बस्ती। जिले में यह कैसी ऐसी व्यवस्था हैं, जहां पर पीड़ितों को न्याय अधिकारियों के जनता दरबार, तहसील दिवस और थाना दिवस में नहीं बल्कि आत्महत्या की नोटिस देने और टावर पर चढ़ने के बाद मिलता है। जिस व्यवस्था में न्याय पाने के लिए लोगों को हाईकोर्ट का चक्कर लगाना पड़े, उस व्यवस्था को किसी भी हालत में अच्छा नहीं कहा जा सकता। गांव-गढ़ी से एक आम आदमी पैसा और समय खर्च कर इस लिए गोरखपुर और लखनउ योगीजी से मिलने जाता है, कि जो न्याय जिले के अधिकारी नहीं दे सकें, वह सूबे के मुखिया अवष्य दिलाएगें। धक्के खाकर जब पीड़ित किसी तरह योगीजी के पास पहुंचता तो उसकी बात सुनने के बजाए उसके प्रार्थना पत्र को बगल में खड़े अधिकारी को थमा दिया जाता है। सवाल उठ रहा है, कि एक आम आदमी इस लिए धक्का खाकर योगीजी से मिलने नहीं जाता कि वह एक मिनट भी नहीं देगें। वह इस लिए नहीं जाता कि उसके आवेदन को दूसरे को फारवर्ड कर दिया जाए। योगीजी जब किसी की पीड़ा सुनेगें ही नहीं तो उन्हें कैसे पता चलेगा कि कौन सा फरियादी कितना दुखी और परेषान है। यही नहीं जब योगीजी के पास से आवेदन अधिकारी के पास जाता है, तो उस पर नियमानुसार कार्रवाई करने वाला मोहर लगाकर जिले के संबधित उसी अधिकारियों के पास भेज दिया जाता है, जहां से वह निराष होकर योगीजी के पास गया था। यही कारण है, कि अब लोगों का जनता दरबार, थाना दिवस और तहसील दिवस और योगीजी के प्रति मोह भगं होता जा रहा है। जो तहसीलों और आईजीआरएस में षिकायतें की जाती हैं, उनमें अधिकांश में फर्जी रिपोर्ट लगा दिया जाता है। सबसे बड़ा सवाल यह है, कि अगर एक आम व्यक्ति न्याय पाना चाहें तो उसे कैसे और कहां से मिलेगा? रही बात भाजपा के नेताओं और विपक्ष के नेताओं की तो लगता ही नहीं कि जिले में पक्ष या विपक्ष नाम की कोई चीज भी है। जिस जिले में एक भाजपा कार्यकर्त्ता की लड़ाई का साथ उसके ही नेता न दे, तो समझ लेना चाहिए, कि किसी को किसी की कोई परवाह नहीं।
आजकल आप लोग जो टावर पर चढ़कर न्याय मांगने का चलन देख रहे हैं, यह यूंही नहीं हुआ, अगर एक गरीब महिला जान को जोखिम में डालकर टावर पर इस लिए चढ़ती है, ताकि वह अधिकारियों और मीडिया का ध्यान अपनी समस्याओं की ओर आकर्षित कर सके। अगर कोई व्यक्ति या महिला न्याय पाने के लिए आत्महत्या करने जैसा जघन्य अपराध करने पर मजबूर होता/होती है, तो यह भाजपा सरकार की यह सबसे बड़ी हार मानी जाएगी। जो सरकार अपने ही जनता के जानमाल की रक्षा न कर सके, उस सरकार को रहने का कोई अधिकार नहीं। इसी तरह अगर कमिशनर डीआईजी, डीएम और एसपी किसी पीड़ित को न्याय नहीं दिला सकते, उसका मुकदमा नहीं दर्ज करवा सकते तो ऐसे अधिकारियों के होने और न होने का क्या मतलब? जब भी कोई फरियादी तहसील दिवस से निकलता है, और मीडिया उससे पूछती है, कि बाबा यहां पर आकर आपको एसडीएम, तहसीलदार और नायब तहसीलदार से न्याय मिला कि नहीं? जबाव सुनकर आखों में आसूं आ जाता है। कहते हैं, कि यहां पर उसी को न्याय मिलता है, जिसके पास पैसा होता हैं, उसी की सुनी जाती है, जो धन और बल से मजबूत होता है। हम जैसे लोगों को तो तहसील वाले जानवर की तरह समझते हैं, जिस तरह कुत्ते को भगाया जाता है, उसी तरह हम लोगों को भगा दिया जाता है। इस लिए भगा दिया जाता है, क्यों कि हमारे पास पैसा नहीं होता? जिस तहसीलों में एक आम आदमी को कुत्ते की तरह व्यवहार किया जाता हो, उस तहसील में भ्रष्टाचार नहीं पनपेगा तो क्या पनपेगा? धूस लेते कानूनगो और लेखपाल नहीं पकड़े उजाएगें तो कौन पकड़ा जाएगा? व्यवस्था से निराश और हतास होकर लोग टावर पर चढ़कर अपनी बात कह रहे हैं। अधिकारियों के भीतर पीड़ितों को लेकर जो असंवेदनशीलता नजर आ रही है, उसे लेकर चिंता जताई जा रही है। अधिकारियों का संवेदनशील होना अति आवश्यक है। संवेदनशील होगें तभी तो दूसरे की पीड़ा को समझ सकेगें। कहा भी जाता है, कि अगर कोई डीएम और एसपी चाह जाए और पीड़िता/पीड़ित को न्याय न मिले हो ही नहीं सकता। न्याय सिर्फ एक आदमी को ही नहीं मिल रहा है, बल्कि पत्रकारों को भी नहीं मिल रहा है। लोग सवाल भी करते हैं, कि जब समाज के चौथे स्तंभ को न्याय नहीं मिलेगा को किसे मिलेगा? आप लोग यह कत्ताई न समझिए कि टावर पर चढ़कर न्याय मिल जाएगा, न्याय तो नहीं मिलेगा, अलबत्ता जेल जाना पड़ सकता है।
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