी बने इतने साल हो गए, लेकिन इन लोगों को अब तक यह सलीका नहीं आया कि किस तरह सवालों के जाल में मंत्रियों और अधिकारियों को फंसाया जा सकता। जनप्रतिनिधियों को भी इस बात का पूरा ध्यान रखना होगा, कि वह ऐसे को अपना सहयोगी बनाए, जो हरीश सिंह जैसा हो। गलती, सहयोगियों की नहीं बल्कि उनके आकाओं की है, जो ऐसे लोगों को अपना सहयोगी बना देते हैं, जिनका अभाव नेताओं जैसा नहीं होता, कहा भी जाता हैं, कि जो सहयोगी डीएम को झुक कर लगाम करें, और तब तक करता रहे, जब तक साहब देख न लें, वह किसी का भी सहयोगी बनने के लायक नहीं होता। जो सहयोगी सवाल-जबाव न कर सके, उसे बैठकों में भाग लेने का कोई अधिकार नही। बीडीए के सदस्यों की तरह इनकी भी भूमिका चाय समोसा तक ही रह जा रही है। जो सहयोगी जनहित और भ्रष्टाचार का मुद्दा नहीं उठा सकता, उसे सहयोगी बनने का कोई अधिकार नहीं है। वैसे भी देखा जाए, हरीश सिंह को छोड़कर अन्य सहयोगी मंत्री और अधिकारियों के कृपा से बैठकों में चाय-समोसा के हकदार हो जातें है। वरना, सरकार ने तो इन पर सरकारी बैठकों में भाग लेने पर प्रतिबंध लगा रखा है।