बस्ती। पहले ‘राजाराम वर्मा’ ने गिल्लम चौधरी को उनके लाइव के मौके पर कहा कि ‘आप की कोई पहचान नहीं हैं, जो है, वह राम प्रसाद चौधरी की बदौलत’, और अब ‘कपिल देव’ ने फेसबुक पर कह दिया कि ‘गिल्लम चौधरी को अगर कोई जानता है, तो सिर्फ हरीश द्विवेदीजी के कारण जानता...इससे गिल्लम भाई भी इंकार नहीं कर सकते’। कल को संजय चौधरी भी कह सकते हैं, कि उन्हीं के कारण ही गिल्लम चौधरी की पहचान है। अब तो सवाल उठने लगा कि क्या गिल्लम चौधरी की अपनी कोई पहचान हैं, कि नहीं है, जो हैं, वह रामप्रसाद चौधरी या हरीश द्विवेदी के कारण है। यह सही है, कि जबतक राजनीति में कोई किसी का गाडफादर नहीं होता, तब तक वह उचाईयों को नहीं छू सकता। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो सिर्फ सहारा लेते हैं, बाकी का रास्ता और पहचान वह खुद अपनी मेहनत से बनाते हैं। कोई भी नेता ऐसा नहीं होगा, जो यह चाहेगा कि कोई उसे यह कहे कि उसकी पहचान किसी और के चलते है। यह भी सही है, कि आज भले ही चाहें गिल्लम चौधरी के बारे में जो कुछ भी कहंे, लेकिन एक सच यह भी हैं, इनकी राजनीति करने का स्टाइल सबसे जुदा है। इनके बारे में एक कहावत बहुत मशहूर है, कि इन्होंने जो भी चाहा, उसे हासिल किया, ठेकापटटी में इन्होंने दिखा दिया कि पैसा कैसे कमाया जा सकता है। इनके ठेकापटटी की शुरुआत ही सभासद रहते हुई। इनके ही देखरेख में आरकेवीके के सामने पालिका की उपर नीचे दुकाने बनी। यह कभी संजय पाल और सत्यप्रकाश जायसवाल के साथ मिलकर सीएंडडीएस में बड़े पैमाने पर ठेकेदारी करते थे, पैसा खूब बनाया। बाद में तीनों के रास्ते अलग-अलग हो गए, उसके बाद यह रिएल स्टेट में कदम रखे। कौन नहीं जानता कि डोरिका में इन्होंने दीनदयाल उपाध्याय विधुतीकरण के नाम पर अनियमित रुप से डोरिका का चयन पूर्व सांसद के साथ मिलकर किया, जिसमें अनियमित रुप में 75 बिजली के पोल लगाए गए, और इसी को दिखाकर इन्होंने कोैड़ी के मोल की जमीन को करोड़ों रुपये में प्लाटिगं करवाकर बेचा, इसमें इन्होंने खूब पैसा बनाया, हालांकि इन्हीं के चलते एक्सईएन, एई और जेई को निलंबित भी होना पड़ा। यह चुनाव जीतना जानते हैं, यह इन्होंने उस समय दिखा दिया, जब यह जिला पंचायत सदस्य का चुनाव लड़ रहे थे, इन्होंने उस समय मीडिया से भी कहा था, कि मुझे यह चुनाव हर हाल और किसी भी कीमत पर जीतना हैं, पानी की जरह पैसा बहाया, और इन्होंने जीत कर दिखा भी दिया कि इनमें जीतने की कितनी ललक है। बस यह जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में मात खा गए, वरना संजय चौधरी की जगह आज यह कुर्सी पर बैठे होते। फिर भी इनका आर्थिक नुकसान नहीं हुआ, बल्कि यह फायदे में ही रहें, खुद लाभ उठाया और अपने गुट के लोगों को भी लाभ पहुंचवाया। एक तरह से इनपर और इनके गुट के लोगों पर जिला पंचायत को बर्बाद करने का भी आरोप बार-बार लग रहा है।  ठेकापटटी में राम प्रसाद चौधरी ने भी इनका खूब साथ दिया। लोगों का कहना है, कि यह बहुत अच्छे कारोबारी हैं, लेकिन इनके सामने सबसे बड़ा सकंट का है। बहरहाल, जो इनपर दूसरे का ठप्पा लग रहा है, इसे इन्हें मिटाना होगा, और अपनी अलग पहचान बनानी होगी। लोगों के कमेंट और इनके षुभ चिंतकों का कहना है, इनके पास सबकुछ हैं, लेकिन इनकी कोई अपनी पहचान नहीं हैं, जो हैं, वह दूसरे के कारण है। हालांकि यह एक कडुवा सच हैं, लेकिन इन्हें इस सच को स्वीकारना होगा, तभी यह अपनी अलग पहचान बना पाएगें। इन्हें यह साबित करना होगा, कि जो लोग उनके बारे में कह रहें थे, वह गलत कह रहे थे। वैसे भी राजनीति में अगर किसी पर एक बार ठप्पा लग गया तो उसे मिटाना आसान नहीं होता। यह बात गिल्लम चौधरी से बेहतर कौन जानता।