सपा के सांसद और विधायक कब तक एथेनाल फैक्टी के बंद कराने के नाम पर दसिया के आंदोलनकारियों को ठगते रहेंगे?
-ज्ञापन और फैक्टी बंद होने का आष्वासन दिए 11 दिन से अधिक हो गए, लेकिन न तो फैक्टी बंद हुआ, और न विधानसभा और लोकसभा में आवाज ही गूंजी
बस्ती। एथेनाल फैक्ट्री को बंद कराने और आंदोलनकारियों का साथ देने वाले नेताओं को यह सोचना होगा, कि फैक्ट्री मालिक आप लोगों को चुनाव में भारी भरकम चंदा तो दे सकते हैं, लेकिन चुनाव नहीं जीता सकते, इस लिए अगर आप लोग वाकई चुनाव जीतना चाहते हैं, तो फैक्टी को बंद करवाकर दिखाइए, नहीं हार का माला पहनने के लिए तैयार रहिए, ज्ञापन लेने और आष्वासन देने से कुछ नहीं होने वाला हैं, अलबत्ता जो वोट मिलने वाला वह भी नहीं मिलेगा। गांव वालों का कहना है, कि सपा के सांसद रामप्रसाद चौधरी और स्थानीय सपा विधायक राजेंद्र चौधरी कब तक एथेनाल फैक्ट्री के बंद कराने के नाम पर दसिया के आंदोलनकारियों को ठगते रहेंगे? कहते हैं, कि ज्ञापन लिए और फैक्ट्री बंद होने का आष्वासन दिए 11 दिन से अधिक हो गए, लेकिन न तो फैक्टी बंद हुआ, और न विधानसभा और लोकसभा में फैक्ट्री बंद कराने की आवाज ही गूंजी। जो आवाज उठ रही थी, वह भी बंद हो गई। कहते हैं, कि फैक्टी बंद कराने के नाम पर दोहरी राजनीति करना और गांव वालों को बेवकूफ बनाना बंद करिए, जब आप लोगों को अच्छी तरह मालूम हैं, कि आप लोग फैक्ट्री बंद नहीं करवा सकते, तो क्यों हम लोगों का हमदर्द बनने चले आते हैं? कहते हैं, कि जब तक आप लोग विधानसभा और लोकसभा में आवाज नहीं उठाएगें, तब तक यह नहीं माना जाएगा, कि आप लोग हम लोगों के साथ है, बल्कि यह माना जाएगा कि आप लोग गुपचुप तरीके से फैक्ट्री मालिक के साथ हैं।
कहना गलत नहीं होगा, कि एथेनाल फैक्ट्री बंद कराने के नाम पर प्रधान, सांसद, विधायक और पत्रकारों ने अपने-अपने हिसाब से खूब रोटियां सेंकी, किसी ने खुलकर रोटी संेकी तो किसी ने छिपकर सेंकी, लेकिन संेकी सभी ने। इस रोटी संेकने में फैक्ट्री मालिक का अच्छा खासा पैसा खर्च हुआ। एक तरह से फैक्ट्री मालिक ने आंदोलन कमजोर करने या फिर उसे समाप्त करने के लिए जो भी हो सका, वह किया, पानी की तरह पैसा बहाया। किसी का मुंह हजारों में तो किसी का लाखों में बंद करने का प्रयास किया। इस बीच फैक्ट्री वालों ने स्थित को साफ करने का हर संभव प्रयास किया, काफी हद तक प्रयास सफल भी रहा, लेकिन इन सब के बावजूद गांव वालों की समस्या जस की तस खड़ी हुई। फैक्ट्री मालिक को कितना लाभ यह हुआ, यह तो नहीं मालूम लेकिन गांव वाले अवष्य ठगे गए, कभी प्रधान ने ठगा तो कभी विधायकजी ने तो कभी सांसदजी ने आष्वासन के नाम पर ठगा। सवाल उठ रहा है, कि आखिर गांव वाले कब तक ठगी का शिकार होते रहेगें? क्या गांव वालों के किस्मत में ठगी का शिकार होना ही लिखा है? नेताओं ने राजनीति कर करके गांव वालों के आंदोलन की एक तरह से हवा ही निकाल दी। गांव वालों की समझ में ही नहीं आ रहा है, कि वह विष्वास करें तो किस पर करें, जब प्रधान पर विष्वास किया तो उसने दगा दिया, जब सपा के विधायक और सांसद पर भरोसा किया तो वह भी भरोसे पर खरे नहीं उतरे। एक तरह से सभी ने गांव वालों को धोखा दिया और ठगा। जनता किसे अपना माने, जिसे माना वह भरोसे के लायक नहीं रहा, फैक्ट्री बंद होने को कौन कहे, रमेस, राकेश और राजेश नाम के तीनों भाईयों की जमीनों को फैक्टी वालों ने जबरिया कब्जा कर लिया, तीनों भाई कहते हैं, कि फैक्ट्री वाले झूठ बोल रहे हैं। कहा कि उनकी जमीनों का बिना बैनामा कराए कब्जा कर लिया। नेताओं को तीनों भाईयों के दर्द को समझना और सुनना चाहिए, सवाल उठ रहा है, कि आखिर फैक्ट्री वाले क्यों यह झूठ बोल रहे हैं? कि उन्होंने सभी किसानों की जमीन का बैनामा करवाया, और उन्हें उसकी कीमत दी गई, अगर सभी का बैनामा कराया तो इन तीनों भाईयों की जमीनों पर कब्जा क्यों किया? और क्यों नहीं बैनामा करवाया? बिडंबना यह है, कि षासन और प्रशासन गांव वालों का सुन नहीं रहें, फैक्टी मालिक क्यों सुनेगें? बच गए, नेता, तो यह फैक्ट्री बंद कराने के नाम पर राजनीति कर रहे है। आंदोलनकारियों के जख्मों पर मरहम लगाने के बजाए उस पर नमक छिड़क रहे है। ऐसे में गांव वाले जाएं तो जाएं कहां? जो लोग दिखाने के लिए गांव वालों की मदद कर रहे हैं, वह भी अंदर ही अंदर फैक्ट्री वालों का साथ दे रहे है। कोई यह न समझे कि जनता को कुछ भी नहीं मालूम, वह सब कुछ देख रही, कौन उनके साथ है, और कौन फैक्ट्री वालों के।
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