बस्ती। ब्राहृमण महासभा में चंदा और पत्थर चोरी को लेकर घमासान जारी है। लोग एक दूसरे पर शब्दों के वाण छोड़ रहे हैं, और सबके निशाने में महामंत्री ही सबसे अधिक है। लाखों का चंदा देने वालों का कहना है, कि हम लोगों ने राष्टीय अध्यक्ष की ईमानदारी को देखकर लाखों रुपया दिया, क्यों कि हम लोगों को बताया गया था, यहां पर गरीब बच्चों की पढ़ाई होगी, आश्रम बनेगा, गरीब लड़कियों की शादी होगी मंदिर बनेगा, लेकिन हम लोगों को यह नहीं मालूम था, कि यहां पर चंदा और पत्थर की चोरी भी होगी। ऐसे में सवाल उठ रहा है, कि क्या मंदिर बन भी पाएगा या नहीं? अगर बनेगा तो कब तक बनेगा? यह सवाल ब्राहृमण महासभा के साथ ब्राहृमण समाज के लोगों के मन में उठ रहा है, और लोग एक दूसरे से इसी तरह का सवाल भी कर रहे है। अभी तक के एपिसोड में सबसे अच्छी बात यह उभरकर आई कि सभी का विष्वास राष्टीय अध्यक्ष पर कायम है। यही कारण है, कि सभी की निगाहें इन्हीं पर लगी हुई, इनके जानने वाले यह कहते हैं, कि यह कमी जानकर इस लिए चुप रहते हैं, क्यों कि यह सामने वालों को सुधरने का मौका देना चाहते हैं, अगर कोई सुधर गया तो ठीक हैं, नहीं तो उसका अंत होना ही है। जल्दबाजी में यह कोई कार्रवाई नहीं करना चाहते, इनकी एक खासियत यह भी है, कि यह सामने वालें को गलती करने का पूरा मौका देते हैं, ताकि उसे अच्छी तरह से जाल में फंसाया जा सके। लोगों का कहना है, कि अगर यही विष्वास लोगों का महामंत्री पर होता तो आज ब्राहृमण महासभा बुलंदियों पर होता। जितने लोग ग्रुप में अपना गुस्सा उतार रहे हैं, उनमें अधिकतर वे लोग हैं, जिनसे या तो पद छीना गया या फिर धोखाधड़ी की गई। कहते हैं, कि अगर ई. राधेष्याम पांडेय से जिलाध्यक्ष का पद नहीं छीना जाता तो इतना बवाल न मचता और न शब्दों के वाण ही चलते। रही सही कसर प्रशांत पांडेय के इस्तीफे ने पूरा कर दिया। महामंत्री की सबसे बड़ी गलती नवीन दूबे को जिलाध्यक्ष और सत्ते शुक्ल को राष्टीय उपाध्यक्ष बनाना रहा। अगर यही निर्णय कमेंटी के जरिए होता तो इतने सवाल न उठते, और न कभी चंदा चोरी और पत्थर चोरी का मामला सामने आता। यह मामला तब सामने आने लगा, जब ई. राधेष्याम पांडेय को जिलाध्यक्ष से हटाया गया। कहने का मतलब सेवा भावना कम और पद की लड़ाई अधिक दिखाई दे रही है। सबसे अधिक दुखत मर्यादाओं का टूटना रहा, कहने को सभी विद्वान और पढ़े लिखे हैं, लेकिन जिन भाषाओं का इस्तेमाल ग्रुप में किया गया, वह किसी भी दशा में स्वीकार नहीं है। इसका विरोध अनेक ने किया, और लिखा भी कि लोग कुछ भी लिखे लेकिन मर्यादा का ख्याल अवष्य रखे। क्यों कि जिनके बारे में लिखा जा रहा है, वह भी इस सभा के सम्मानित लोग हैं, और जिनका समाज में एक अलग स्थान है।
संयम का बांध लगभग सभी ने तोड़ा। व्यक्तिगत निशाना भी साधा गया, बैठक में जो नहीं होना चाहिए था, वह तक हुआ। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है, कि क्या यह कटुता कभी समाप्त होगी? और अगर समाप्त होगी तो किस कीमत पर होगी? कोई माने या न माने नुकसान तो ब्राहृमण महासभा और ब्राहृमण समाज ही हुआ। किसी ने कहा भी कि अगर हर माह होने वाले बैठकों में माह भर के कामकाज एवं आय-व्यय की समीक्षा होती रहती तो इतनी गड़बड़ी नहीं होने पाती, अगर बैठक में आय-व्यय का जबतक कमेटी अनुमोदन नहीं दे देती, तब तक लेखाजोखा को सही नहीं माना जा सकता, कई सालों से मीटिगं होती रही, क्या कभी कोशाध्यक्ष ने मीटिगं में आय-व्यय का ब्यौरा दिया, या अनुमोदन लिया? अगर नहीं लिया तो कमेटी के और महारथाी क्या कर रहे थे? अगर कोषाध्यक्ष ब्यौरा नहीं देते तो यह जिम्मेदारी महांमत्री की होती है। सवाल उठ रहा है, कि अगर सबकुछ ईमानदारी से कार्य हुआ तो फिर आय-व्यय का ब्यौरा क्यों नहीं प्रस्तुत किया गया? अगर हिसाब देने के लिए अधिक समय किसी को दिया जाता तो यह माना जाता है, कि हिसाब-किताब सही नहीं है, मौका देने का मतलब अपूर्ण अभिलेखों को पूर्ण करना।
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