बस्ती। ‘सबका साथ सबका विकास’ का नारा लेकर चलने वाली भाजपा के नारे का सच कम से कम बस्ती में तो नहीं दिखाई दे रहा है। अगर दिखाई देता तो घोषित जिला कार्यसमिति में मनमोहन श्रीवास्तव उर्फ काजू का नाम अवश्य होता। यह नाम ऐसा हैं, जिसने अपनी मेहनत और लगन से पार्टी को मजबूती प्रदान किया। पार्टी का कोई भी ऐसा कार्यक्रम नहीं जहां पर इनकी भागीदारी न रही हो। इनका अधिकांश समय पार्टी की सेवा में बीता, पार्टी के लिए इन्होंने अपने पेशे को भी किनारे कर दिया, उसके बाद भी अगर ऐसे निष्ठावान कार्यकर्त्ता को सम्मान नहीं मिलेगा तो फिर किसे मिलेगा? यह सवाल उन लोगों से हैं, जिन्होंने 2027 को फतह करने की रणनीति बनाई, बात सिर्फ मनमोहन श्रीवास्तव उर्फ काजू की नहीं हैं, बात तो उस कायस्थ समाज की हैं, जिसे पार्टी ने उपेक्षित किया। 23 पदाधिकारियों में से एक भी कायस्थ का नाम न होना कायस्थों को अपमान करने जैसा माना जा रहा है। ऐसा भी नहीं कि इस वर्ग के वोटर्स नहीं है। सवाल उठ रहा है, कि जब पार्टी अनूप खरे जैसे लोगों की पत्नी को पालिका अध्यक्ष का टिकट दे सकती है, तो किसी काजू जैसे कायस्थ को क्यों नहीं पदाधिकारी बना सकती? आखिर इस वर्ग के लोगों ने पार्टी का क्या नुकसान किया? क्यों इस वर्ग की इतनी उपेक्षा की गई?
इसे लेकर सोशल मीडिया पर खूब कमेंट हो रहें है। कहा जा रहा है, कि ऐसा लगता है, कि पार्टी को अब कायस्थों की कोई आवश्यकता नहीं है। अगर आवश्यकता नहीं है, तो फिर सबका साथ और सबका विकास का नारा क्यों पार्टी दे रही है? सवाल उठ रहा है, कि आखिर जिले का कायस्थ वर्ग कौन सी कुर्बानी दे कि पार्टी उसका सम्मान करें। काजू जैसे न जाने कितने इस वर्ग के कार्यकर्त्ता होगें जो पदाधिकारियों की सूची देखकर निराश होगें। सूची को देखकर सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है, कि जब पार्टी गांजा और स्मैक तस्कर एवं हिस्टीशीटर को सभासद मनोनीत कर सकती है, तो साफ-सुधरी छवि एवं पढ़े लिखे मनमोहन श्रीवास्तव उर्फ काजू को क्यों नहीं पदाधिकारी बना सकती? क्या मनमोहन श्रीवास्तव गांजा, स्मैक एवं हिस्टीशीटर से कम योग्यता रखते या फिर इन्होंने पार्टी की तस्करों की अपेक्षा कम सेवा की। क्यों बार-बार कार्यकर्त्ताओं को यह एहसास कराया जा रहा है, कि उन्हीें लोगों को पद मिलेगा जो जिसे महामहीम चाहेगें? जिस पार्टी में ऐसी प्रथा का समावेश हो जाए, उस पार्टी का भगवान ही मालिक होता है। फरजान काजी लिखते हैं, कि भाजपा में अच्छे लोगों की अब जरुरत नहीं रह गई। सुधीर यादव लिखते हैं, काजू जैसे सक्रिय कार्यकर्त्ता को कमेटी में शामिल न करना दुभार्ग्यपूर्ण है। कंहैयालाल लिखते हैं, कि काजू भईया को टीम में शामिल करना चाहिए था। भाजपा के ऋषभी श्रीवास्तव लिखते हैं, कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को इस बात पर ध्यान देना चाहिए, कि कायस्थ का नाम क्यों? शुभम श्रीवास्तव लिखते हैं, कि काजू कोरोना काल के दिनों से सघंर्ष कर रहे हैं, इनकी जगह बनती थी। सरदार कुलवेंद्र सिंह मजहबी लिखते हैं, विधायक की सूची में इनका नाम रहेगा। मनोज सिंह लिखते हैं, कि भाजपा में अब कर्त्तव्यनिष्ठ एवं पार्टी के प्रति समर्पित कार्यकर्त्ताओं को पद नहीं मिलता, चापलूस और हर बात पर यस कहने वालों को मिलता। सुरेंद्र उपाध्याय लिखते हैं, कि वैसे भी भाजपा का समय समाप्त हो गया। गोपेशपाल लिखते हैं, कि निष्चित ही काजू श्रीवास्तवजी पार्टी के प्रति समर्पित कार्यकर्त्ता हैं, सभी के सुखदुख शामिल होते है। दिनेश कुमार पांडेय लिखते हैं, कि काजू भैया को भाजपा पदाधिकारी बनने से पार्टी मजबूत होती। सिद्वार्थ श्रीवास्तव लिखते हैं, कि शहर से भाजपा का वोट कट गया, वैसे भी यूजीसी ने कमाल किया।
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