बस्ती। जिस प्राइवेट पीओसीएल लैब के लिए सीएमएस ने एलटी के इंकार करने के बावजूद रिजेंट खरीद का इंडेंट खुद बनाया, उस लैब के शुभग अग्रवाल का सीएमएस से क्या रिश्ता होगा? इसे आसानी से समझा जा सकता है। सवाल उठ रहा है, कि क्यों सीएमएस ने उस प्राइवेट लैब से 50 लाख का रिजेंट खरीदने के लिए अपने ही एलटी की रिपोर्ट को डस्टबिन में डाल दिया? इसे एलटी की ईमानदारी कहा जाए या फिर सीएमएस की बेईमानी मानी जाए। अगर वाकई सीएमएस इतनी ही ईमानदार होती तो एलटी के उस रिपोर्ट पर ध्यान देती, जिसमें स्पष्ट कहा गया कि, सरकारी पीओ सिटी लैब के रहते प्राइवेट पीओसीएल लैब से रिजेंट नहीं खरीदा जा सकता। अगर सीएमएस एलटी की बात मान जाती तो सरकार का 50 लाख से अधिक नुकसान होने से बच जाता, लेकिन मैडम को तो अपने चहेते और अनियमित रुप से अस्पताल में स्थापित पीओसीएल लैब के शुभग अग्रवाल को लाभ जो पहुंचाना था। जाहिर सी बात लाभ वैसे तो पहुंचाया गया नहीं होगा। जो सीएमएस लाभ पहुंचाने के लिए खुद इंडेंट बना सकती है, उस सीएमएस से क्या कोई ईमानदारी की उम्मीद कर सकता है? बहरहाल, जिस तरह महिला अस्पताल बस्ती और हर्रैया के सीएमएस ने सरकारी लैब के सापेक्ष प्राइवेट लैब के प्रति जो प्रेम दिखाया, उसे प्रेम नहीं बल्कि भ्रष्टाचार माना जाता है। सरकारी अस्पताल में बिना किसी परमिशन के किसी प्राइवेट लैब को स्थापित करना और उससे करोड़ों का रिजेंट खरीदना जांच का विषय है। दोनों सीएमएस को आज नहीं तो कल इसका जबाव देना ही होगा। अब आ जाइए हर्रैया अस्पताल के बालरोग विशेषज्ञ डा. मनोज चौधरी पर। इन डाक्टर साहब पर जेम पोर्टल का प्रभार भी है, इन्हें इसका प्रभार इस लिए दिखा गया, ताकि फर्जीवाड़ा करने वाले ठेकेदारों को एल-1 किया जा सके। यह हर्रैया अस्पताल में सप्ताह में मुस्किल से दो दिन आतें हैं, बाकी दिन यह बखिरा तिरंगे झंडे के पास इनका खुद का अस्पताल हैं, वहां सेवा देते है। इनके पांच दिन का आवेदन हमेशा बाबू बजरंग प्रसाद के पास हस्ताक्षर करके पड़ा रहता है, डेट नहीं डाला जाता, डेट उस दिन का डाल दिया जाता है, जिस दिन कोई अधिकारी जांच या निरीक्षण करने आते है। ताकि पूछने पर बताया जा सके कि डाक्टर साहब आकस्मिक अवकाश पर है। ठीक यही सुविधा मैडम सीएमएस भी उठा रही है, यह भी बहुत कम अस्पताल आती है, महीने में चार-पांच दिन आ जाए तो बड़ी बात है। इनका भी हस्ताक्षरयुक्त एंव तारीख रहित आवेदन बजरंग प्रसाद के टेबुल पर पड़ा रहता। अब आप समझ सकते हैं, कि क्यों बजंरग प्रसाद को सीएमएस का दायां-बायां हाथ कहा जाता है? क्यों इन्हें असली सीएमएस से अधिक पावरफुल माना जाता है। अस्पताल के अब तक के भ्रष्टाचार में इनका प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष हाथ माना जाता है। जिस अस्पताल की सीएमएस और डाक्टर मनमाने तरीके से नौकरी और काम करते हों, उस अस्पताल का बाबू और फार्मासिस्ट अगर मनमानी कर रहा है, सामान्तर दवा स्टोर संचालित कर रहा है, दवा के काउंटर पर सरकारी पर्चे पर मरीज को देखता हो, और बाहर की दवा लिखे, तो कौन सा गुनाह करता है। अब जरा अंदाजा लगाइए, कि अगर यही प्राइवेट हास्पिटल होता तो क्या सीएमएस, डाक्टर मनोज चौधरी, बाबू बजरंग प्रसाद, चीफ फार्मासिस्ट धु्रव वर्मा और दवा काउंटर से मरीजों को देखने वाले फार्मासिस्ट सहित अन्य इस तरह की मनमानी और भ्रष्टाचार कर पातें? इस तरह के लोग न तो मरीजों के और न उस सरकार के जो इनके परिवार का भरण-पोषण का जिम्मा उठाते हैं, वफादार नहीं हो सकते हैं, इस तरह के लोगों की वफादारी शुभग अग्रवाल और फर्जीवाड़ा करने वाले ठेकेदारों के प्रति अधिक रहती है। यह लोग उस कुर्सी और पद का भी अपमान करते हैं, जो इन्हें समाज में सम्मान देता।
- Loading weather...
- |
- Last Update 04 Apr, 02:14 AM
- |
- |
- खबरें हटके
- |
- ताज़ा खबर
- |
- क्राइम
- |
- वायरल विडिओ
- |
- वीडियो
- |
- + More
0 Comment