बस्ती। अगर नवागत एडीएम ज्ञानचंद्र गुप्तजी, मैडम का अपनी कार्यशैली से भरोसा और दिल जीत लिया तो इन्हें उसका पुरस्कार मिल सकता है। स्थानीय निकाय और बीडीए का प्रभार मिल सकता है, वैसे भी जिसके लिए इतना उथलपुथल हुआ, वह तो चले गए, इस लिए स्थानीय निकाय का प्रभार गुप्ताजी को मिलने की संभावना जताई जा रही है, हो सकता है, कि बीडीए का प्रभार सीआरओ के पास ही रहें, लेकिन स्थानीय निकाय का प्रभार नियमानुसार एडीएम को मिलना चाहिए। वैसे सबकुछ मैडम पर निर्भर करता है। लेकिन कहना गलत नहीं होगा, कि सीआरओ के लिए नवागत एडीएम एक तरह से खतरा बनकर आ रहे है। ध्यान देने वाली बात यह है, कि सीआरओ किर्ती प्रकाष भारती, नवागत एडीएम से तीन साल सीनियर है। ज्ञानचंद्र गुप्तजी 2018 बैच के पीसीएस हैं, और किर्ती प्रकाश 2015 बेैच के। कहा जा रहा है, कि ‘पढ़ा कम और गढ़ा’ हुआ अधिक एडीएम आ रहे है। इसका आशय यह हुआ कि एडीएम साहब, नायब तहसीलदार और तहसीलदार से प्रमोटकर एडीएम बने, सीआरओ साहब डायरेक्ट है। गुप्ताजी रायबरेली, गोंडा, आजमगढ़ में एसडीएम और लखनउ में सिटी मजिस्टेट रह चुके हैं।। सीआरओ साहब डायरेक्ट है। जिले का इतिहास रहा हैं, कि जब भी जिले में कोई प्रमोटी डीएम या एडीएम आएं हैं, उन्होंने जिले को खूब अच्छी तरह चलाया, इसके पीछे उनका अनुभव काम करता रहा। उनके भीतर आईएएस या पीसीएस का इगो नहीं रहता। उनका जो निर्णय होता है, उनमें एक अनुभव अधिकारी का झलक दिखता है। सबसे अधिक खास बात यह है, कोई उन्हें बेवकूफ नहीं बना सकता, अब आाप अंदाजा लगाइए, कि जिस व्यक्ति के पास नायब तहसीलदार, तहसीलदार और एसडीएम के कामकाज का अनुभव रहता है, उससे कोई गलती हो ही नहीं सकता, और न उनका अधीनस्थ बेवकूफ ही बना सकता, बन जाए वह अलग बात है। इसी तरह अगर एसडीएम से डीएम पर प्रमोट करता है, तो वह कभी प्रशाससनिक मामले में फेल नहीं हो सकता। सबसे सफल अधिकारी प्रमोटी ही होते हैं, इसका अनुभव जिले के मीडिया को बहुत है। अगर एक आम किसी डीएम और एडीएम की कार्यशैली से असंतुष्ट रहता है, तो उस अधिकारी को इस बात की समीक्षा करनी चाहिए, कि क्यों जनता उससे असंतुष्ट है? चूंकि अधिकारियों ने खुद के बारे में समीक्षा करना बंद कर दिया, इसी लिए अंसतोष की भावना पनपती। जिस तरह के अब तक माहौल रहा उसे देखते हुए नवागत एडीएम की जिम्मेदारी बढ़ गई, इन्हें अपने अनुभव का पूरा इस्तेमाल करना होगा, और ऐसा माहौल बनाना होगा, कि लोगों को यह लगे कि जैसे कुछ हुआ ही नहीं। लोगों को अपने दायरे में रहकर काम करना होगा, पत्रकार और नेताओं के साथ बैठकी कम करनी होगी, सभी का सम्मान करना होगा। हालांकि एडीएम के जाने के बाद हो सकता है, कि कुछ पत्रकारों और नेताओं को पहले जैसा माहौल न मिले। जिन अधिकारियों ने पत्रकारों और नेताओं के साथ अधिक बैठकी की, वे विवादित रहे। इसका उदाहरण निवर्तमान एडीएम के रुप में देखा जा सकता है। कहना गलत नहीं होगा, कि यही बैठकी इनके लिए घातक साबित हुई। जाहिर सी बात है, जब अधिकारी पत्रकारों और नेताओं के बीच घिरा रहेगा, तो इधर-उधर की बात निकलेगी ही, और उसी में कुछ ऐसी बाते भी निकल कर आती है, जो बाद में बैठकी लगाने वाले अधिकारी के नुकसानदायक साबित होता है। एडीएम साहब उन कर्मचारियों को भी एक सबक सीखा गए हैं, कि अगर काम से मतलब नहीं रखा और राजनीति किया तो उसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। बार-बार कहा जा रहा है, कि जिस तरह से एडीएम कार्यालय की गदंगी साफ हुई, उसकी आवष्यकता महसूस की जा रही थी, एडीएम कार्यालय न हो कर ठेकेदारों का जमावड़ा हो गया था। इस कार्यालय को खराब करने वाले स्टेनो और उनके सजातीय ठेकेदार ही रहे। इधर सीआरओ साहब ने नगर पंचायतों और पालिका क्षेत्रों का दौरा कर ही रहे थे, और उन्हें दौरा करने में मजा भी आ रहा था, तभी नवागत एडीएम का प्रवेश हो गया।
चारों ‘एडीएम’ को मिली ‘सजा’
ध्यान देने वाली बात यह है, कि बस्ती के एडीएम सहित जिन चार एडीएम का तबादला हुआ, उनके किसी को जिला नहीं मिला, सभी को सजा के तौर पर अपर आयुक्त बना दिया गया। कहा जाता है, कि जिन चारों एडीएम का तबादला हुआ, वह षिकायत के चलते हुआ। किसी के खिलाफ डीएम ने डीओ लिखा था, तो कोई अपने दायित्वों का निवर्हन नहीं कर रहा था। नेतागिरी के चलते कईयों को सजा भुगतनी पड़ी। जिन एडीएम को सजा के तौर पर अपर आयुक्त बनाकर भेजा गया, उनमें कुंवर पंकज एडीएम एफआर महोबा से झांसी अपर आयुक्त, सत्यप्रकाश सिंह एडीएम मेरठ से अपर आयुक्त लखनऊ, त्रिभुवन सिंह एडीएम बदायूं से अपर आयुक्त प्रयागराज और प्रतिपाल सिंह एडीएम बस्ती से अपर आयुक्त विंध्याचल।
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