बस्ती। आम जनता अपने सांसद से आसानी से मिल सके इसके लिए सरकार ने विकास भवन में जनसंपर्क कार्यालय खोल रखा है। विकास भवन में इस लिए कार्यालय खोला गया, ताकि कचहरी, कलेक्टेट और विकास भवन आने वाले लोग आसानी से कार्यालय पहुंच सकें। क्यों कि सबसे अधिक फरियादी इन्हीं कार्यालयों में आते है। इस जन संपर्क कार्यालय में सारी सुविधाएं उपलब्ध हैं, एसी से लेकर बैठने तक की सुविधा उपलब्ध है। कार्यालय तो खुला सांसद के लिए, लेकिन सांसदजी ही कार्यालय नहीं आते, लगभग दो साल हो गए, और शायद दो बार ही कार्यालय आए होगें, ऐसे में कार्यालय का कोई औचित्य ही नहीं रह गया। जो कोई सांसदजी से मिलने आता हैं, उससे कहा जाता हैं, कि मिलना हो तो आवास पर जाना होगा, वहीं मुलाकात हो सकेगी। सांसदजी को शायद यह नहीं मालूम कि बहुत से ऐसे लोग भी हैं, जो नेताओं के आवास पर जाना पसंद नहीं करते, आवास पर जाकर मिलना वे अपनी बेइज्जती समझते है। सवाल उठ रहा है, कि जब जनसंपर्क कार्यालय है, तो फिर जनता क्यों सांसद के आवास पर जाए? यह सरकारी व्यवस्था हैं, अगर व्यक्तिगत होता तो कोई सवाल नहीं उठता। जनता तो इस उम्मीद में विकास भवन आती है, कि सांसदजी से मुलाकात हो जाएगी और अपनी समस्या बता सकेंगें, लेकिन जब वह जनसंपर्क कार्यालय पहुंचती है, तो उसे कुर्सी खाली मिलती है, मिलते भी हैं, तो नकली प्रतिनिधि।
सांसदजी की कुर्सी और उस पर लगा सफेद तौलिया इस बात की गवाही दे रहे हैं, कि सासंदजी काफी दिनों से नहीं आए, अगर आते तो कुर्सी और तौलिया गंदी और फट न जाती। आलम यह है, कि सांसदजी के टेबुल पर लगे कलेंडर की तारीख बदलने को कोैन कहे माह तक नहीं बदला जाता, दुनिया के लिए मई माह चल रहा है, लेकिन सांसदजी के लिए अभी भी अप्रैल ही चल रहा है। जब कार्यालय को आरामगाह बना दिया जाएगा तो यही हाल होगा। इस कार्यालय में सपाई गर्मी में एसी का आंनद लेने आते है। मानो इन्हीं लोगों के लिए ही सरकार ने इतनी सारी सुविधा दे रखी है। कभी यह कार्यालय गुलजार रहता था, क्यों कि जब भी पूर्व सांसद जिले में होते तो सप्ताह में तीन दिन वह जनसंपर्क कार्यालय अवष्य आते थे, तब किसी को यह नहीं कहा जाता था, कि सांसदजी से मिलना हो तो उनके आवास पर जाना होगा। बात सत्ता और विपक्ष के सांसद के होने की नहीं हैं, बात जनता से मिलने की है, और जनता के प्रति जिम्मेदारी के एहसास होने की है। अब जरा अंदाजा लगाइए कि विकास भवन के अधिकारी सांसदजी को जितना महत्व देगें क्या उतना महत्व नकली प्रतिनिधि को देगें। इस कार्यालय में पीड़ित कम और ठेकेदार, भूमाफिया, प्रापर्टी डीलर और बिचौलिए अधिक बैठते और आते-जाते रहते हैं। सवाल उठ रहा है, कि यह जनसंपर्क कार्यालय कौन संचालित करेगें, सांसदजी या फिर नकली प्रतिनिधि। सवाल यह भी उठ रहा है, कि अगर सांसदजी को जनसंपर्क कार्यालय की कोई आवष्कता नहीं हैं, तो फिर जनता और सरकार के पैसे का दुरुपयोग हो। सांसद से मिलने वाली या तो वापस अपने घर जाए या फिर सांसदजी के आवास जाए। जनता को विकल्प दिए गएं हैं। जनसंपर्क कार्यालय के ताला खोल देंने जनसंपर्क कार्यालय नहीं बन जाता, जबतक कि सांसदजी नहीं बैठते। मान लिया जाए कि सांसदजी की तबियत अच्छी नहीं रहती, रो नहीं तो कम से कम सप्ताह में एक ही दिन बैठा करें, लेकिन बैठा करें, ताकि सांसद पद और उसकी कुसर्री की गरिमा बनी रहे। अगर सरकारी व्यवस्था हैं, तो उसका लाभ भी जनता को ही मिलना चाहिए, न कि उसका लाभ अन्य उठाएं।
0 Comment