बस्ती। अब जरा अंदाजा लगाइए कि जिस पुलिस की ड्यूटी बोर्ड की परीक्षा संभालने में लगी हो, अगर वह मेडिकल स्टोर की व्यवस्था संभालने में व्यस्त रहेगें तो अव्यवस्था भी होगी और नकल कराने वाले नकल भी कराएगें। जब मीडिया ने परीक्षा की व्यवस्था संभालने के बजाए मेडिकल स्टोर की व्यवस्था संभालने के बारे में पूछ लिया तो मीडिया से ही परिचय कार्ड मांगने लगे, इतना ही नहीं सवाल से भन्नाएं सोनहा थाने में तैनात सिपाही अभिजीत सिंह ने वीडियो बनाने वाले पत्रकार सचिन कुमार कसौधन का मोबाइल भी छीन लिया, और सार्वजनिक रुप से मीडिया के लोगों को अपमानित भी करने लगे। मीडिया और भीड़ को यह दिखाने लगे कि वर्दी में इतना पावर होता है, कि वह सवाल पूछने वाले मीडिया का मोबाइल छीन सकते हैं, और अपमानित कर सकते है। वहां मौजूद लोगों का कहना था, कि यही पावर अगर अपराधियों पर पुलिस दिखाती तो जनता और मीडिया दोनों जयजयकार करतें।
सल्टौआ स्थित आदर्श इंटर कालेज में यूपी बोर्ड की परीक्षा चल रही है। सुबह की पाली में परीक्षा व्यवस्था को संभालने और नकल कराने वाले पर लगाम कंसने के लिए सोनहा थाने की पुलिस अभिजीत सिंह की ड्यूटी लगाई गई। पत्रकार सचिन कुमार कसौधन सहित अन्य मीडिया भी व्यवस्था का जायजा लेने पहुंचे थे। जब उन लोगों ने देखा कि परीक्षा से 100 मी. दूर स्थित विवेक मेडिकल स्टोर पर सिपाही बैठकर मेडिकल स्टोर की व्यवस्था संभालें हुए हैं, तो आदतन, मीडिया ने सिपाहीजी से पूछ लिया कि सर आप की ड्यूटी तो परीक्षा केंद्र पर व्यवस्था संभालने में लगी है, तो यहां क्यों बैठे हैं? इतना पूछना था, कि सिपाहीजी को सिपाही होने का एहसास हो गया। जबाव देने के बजाए मीडिया वालों से ही आई कार्ड मांग लिया। इसी बीच भीड़ बढ़ती गई, भीड़ को देख मीडिया और सिपाही दोनों एहसास कराने लगे। आईडी न दिखाने पर सिपाही ने सचिन कुमार कसौधन नामक पत्रकार का मोबाइल छीन लिया, जाहिर सी बात, पत्रकार को तो गुस्सा आया ही होगा। दोनों ओर से ताकत का एहसास होने लगा। इसी बीच वीडियो बना रहे सचिन का मोबाइल सिपाही ने छीन कर मौजूद भीड़ को दिखाने लगे। बहरहाल, जब सिपाही को अपनी गलती का एहसास हुआ तो मोबाइल वापस कर दिया। सवाल, उठ रहा है, कि जब पुलिस वालों को सवाल पूछना इतना बुरा लगता है, तो क्यों वह सवाल पूछने वाला काम करते है? जाहिर सी बात हैं, कि अगर कोई पुलिस वाला परीक्षा केंद्र की व्यवस्था संभालने के बजाए किसी मेडिकल स्टोर की व्यवस्था संभालने लगेंगे तो सवाल उठेगा ही। पुलिस वालों को किसी के भी सवालों से नहीं घबड़ाना चाहिए, बल्कि सवालों का सामना करना चाहिए। चूंकि न जाने क्यों पुलिस, पत्रकारों के बारे में अच्छी राय नहीं रखती और जब भी मौका मिलता, रगड़ने से नहीं चूकती, इसका ज्वलंत उदाहरण हाल ही में एक पत्रकार के खिलाफ केला पेड़ की चोरी के वीडियो वायरल के आरोप में मुकदमा दर्ज करना रहा। कहने को भले ही चाहें दोनों एक दूसरे को मित्र कहे, लेकिन मौका पड़ने पर न तो मीडिया और न पुलिस चूकती है। बस दोनों को मौका मिलना चाहिए। मीडिया के लोग तो कभी-कभी दोस्ती का निर्वहन कर भी लेते हैं, लेकिन पुलिस नहीं करती। यही बात मीडिया के लोगों को भी समझना होगा, और उन्हें भी वहीं करना चाहिए, जो पुलिस उनके साथ करती है।
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