खुल गई हर्रैया के 100 बेड वाले महिला अस्पताल की सीएमएस सुषमा जायसवाल, चीफ फार्मासिस्ट ध्रुव वर्मा, जेम पोर्टल प्रभारी डा. मनोज चौधरी, बाबू बजरंग प्रसाद और आपूर्तिकर्त्ताओं की पोल

बस्ती। आज हम आप लोगों को ऐसे फर्जीवाड़े के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसे आप लोगों ने न तो कभी देखा होगा और न कभी सुना ही होगा। यह अनोखा फर्जीवाड़ा और कहीं नहीं बल्कि 100 बेड एमजीएच अस्पताल हर्रैया में हुआ। इस अनोखे फर्जीवाड़े के चलते सीएमएस सुषमा जायसवाल, स्टोर इंचार्ज/चीफ फार्मासिस्ट ध्रुव वर्मा, जेम पोर्टल प्रभारी डा. मनोज चौधरी, सीएमएस के चहेते एवं सबसे अधिक भरोसेमंद बाबू बजरंग प्रसाद और आपूर्तिकर्त्ता की तिजोरी भर गई। इन लोगों ने मिलकर पिछले तीन सालों में करोड़ों की दवाओं को कागजों में ही खरीदा, अस्पताल में एक रुपये की भी दवा नहीं आई, लेकिन भुगतान करोड़ों में हुआ। अगर इसकी उच्च स्तरीय जांच हो जाए तो न जाने कितने की नौकरी तो खतरें में पड़ेगी ही साथ ही वे लोग जेल में नजर आएगें। अब आप लोग सोच रहे होगें, कि बिना दवाओं के कैसे इतना बड़ा भुगतान हो सकता? जिस तरह एक डिब्बा को दो डिब्बा टेबलेट बनाकर सरकारी धन को संगठित गिरोह की तरह लूटा गया, उससे बडे-बड़े घोटालेबाज भी सकते में है। जब इस तरह का अनूठा घोटाला हर्रैया के अस्पताल में हो सकता है, तो जिला महिला अस्पताल में भी हो सकता हैं, क्यों कि बजट लाने से लेकर फर्जीवाड़े में अहम भूमिका निभाने वाला वही आपूर्तिकर्त्ता महिला अस्पताल बस्ती में भी हो सकता हैं, जिसने हर्रैया में फर्जीवाड़ा किया।

अब हम आपको विस्तार से फर्जीवाड़े के बारे में बताने जा रहे है। मिसाल के तौर पर एक आपूर्तिकर्त्ता सीएमएस के पास जाता है, और उनसे कहता हैं, कि हम आपको उदाहरण के रुप में पैरासिटामाल टेबलेट की आपूर्ति करना चाहते है। मैडम कहती है, कि बजट नहीं हैं, तब आपूर्तिकर्त्ता कहता है, कि मैडम बजट की चिंता आप मत करिए, हम उसका इंतजाम कर देगें, फिर मैडम कहती है, कि जो टेबलेट आप आपूर्ति करना चाहते हैं, वह टेबलेट तो स्टोर में भरपूर हैं, तो फिर हम आप कैसे उस टेबलेट की आपूर्ति करने का ठेका देगें और कैसे आप आपूर्ति करेगे?ं तब आपूर्तिकर्त्ता कहता हैं, कि मैडम टेंषन मत लीजिए, उसका रास्ता भी मेरे पास है। आपूर्तिकर्त्ता कहता है, कि मैडम जिस टेबलेट का डिब्बा स्टाक में हैं, उसे हम दो डिब्बा बना देगें। यानि जो पैरासिटामाल एक डिब्बा स्टाक में उपलब्ध हैं, उसमें से आधा निकाल लेगें और उसे दूसरे खाली डिब्बे में भर देगें। मान लीजिए कि कभी जांच हो भी जाए तो स्टाक पूरा मिलेगा, यानि जो आप ने फर्जी खरीदा वह भी और जो आपके स्टाक में था, वह भी मिल जाएगा। बताते हैं, कि जब आडिट वाले स्टाक की जांच करने आते हैं, तो सबसे पहले वह यह देखते हैं, कि सालभर में कितने रुपये के दवाओं की खरीद हुई, मान लीजिए कि दो करोड़ की हुई तो उसका दो फीसद के हिसाब से आडिट टीम को चार लाख देना होता है, अगर चार लाख उन्हें मिल गया तो वह ओके का मोहर लगाकर चले जाएगें, ओैर नहीं मिला तो स्टोर में जो दवा का डिब्बा रखा रहता है, उसे भी खंगालते हैं, और देखते हैं, कि कहीं इसमें से आधा निकालकर दूसरे डिब्बे में तो नहीं भरा गया। एक-एक डिब्बे की जांच करेगें और देखेगें कि डिब्बे में टेबलेट का दस पत्ता हैं, कि नहीं? अब आप लोग यह भी सोचते होगें कि खाली डिब्बा आता कहां से आता हैं, तो इसमें कुछ तो आपूर्तिकर्त्ता उपलब्ध कराता है, और कुछ तो स्टोर इंचार्ज पहले ही जमा करके रखे रहते है। कहने का मतलब खाली डिब्बा इस लिए जमा किया जाता है, ताकि उसी में भरे हुए डिब्बे में आधा निकालकर रखा जा सके। इस पूरे मामले में जेम पोर्टल प्रभारी डा. मनोज चौधरी की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। यही वह डाक्टर हैं, जो फर्जीवाड़ा करने वाले आपूर्तिकर्त्ता को जेम पोर्टल के टेंडर पर एल-1 करते है। क्यों कि जब तक इच्छित ठेकेदार को एल-1 नहीं करेगें तब तक फर्जीवाड़ा नहीं होगा। इस तरह अगर एक साल में एक करोड़ की दवा खरीदी गई तो पूरे के पूरे पैसे का बंदरबांट हो जाता है।