बस्ती। ब्राहृमण समाज के लोग पूछ रहे हैं, कि है, को ब्राहृमण महासभा में ऐसा माई का लाल जो महामंत्री को उनके पद से हटा सके, जबाव न में ही मिलेगा। इसका मतलब यह हुआ कि महामंत्री को लोगों ने अजेय मान लिया है। सच तो यह है, कि लोग अपनी कुर्सी को बचाने के लिए महामंत्री पर ब्राहृमशास्त्र नहीं चला रहे है। महामंत्री ने एक तरह से लोगों के मन में एक डर पैदा कर रखा है, कि अगर किसी ने निकालने की बात कही, तो वही निकल जाएगा। इतने सालों से एक व्यक्ति पूरी कार्यकारिणी और ब्राहृमण महासभा को ब्लैक मेल कर रहा है, और जिम्मेदार इस लिए चुप है, कि उसके पास बहुमत है। सवाल उठ रहा है, कि आखिर ब्राहृमण महासभा के लोग कब तक ब्जैक मेल होते रहेंगंे, दूसरा सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है, आखिर महामंत्री को अजेय बनाया किसने? कैसे यह इतनाशक्तिशाली हो गया कि कोई इन्हें हटा ही नहीं सकता है। क्या अध्यक्षजी भी महामंत्री के सामने अपने आपको असहाय मान रहे है? अगर अध्यक्षजी असहाय महसूस कर रहे तो फिर ब्राहृमण महासभा को बर्बाद होने से कोई बचा नहीं सकता है। जो व्यक्ति अपने आप को अजेय समझ रहा हो, वह व्यक्ति हिसाब दे या न दे, उसके लिए क्या फर्क पड़ता है। जब मौका मिला था, तो उसे माफ कर दिया गया, और अब बर्खास्त करने की बातें कर रहे हैं, अगर इतनी बड़ी संस्था इस बात से डरेगी कि महामंत्री कोर्ट चला जाएगा, तो ऐसी संस्था की कार्यकारिणाी को त्वरित भंग कर देना चाहिए, अगर इस बात का डर लग रहा है, कि चुनाव हो गया तो फिर उसी के लोग हावी हो जाएगें, तो सभी को इस्तीफा दे देना चाहिए। अगर एक व्यक्ति की इच्छा और अनिच्छा से संस्था का संचालन होने लगे, तो हर संस्था में षंभूनाथ मिश्र जैसे लोग दिखाई देगें। कितना अजीब लग रहा है, कि एक व्यक्ति पिछले 24 साल से सभी को अपने इशारे पर नचा रहा है, और महारथी लोग नाच भी रहे है। तभी तो बृजवासी लाल शुक्ल ने लिखा है, कि दोषियों को तत्काल ब्राहृमण महासभा से निष्कारित कर देना चाहिए, और उन लोगों को सबसे पहले इस्तीफा देना चाहिए, जिनके संरक्षण में इतने सालों से ब्राहृमण महासभा को लूटने का कार्य किया गया, क्यों कि दोषी सिर्फ महामंत्री और कोषाध्यक्ष ही नहीं हैं, बल्कि पूरी राष्टीय कार्यकारिणी दोषी है। बचाने वाले वे लोग दोषी हैं, जो अभी तक आंख बंद किए हुए थे, कहते हैं, कि अगर ब्राहृमण महासभा को बचाना है, तो तत्काल कार्यकारिणी को भंग कर नई कार्यकारिणी का गठन करना चाहिए। जो लोग आडिट कराने के लिए अध्यक्ष जी को बधाई दे रहे हैं, उन्हें यह भी सोचना चाहिए, कि इन्हीं अध्यक्ष के कारण हर साल होने वाला आडिट नहीं हो पाया, अगर अध्यक्षजी चाहे होते तो बाइलाज के अनुसार हर साल आडिट कराते, लेकिन यह तब जागे, जब लोगों ने इन्हें जगाया, अगर हर बार अध्यक्षजी को जगाना पड़ेगा तो काम हो चुका है, क्या अध्यक्ष की यह जिम्मेदारी नहीं बनती थी, कि हर साल आडिट कराते, क्यों 22 साल बाद आडिट कराने का निर्णय लिया गया, वह भी चिल्लाने पर, अगर लोग नहीं चिल्लाते तो आडिट कभी होता ही नहीं। अब तो लोग यह कहने लगें कि अगर महामंत्री बेलाम हुए हैं, तो इसमें अध्यक्षजी का भी दोष है। कार्यकारिणी को भंग करना वही लोग नहीं चाहते जिन्हें यह डर है, कि अगर कहीं चुनाव हो गया तो उनका पत्ता कहीं साफ न हो जाए। लोगों को अभी भी यह आशंका है, कि आठ सितंबर से आडिट षुरु हो पाएगा कि नहीं, या फिर कोई बहाना बनाकर तारीख बढ़ा दी जाएगी। सच तो यह है, कि महामंत्री कभी नहीं चाहेगें कि आडिट हो, आडिट होने का मतलब महामंत्री को निकालने का आधार मिल जाएगा, और यह मौका महामंत्री कभी देगें नहीं। अब तो लोगों का जोश भी ठंडा पड़ता जा रहा हैं, सुर तो पहले ही बदल गया था, कहने का मतलब महामंत्री की रणनीति सफल होती जा रही है। महामंत्री को अच्छी तरह मालूम हैं, कि कोई उसे हटा नहीं सकता, और न कार्यकारिणी ही भंग हो सकती है। दोनों ही सूरतों में लाभ तो महामंत्री एंड टीम को ही मिलने वाला है।
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