बस्ती। खाद की कालाबाजारी और भ्रष्टाचार पर तब तक अंकुश नहीं लग सकता हैं, जबतक एआर को आपरेटिव और जिला कृषि अधिकारी सौ रुपया बोरी कमीशन लेते रहेंगे। किसान चिल्लाता रह जाता है, कि खाद के भ्रष्टाचारी एआर और डीओ को हटाइए, लेकिन किसानों की सुनने वाला कोई नहीं। रही बात स्थानीय प्रशासन की तो अगर स्थानीय प्रशासन और विकास भवन चाहे जाए तो एक बोरी यूरिया इधर से उधर नहीं हो सकता। 100 $पया बोरी कमीशन लेने की तो बात ही छोड़िए। स्थानीय प्रशासन और दोनों विभाग के अधिकारी अच्छी तरह जानते हैं, कि यूरिया की सबसे अधिक खपत हाईवे किनारे यूरिया पंपों पर होती हैं। उसके बावजूद अधिकारी इन पंपों की जांच नहीं कर रहे है, जांच करते भी है, तो ले-देकर छोड़ देते है। जिस यूरिया पंप में 300 रुपये की यूरिया 800 सौ में बेची जाएगी तो भ्रष्टाचार रुकेगा कैसे? अगर सचिव ने 100 रुपया दे भी दिया तो भी उसका एक बोरी में 400 रुपये का फायदा है। किसानों का कहना है, कि जब तक एआर और डीओ जिले में रहेगें, तब तक खाद की कालाबाजारी नहीं रुक सकती है। हैरानी होती है, कि जब दो आईएएस अधिकारी मिल कर दो जिला स्तरीय अधिकारी के भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लगा पा रहे है, तो जिले भर के सचिवों पर कैसे लगाम लगाएगें। दो अधिकारियों ने अपने सचिवों और बाबूओं के साथ मिलकर पूरे जिले के उर्वरक व्यवस्था को तहस नहस कर दिया। रही बात विभागीय मंत्री सूर्यप्रताप शाहीजी की तो इन्हीं के चलते ही आज प्रदेश भर का किसान रो रहा है, और अधिकारी माल काट रहे है। वैसे देखा जाए तो जिले भर की समितियों पर खाद की कालाबाजारी हो रही है। लेकिन परसरामपुर ब्लॉक में सबसे अधिक यूरिया की कालाबाजारी हो रही, कारण, इस इलाके में सबसे अधिक यूरिया पंप का होना। सचिवों को यूरिया बेचने के लिए ग्राहक की आवष्यकता नहीं पड़ती, यूरिया पंप वाले चलकर उनके पास आते हैं, इस लिए आते हैं, कि जो यूरिया उन्हें 17 सौ रुपये में सरकार देती है, वही यूरिया भ्रष्ट सचिव आठ सौ में ही आराम से दे देते है। इसका खुलासा वैसे तो कई बार हो चुका है, लेकिन हाल ही में सीडीओ के निरीक्षण में परसरामपुर के खम्हरिया समिति में जो खुलासा हुआ, उससे दोनों विभागों की फिर सें पोल खोल दी, पांच-दस बोरी भी नहीं 1700 यूरिया की बोरी गायब मिली। 2000 में से मात्र 300 बोरी ही सीडीओ को स्टाक में मिला। अब यहां पर एआर ने एफआईआर के मामले में भी बड़ा खेल खेल दिया, वैसे इस तरह का खेल खेले में एआर औार डीओ दोनों को महारथ हासिल है। सीडीओ के आदेश के बाद भी एआर ने सचिवअंकुर सिंह के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं करवाया,इसके एवज में बताते हैं, कि इन्हें भारी रकम दी गई। समिति तो सील कर दिया और शायद सचिव को निलंबित भी कर दिया लेकिन जो सबसे बड़ी सजा एफआईआर की होती है, उसमें समझौता कर दिया। रही बात सील और निलंबन की तो वह भी पैसा लेकर बहाल हो जाएगा और सील खुल जाएगी। सचिव अंकुर सिंह के पिता चंद्रभूषण सिंह भी हरिगांव समिति के सचिव है। जब कि एक ब्लॉक में पिता-पुत्र सचिव के रुप में तैनात नहीं हो सकते, इसी लिए कहा जाता है, कि जो काम किसी भी विभाग में नहीं हो सकता है, वह काम एआर कर देते है। कहते हैं, कि एआर को दान करिए, जो चाहिए वह करवा लीजिए, इतना आसान और सरल अधिकारी कहां मिलेगा। ऐसा अधिकारी भी कहां मिलेगा जो अपने भ्रष्टाचारी सचिव को बचाने के लिए डीएम और सीडीओ को गुमराह करते हों। खम्हरिया समिति का चार्ज जिस समिति के सचिव मुकेश को दिया, वह भी चावल के लेन-देन में फंस चुके है। यानि कोई भी ऐसा सचिव नहीं होगा जिसने भ्रष्टाचार न किया हो, और जिसको एआर ने न बचाया हो। बताते हैं, कि सीडीओ की ओर से जो छापेमारी खम्हरिया समिति पर हुई, वह यूंही नहीं हुई, बस जान लीजिए जो छापेमारी एआर को करना चाहिए, उसे सीडीओ को करना पड़ा। डीएम के मोबाइल पर किसी किसान ने समिति के कालाबाजारी की शिकायत की थी।