हापुड़ में 5 अस्पताल पैनल से बाहर,कई अस्पतालों में घपला किए जाने के आरोप
ओमप्रकाश गौतम
दुनिया की सबसे बड़ी सरकारी स्वास्थ्य बीमा योजना कही जाने वाली आयुष्मान भारत - प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PM-JAY) में भ्रष्टाचार का बड़ा नेटवर्क सामने आ रहा है। 5 लाख रुपये तक के मुफ्त इलाज का वादा करने वाली इस योजना में फर्जी कार्ड से लेकर फर्जी भर्ती और फर्जी बिल तक के मामले लगातार उजागर हो रहे हैं। जिम्मेदार और सिस्टम की अनदेखी के चलते गरीब मरीजों को शिकार बनाए जाने के लगातार आरोप लग रहे है।
कैसे बनते हैं फर्जी कार्ड?
ताजा जांच में सबसे बड़ा तरीका फैमिली आईडी में हेरफेर का निकला है। लखनऊ में STF ने ऐसे गिरोह का भंडाफोड़ किया जो साइबर कैफे और जन सेवा केंद्रों (CSC) के जरिए काम करता था। पात्र परिवारों की फैमिली आईडी में OTP बायपास करके अपात्र लोगों को जोड़ दिया जाता था। फिर नोडल एजेंसी ISA और SHA स्तर पर सेटिंग से कार्ड अप्रूव करा लिया जाता था।
पूछताछ में सामने आया कि जालसाज प्रति कार्ड 800 रुपये से लेकर 6000 रुपये तक वसूलते थे। इसमें से 1000 से 1500 रुपये ISA में अप्रूवल के लिए और 4500 से 5000 रुपये SHA स्तर पर बांटे जाते थे। लखनऊ, प्रयागराज, बाराबंकी, प्रतापगढ़ से इस मामले में 10 आरोपी गिरफ्तार हो चुके हैं और 2000 से ज्यादा फर्जी कार्ड बनाए जाने की बात कबूल की गई है। निजी अस्पतालों के आयुष्मान मित्र ही जिले के मिसमैच को ठीक करके फर्जी कार्डों से इलाज दिखा देते थे।
अस्पतालों के बिल में घोटाला
बड़ा घोटाला निजी अस्पतालों के स्तर पर है। उत्तर प्रदेश में ही 1 मई से 22 मई 2025 के बीच 6239 फर्जी लाभार्थियों के नाम पर 39 निजी अस्पतालों को 9 करोड़ 94 लाख रुपये का भुगतान कर दिया गया। जांच में पता चला कि लेखाधिकारी, वित्त प्रबंधक और CEO की लॉगिन ID का दुरुपयोग कर रात के समय भुगतान किया गया था, बिना किसी मेडिकल ऑडिट के।
बरेली में भी इसी तरह का पैटर्न मिला, जहाँ दलाल 15 से 20 हजार लेकर बिना पात्रता सूची के कार्ड बनवा देते हैं, जबकि असली गरीब महीनों तक चक्कर काटते हैं। हिमाचल प्रदेश में तो ईडी को छापेमारी करनी पड़ी। वहां 25 करोड़ की धांधली में 370 से ज्यादा फर्जी कार्ड और 140 बैंक खातों के जरिए लेन-देन का पता चला था, जिसमें 88 लाख नकद जब्त हुआ था।
मरीज से दोहरी वसूली
भोपाल और इंदौर के मामलों में एक नया ट्रेंड सामने आया है। कार्ड होने के बावजूद प्राइवेट अस्पताल मरीज को डराकर नकद वसूल लेते हैं। भोपाल के एक मरीज से बायपास सर्जरी के नाम पर 4 लाख रुपये नकद ले लिए गए, जबकि आयुष्मान में हार्ट पैकेज अधिकतम 1.5 लाख रुपये का है। मध्य प्रदेश के डिंडोरी में तो बिना अनुमति के सरकारी अस्पताल में ही कैंप लगाकर मोतियाबिंद ऑपरेशन के नाम पर लोगों के आधार और आयुष्मान कार्ड का डेटा इकट्ठा किया जा रहा था, ताकि बाद में उनके नाम पर फर्जी क्लेम किया जा सके।
हापुड़ में बड़ा झटका: 5 अस्पताल पैनल से बाहर,कई पर घोटाले के आरोप
इसी फर्जीवाड़े की कड़ी में हापुड़ में आयुष्मान योजना को बड़ा झटका लगा है। जिले के पांच बड़े निजी अस्पतालों को आयुष्मान पैनल से बाहर कर दिये गये थे। इनमें न्यू लाइफ, सन शाइन, कृपालु, अंबे और आयुष्मान अस्पताल शामिल हैं। इसके अलावा हापुड़ निजी अस्पतालों में सिस्टम की अनदेखी के चलते पीएम आयुष्मान योजना को मजाक बनाया जा रहा है। मरीजों के इलाज में भारी घपला कर चर्चाओं में है।
अब इन अस्पतालों में आयुष्मान कार्डधारकों को मुफ्त इलाज की सुविधा नहीं मिल सकेगी। जिले में करीब 3.50 लाख पात्र परिवार इस कार्ड से इलाज करा रहे हैं, जबकि स्वास्थ्य विभाग का लक्ष्य 5.15 लाख परिवारों तक पहुंचने का है। एक साथ पांच अस्पतालों के बाहर होने से खासकर उन मरीजों की परेशानी बढ़ गई है जिनका इलाज पहले से इन अस्पतालों में चल रहा था। उन्हें अब दूसरे पैनल वाले अस्पतालों का रुख करना पड़ेगा।
स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक, अस्पतालों में योजना के नियमों का पालन, उपचार की गुणवत्ता और अभिलेखों की जांच में खामी मिलने पर पैनल से हटाने की कार्रवाई की जाती है।
क्यों हो रहा है ये घोटाला?
विशेषज्ञ तीन कारण गिनाते हैं:
1. वेरिफिकेशन की कमी:SECC 2011 की पुरानी लिस्ट और फैमिली ID सिस्टम में OTP बायपास जैसी तकनीकी खामी।
2. अंदरूनी मिलीभगत:ISA और SHA एजेंसियों के कर्मचारियों का हिस्सा तय होना।
3. ऑडिट में देरी: अस्पतालों के क्लेम का फिजिकल ऑडिट न होना, सिर्फ पोर्टल पर अप्रूवल।
सरकार ने अब सर्वर लॉग, IP एड्रेस ट्रेसिंग और अस्पतालों के बैंक खातों की जांच शुरू की है। कई अस्पतालों के भुगतान पर रोक लगा दी गई है और FIR दर्ज कर साइबर सेल जांच कर रही है। लेकिन जब तक बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन, जियो-टैगिंग और रियल टाइम ऑडिट अनिवार्य नहीं होगा, तब तक गरीब के नाम का पैसा बिचौलियों की जेब में जाता रहेगा।
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