बस्ती। जिले के प्रभारी मंत्री सूर्य प्रताप शाही के कृषि विभाग में आन लाइन और आफ लाइन तबादले के लाम पर में बड़ा घोटाला हुआ, इस घोटाले की अंाच प्रभारी मंत्री पर भी आ रही है। मुख्यमंत्री और कृषि मंत्री का स्पष्ट आदेश हैं, कि तबादला नीति आनलाइन और ई-आफिस से निर्गत किए जाए। लेकिन समूह ग के तबादले में आनलाइन के स्थान पर आफलाइन के जरिए जमकर धन उगाही की गई, किसी का भी तबादला आनलाइन नहीं किया गया, अगर किया गया होता तो धन की उगाही नहीं हो पाती। दावा किया जा रहा है, कि अगर डीडी हेड क्वार्टर और एडीएम प्रशासन के मेल को चेक किया जाए तो सच्चाई सामने आ सकती है। आदेष के अनुसार 31 मई की रात्रि तक सभी का तबादला आन लाइन के जरिए कर देना चाहिए था, लेकिन सेटिगं के चक्कर में दो जून को आफलाइन तबादला किया गया। इसका मतलब यह हुआ कि मालखाने वाले अधिकारियों ने मुख्यमंत्री के आदेश की परवाह किए बिना आफलाइन तबादला कर दिया। जो आफलाइन तबादले किए गए, उस पर हस्ताक्षर हैं, अगर यही आन लाइन तबादला होता तो डिजिटल सिगनेचर होता। दो दिन बाद तबादला करने को लेकर यह भ्रम फैलाया गया, कि मंत्रीजी दिल्ली से आए नहीं थे, इस लिए आफलाइन किया गया। चूंकि आफलाइन की जांच नहीं होती, इस लिए निडर होकर पैसा कमाया। अगर यही आनलाइन होता तो घंटा और सेकेंड तक लिखा रहता है। इस तबादला घोटाले को लेकर पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बना हुआ है। विभाग के लोग तो यह भी कह रहे हैं, बिना विभागीय मंत्री की जानकारी में इतना बड़ा घोटाला संभव ही नहीं। वैसे भी इस विभाग में साल भर तक कभी खाद घोटाला तो कभी अनुदान घोटाला तो कभी मृद्वा परीक्षण घोटाला तो कभी मेढ़बंदी और समतलीकरण के नाम पर होता रहा है। यह पहला ऐसा विभाग होगा, जहां पर सालों भर घोटाला होता रहता हैं, और यह सब उस मंत्री के विभाग में हो रहा है, जो अपने आप को ईमानदार कहते है। सवाल उठ रहा है, कि आखिर यही ही क्यों पिछले लगभग दस साल से कृषि मंत्री के रहते आ रहे है। आखिर इन्होंने अपने विभाग में कौन सी क्रांति ला दिया, कि इन्हें बार-बार कृषि मंत्री ही बनाया जा रहा है। जब कि सबसे अधिक भ्रष्टाचार इन्हीं के विभाग में पिछले दस साल से पनप रहा है।
‘मंत्रीजी’ बताइए, ‘भ्रष्टाचार’ के ‘मुखिया’ को ‘क्यों’ छोड़ ‘दिया’?
कृषि विभाग में तबादला नीति की धज्जियां खूब उड़ी, भले ही विभागीय मंत्री यह कहते हैं, कि कोई धज्जियां नहीं उड़ी, लेकिन स्पष्ट दिख रहा है, कि धज्ज्यिां उड़ाई गई। इसका उदाहरण जिला कृषि अधिकारी कार्यालय में एक साथ सभी बाबूओं का तबादला होना, चार बाबू थे, चारों का यह कहते हुए तबादला किया कि सभी पर भ्रष्टाचार के आरोप थे, जब कि 10 फीसद ही तबादला होना था, लेकिन यहां पर तो 100 फीसद कर दिया। सवाल उठ रहा हैं, जब बाबू का भ्रष्टाचार के आरोप में तबादला हो सकता है, तो भ्रष्टाचार के मुखिया जिला कृषि अधिकारी का क्यों नहीं हो सकता? इस लिए नहीं हुआ क्यों कि साहब मोटा लिफाफा जो देते हैं, और बाबू नहीं दे पाता। मंत्रीजी का यह कहना कि एक दिन पहले ही हमने बस्ती के बारे में आकर कह दिया था, कि किसी भ्रष्ट को नहीं छोड़ूंगा। अगर मंत्रीजी के कथनी और करनी में अंतर नहीं होता तो वह भ्रष्ट जिला कृषि अधिकारी का तबादला भी करते। मीडिया इससे पहले भी कह चुकी है, कि यह विभाग सिर्फ और सिर्फ मंत्रीजी के चलते बर्बाद हुआ और भ्रष्टाचार बढ़ा, आज जो किसानों को खाद नहीं मिल रहा है, उसके लिए किसान मंत्री को ही जिम्मेदार मान रहे है। मंत्रीजी ने भ्रष्ट बाबूओं का तबादला करके और भ्रष्टाचार के मुखिया डीओ को अभयदान देकर यह साबित कर दिया कि भले ही अधिकारी चाहें जितना भ्रष्ट हो अगर वह लिफाफा पहुंचाता हैं, तो बेईमान नहीं है।
जब ‘मंत्रीजी’ ने ‘पत्रकार’ को ‘खर्चा’ पानी ‘देने’ को ‘कहा’
तबादला नीति को लेकर पत्रकार अनुज प्रताप सिंह ने कृषि मंत्री सूर्यप्रताप षाही से जब तीखे सवाल करना षुरु किया तो पहले मंत्रीजी असहज दिखे, उन्हें उम्मीद नहीं थी, कि अंदर की बात पत्रकारों तक भी पहुंच जाएगी। भले ही मंत्रीजी ने कितना कहा कि तबादला नीति की धज्जियां नहीं उड़ाई गई, लेकिन जबाव से स्पष्ट लग रहा था, कि पत्रकार ने उनके विभाग की चोरी पकड़ ली। जबाव के अंत में मंत्रीजी यह कहते हुए सुने गए, कि अरे पत्रकारजी आप भी कुछ खर्चा पानी ले लीजिए। यही कहना पत्रकारों के लिए ब्रेकिगं न्यूज बन गया, और सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ। अगर मंत्रीजी से सही होते तो उन्हें पत्रकार से यह न कहना पड़ता कि आप भी कुछ खर्चा पानी ले लीजिए। यह है, योगीजी के कदावर मंत्री, जो पत्रकार के सवाल को भी नहीं झेल पाए और सौदा करने लगें।
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