बस्ती। मंडल मुख्यालय के सदर तहसील में अगर एसडीएम और तहसीलदार का नहीं बल्कि प्राइवेट मुंशीओ का सिक्का चलता है, तो भ्रष्टाचार चरम पर होगा ही, तब न्याय बिकेगा, पत्रावलियां गायब होगा, ग्राम समाज की जमीनें बिकेगी और मनचाहे फैसले होगें। सवाल उठ रहा है, कि आखिर इसके लिए कौन जिम्मेदार? सरकार या फिर वह अधिकारी जो प्राइवेट मुंशियों के भरोसे कोर्ट छोड़ देते हैं। अगर सदर तहसील में अन्य तहसीलों की अपेक्षा सबसे अधिक भ्रष्टाचार व्याप्त हैं, तो उसका सबसे बड़ा कारण तहसील का मुंशियों के हवाले करना।  भ्रष्टाचार के खिलाफ निरंतर आवाज उठाने वाले अधिवक्ता दिलशाद हसन खान ने इसकी शिकायत डीएम से करते हुए प्राइवेट मुंषियों के खिलाफ अभियान चलाकर उनके विरुद्व कानूनी कार्रवाई करने की मांग की है। कहा कि सदर तहसील में कार्यालयों और न्यायालयों में अवैध रुप से प्राइवेट मुंशी कार्य कर रहे हैं, जिसके कारण व्यापक पैमाने पर भ्रष्टाचार व्याप्त है। हालत यह है, कि कई ऐसे मामले होते हैं, जिसका निस्तारण करने के लिए साहब की आवष्यकता ही नहीं पड़ती, और मुंषी उसे अपने स्तर से निस्तारित कर देते है। अब जरा अंदाजा लगाइए, कि जिसका निस्तारण एसडीएम और तहसीलदार स्तर से होना है, और अगर उसका निस्तारण मुंशी स्तर से होता है, तो निस्तारण की गुणवत्ता कैसी होगी? इसे आसानी से समझा जा सकता है। फरियादियों को साहबों से अधिक मुंशीयों से खतरा रहता है, यह मुंशी कब विपक्षी से मिलकर उसके प़क्ष में फैसला कर या करवा दें, पता ही नहीं चलता। प्राइवेट मंुशी से वह अधिवक्ता सबसे अधिकर परेशान होते हैं, जो अपना काम ईमानदारी से करते हैं, जो अपने मुवक्किल के प्रति ईमानदार होते है। ऐसे अधिवक्ताओं का कहना है, कि जिस तरह सदर तहसील में मुंशियों के जरिए न्याय बिकता हैं, उसने सारी हदें पार कर दी है। खुले आम इच्छित फैसले के लिए बोली लगाई जाती है, जिसने अधिक बोली लगाई, उसके पक्ष में ठीक उसी तरह फैसला होता है, जिस तरह चकबंदी न्यायालयों में होता है। यह भी सही है, कि अगर मुंशी न रहें तो कोई न्यायालय चल ही नहीं सकता, अधिकारीगण मुंशियों पर इतना निर्भर हो गए हैं, कि वह बिना मुंशी के कुछ कर ही नहीं पाते। सदर तहसील के भ्रष्टाचार का मुद्वा उठाने वाले दिलशाद हसन पहले अधिवक्ता नहीं हैं, इनसे पहले न जाने कितने अधिवक्ता प्राइवेट मुंशीयों के विरुद्व आवाज बुंलंद कर चुके हैं, लेकिन भ्रष्टाचार के आगे उनकी आवाज दबकर रह गई। सवाल उठ रहा है, कि कमिष्नर, डीएम, एडीएम और एसडीएम मिलकर मंडल मुख्यालय के तहसील को भ्रष्टाचारमुक्त नहीं कर सकते, तो फिर कौन करेगा? यह सवाल उन लोगों के लिए जो पीड़ित हैं, और जो यह सोचकर भाजपा को सत्ता में लाए कि अब उन्हें भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल जाएगी, लेकिन उन्हें क्या मालूम था, जो विष्वास उन्होंने भाजपा पर किया, वह कितना गलत साबित हुआ। समाज के विभिन्न वर्गो के द्वारा जिस तरह योगीजी को थानों और तहसीलों को भ्रष्टाचारमुक्त बनाने के लिए पत्र लिखे जा रहे हैं, उसे देखते हुए कहा जा सकता है, 2027 भाजपा का सत्ता में आना आसान नहीं होगा, क्यों कि योगीजी थानों और तहसीलों से भ्रष्टाचार को समाप्त करने में बुरी तरह से नाकाम साबित हुए है। इसका खामियाजा प्रदेश की जनता तो भुगत चुकी है, लेकिन भाजपा को भी भुगतना होगा। ऐसा जानकारों का कहना और मानना है।