बस्ती। जहां आज के दौर में कोई अपनों की भी मददगार नहीं करता, अगर ऐसे में कोई गैर की मदद करता है, तो बहुत बड़ी बात है। मदद न करने के पीछे अधिकांश लोगों का कहना हैं, कि आज के दौर में अगर कोई अपनों की मदद कर देता है, तो वही आप का दुष्मन बन जाता है। इसी लिए कोई मदद करने के लिए जल्दी आगे नहीं आ रहें हैं या फिर सारी बोल दे दे रहें है। पुराने के लोग किसी के द्वारा दस रुपया का भी की गई मदद को पूरी जिंदगी तक नहीं भूलते थे, आज लाख रुपया भी मदद करो, तो याद भी नहीं रखते, एहसान मानना तो बहुत दूर की बात है। जिस तरह मदद करने/लेने की आड़ में धोखेबाजी और बेईमानी लोग कर रहे हैं, उसे देख कोई मदद करने को आगे नहीं आ रहा है। जिस भी व्यक्ति ने मदद करके भूल गया, उसे कोई तकलीफ नहीं होगी, लेकिन अगर कोई यह समझकर मदद करता है, कि मदद करने के बदले वह एहसान मानेगा, तो उसी व्यक्ति को उस समय तकलीफ होती है, जब उसे यह लगता है, कि उसने जिसकी मदद की वहीं पीठ पीछे उसकी बुराई कर रहा है। आजकल लोग एहसान का बदला एहसान चुका कर नहीं बल्कि एहसान फरामोशी से देते है। बहरहाल, मदद मांगना या करना कोई भी बुरी बात नहीं हैं, बुरी बात तब होती है, जब मदद करके पछतावा होता है। जिस तरह लोग दोस्ती में धोखा रहे हैं, ठीक उसी तरह मदद करके बुराई मोल ले रहें है। हम बात कर रहें थे मानसरोवर की यात्रा करने वाले देश के पहले सिख सरदार कुलवेंद्र सिंह मजहबी की। इन्हें जब यह पता चला कि गनेशपुर निवासी सौरभ पुत्र राम भरत की मोटर साइकिल कचहरी से गायब हो गई, और एफआईआर लिखाने के बाद भी पुलिस बरामद नहीं कर पाई, वह व्यक्ति पप्पू सरकार के पास पहुंचा और मदद करने की अपील की, पहले तो बरामद कराने पर जोर दिया, लेकिन जब बरामद नहीं हुआ तो इन्होंने फुटहिया पुलिस र्चौकी पर नीलाम हो रही मोटर साइकिल को 55 जहार की बोली लगाकर खरीदा, और सौरभ को गाड़ी और उसकी चाबी सौंप दिया। बरइक की चाबी पाकर सौरभ और उसके परिवार ने पप्पू सरकार के पूरे परिवार को आशीर्वाद दिया। मोटर साइकिल 22 जनवरी 26 को गायब हुई थी। इतना धोखा खाने के बावजूद भी आज न जाने कितने मददगार हैं, जो बिना किसी लालच के जरुरतमंदों की मदद कर रहंे है।
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