‘चर्च’ के ‘करोड़ों’ की ‘जमीन’ पर ‘भूमाफियों’ का ‘कब्जा’

बस्ती। वैसे भी भूमाफियाओं की नजर हमेशा कीमती जमीनों पर रहती है, भले ही चाहें वह जमीन किसी के व्यक्तिगत की हो, या चाहें सरकारी हो या फिर चाहें चर्च की हो। हालांकि इसके चलते कई भूमाफियाओं को अपनी जान तक गवानी पड़ी। फिर भी भूमाफियाओं की नजर दूसरों की संपत्तियों पर रहती है। क्यों कि इनकी नजर में अमीर बनने का इससे अच्छा और शार्ट कट रास्ता कोई और हो ही नहीं सकता। भले ही चाहें जान न गवानी पड़े। इसके लिए यह लोग खूनखराबा करने तक को तैयार हो जाते है। ऐसे लोग सबसे पहले प्रशासन और पुलिस को अपना दोस्त बनाते हैं, जाहिर सी बात हैं, इस तरह की दोस्ती की इन्हें भारी कीमत भी चुकानी पड़ती होगी। बिना कीमत लिए यह लोग किसी के दोस्त बन ही नहीं सकते। भूमाफिया भी कीमत चुकाने में पीछे नहीं हटते, क्यों कि यह सोचते हैं, कि अगर 25-30 लाख खर्च कर करोड़ों कमाया जा सकता है, तो इसमें बुराई क्या है? इसी दोस्ती के चलते कई पीड़ितों को अपने पुरखों की संपत्तियों से हाथ तक थोना पड़ा। भूमाफियों के जष्न मनाने के पीछे पुलिस और राजस्व टीम का बहुत बड़ा योगदान होता है। आज भूमाफिया अगर चर्च की कीमती जमीन पर कब्जा कर रहे हैं, तो उसके लिए प्रशासन और पुलिस की उस दोस्ती को जिम्मेदार माना जा रहा हैं, जिसे कीमत देकर खरीदी गई होगी। यह दोस्ती का ही कमाल होता है, कि पहले कब्जा दिलवाया जाता, फिर कब्जा को दिखाने के लिए रुकवाया जाता। कब्जा करवाने और रुकवाने का यह खेल काफी पुराना है। जिसके लिए प्रशासन और पुलिस काफी बदनाम भी हो चुकी है। इसी लिए भूमाफियों के आगे पीड़ितों की कोई नहीं सुनता, कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस और राजस्व की टीम दिखाने के लिए भले ही मौके पर पहुंच जाए, लेकिन बाद में जष्न मनाने का मौका तो भूमाफियों को ही मिलता है। यह कब्जा दूरदराज इलाकों में नहीं बल्कि डीएम कार्यालय और डीएम आवास के बीच हो रहा।

अभी तक आप लोगों ने फर्जी दस्तावेजों के सहारे दूसरे की संपत्तियों को हड़पने का ही सच सुना होगा, लेकिन आज हम आपको कथित फर्जी पंजीकरण के सहारे पूरे चर्च को ही हड़पने की साजिश के बारे में बताने जा रहे हैं, फर्जी इस लिए कहा जा रहा है, कि क्यों कि सुप्रीम कोर्ट ‘चर्च आफ नार्थ इंडिया’ के पंजीयन को असवैंधानिक कराते हुए निरस्त करते हुए कहा कि इसका ‘लखनऊ डयोसिएशन टस्ट एसोसिएशन आफ इंडिया’ की किसी संपत्ति पर न तो पहले कोई और न अब कोई अधिकार है। बस्ती के जिस चर्च की संपत्ति पर कब्जा किया गया, वह ‘चर्च आफ नार्थ इंडिया’ ने किया, और जिसके सदस्य अनिल लाल है। यह वही अनिल लाल, जिसे लखनउ डयोसिएशन टस्ट एसोसिएशन आफ इंडिया से निष्कासित किया जा चुका हैं, और जिन्होंने बाद में ‘चर्च आफ नार्थ इंडिया’ का गठन किया। चर्च के प्रिंसिपल आफिसर ‘बोबी विलियम’ का कहना है, कि प्रषासन 1924 के असली ‘लखनऊ डयोसिएशन टस्ट एसोसिएशन आफ इंडिया’ की नहीं सुन रहा है, और 1970 के कथित नकली ‘चर्च आफ नार्थ इंडिया’ के अनिल लाल की सुन रहा हैं, कहते हैं, कि कागजात तो कथित नकली वाले से मांगना चाहिए, लेकिन मांगा असली वाले से जा रहा है। कहते हैं, कोतवाली में पुलिस भी यह मान चुकी है, ‘चर्च आफ नार्थ इंडिया’ कथित नकली है। कहते हैं, कि वह 40 साल से कानूनी लड़ाई लड़ते रहे, तब जाकर सुप्रीम कोर्ट से उन्हें न्याय मिला। सवाल करते हैं, कि क्या कोई कथित फर्जी संस्था का व्यक्ति चर्च की जमीन पर कब्जा कर सकता है? कहते हैं, यही बात मैं भी बार-बार प्रशासन और पुलिस से कहता और लिखता आ रहा हूं, लेकिन हर बार उनकी बात को अनसुनाकर करके ऐसे व्यक्ति की बात सुनी जाती है, जिसके संस्था को सुप्रीम कोर्ट असवैंधनिक मान चुका है। कहा कि इससे पहले भी वह कमिष्नर, डीएम, एसडीएम और तहसीलदार को लिख चुकें हैं, कि चर्च की जमीन पर भूमाफिया कब्जा कर रहें, लेकिन किसी ने भी नहीं सुनी। अफसोस के साथ कहते हैं, कि 200 साल पुरानी चर्च की संपत्ति को प्रशासन अभी तक यह नहीं तय कर पाया, कि यह संपत्ति ‘चर्च आफ नार्थ इंडिया’ के अनिल लाल की हैं, या ‘लखनऊ डयोसिएशन टस्ट एसोसिएऊन आफ इंडिया’ की हैं? कहा कि अभी हमने प्रमुख सचिव नगर विकास, प्रमुख सचिव राजस्व, प्रमुख सचिव गोपनीय और मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर उनसे ‘लखनउ डयोसिएशन टस्ट एसोसिएशन आफ इंडिया’ की संपत्ति को ‘चर्च आफ नार्थ इंडिया’ के अनिल लाल से बचाने की मांग की है। कहा कि जांच भी हो रही है, और सीओ की ओर से उनका बयान भी लिया जा चुका है। बताया कि चर्च की जमीन पर न सिर्फ कब्जा हो गया, बल्कि लगभग 20 दुकान भी खड़ी कर दी और प्रत्येक दूकान का आठ से दस लाख वसूला गया। जोर देकर कहते हैं, कि बस्ती के सिविल लाइन में स्थित आराजी संख्या-66 रक्बा 6119.90 हे. प्रार्थी के टस्ट गिरजाघर सेंट जेम्स चर्च के नाम है।