बस्ती। अभी तक आप लोगों ने अनेक खून चूसिया डाक्टर्स के बारे में सुना, देखा और पढ़ा होगा, लेकिन आज हम आपको ऐसे डाक्टर्स के बारे में बताने जा रहे हैं, जो इंजेक्षन और टेबलेट के नाम पर बहुत बड़ा खेल मरीजों के साथ खेल रहे है। इसे सुन और पढ़कर आप लोग भी यह सोचने पर मजबूर हो जाएगें, कि क्या यह वही डाक्टर्स हैं, जिसे मरीज भगवान का दर्जा देता हैं? इनके इस खेल से पैसों के साथ-साथ मरीजों के शरीर को भी नुकसान पहुंच रहा है। नुकसान पहुंचाने का आशय पैसा कमाने के लिए जहां पर मरीज एक इंजेक्षन लगने से ठीक हो सकता, वहीं यह लोग आठ-दस टेबलेट खिलाते है। मान लीजिए कि अगर डाक्टर्स निरंतर किसी मरीज को दर्द और गैस का टेबलेट देते हैं, तो उससे किडनी और लीवर दोनों के नुकसान पहुंचने की संभावना बनी रहती है। वहीं इंजेक्षन लगाने से कोई भी खतरा नहीं रहता, क्यों कि टेबलेट अधोमानक हो सकता है, लेकिन इंजेक्षन अधोमानक नहीं हो सकता। इंजेक्षन में कोई कमीशन नहीं मिलता, लेकिन टेबलेट में कमीषन ही कमीशन मिलता, बल्कि कंपनियां टेबलेट लिखने के लिए आवास और नर्सिगं होम दोनों बनाकर दे रही हैं। अब आप लोग समझ गए होगें कि डाक्टर्स इंजेक्षन क्यों नहीं लगाते? आज तक आप लोगों ने कभी इंजेक्षन का नमूना फेल होते नहीं सुना होगा, लेकिन टेबलेट और सिरप का न जाने कितनी बार नमूना फेल होते सुना होगा। टेबलेट और सिरप बनाने वाली 20 हजार से अधिक कंपनियां मिल जाएगी, लेकिन इंजेक्षन बनाने वाली मुस्किल से 20 कंपनियां मिलेगी। ध्यान रहे, इंजेक्षन किसी भी हालत में अधोमानक नहीं बन सकता, लेकिन टेबलेट और सिरप बन सकता है। टेबलेट और सिरप में डाक्टर्स को 300 फीसद तक कमीशन मिलता है, लेकिन इंजेक्षन में उन्हें एक फीसद भी कमीशन नहीं मिलता। स्वास्थ्य विभाग की गाइड लाइन के अनुसार अगर किसी अस्पताल में मरीज भर्ती हैं, तो 80 फीसद इंजेक्षन और 20 फीसद टेबलेट मरीजों को देना चाहिए, लेकिन हो रहा उल्टा, पैसा कमाने के लिए 20 फीसद इंजेक्षन और 80 फीसद टेबलेट दिए जा रहें हैं। कहना गलत नहीं होगा, कि अगर कहीं बेहोषी का टेबलेट बनता तो उसे भी लिखाकर डाक्टर्स तीन चार हजार वसूल लेते। अधोमानक टेबलेट तो टिन के षेड के नीचे, भगौना एवं कड़ाई में भी बनाया जा सकता, लेकिन इंजेक्षन नहीं।
पैसों के लिए अधिकांश डाक्टर्स अपना जमीर और ईमान तक बेच रहें हैं, ऐसे डाक्टर्स को मरीजों के जीने या फिर मरने की कोई चिंता नहीं रहती, इन्हें तो अधिक से अधिक पैसा कमाने की चिंता रहती है। जिले में अधिकांश नामचीन नर्सिगं होम के संचालकों ने पैसों को ही अपना धरम और ईमान बना लिया। यह हिमांचल और उत्तराखंड के बदनाम दवा बनाती वाली कंपनियों से बाकायदा, करोड़ों का अनुबंध करती है, जिले में लगभग 20 ऐसी बदनाम कंपनियां हैं, जिनका अनुबंध नामचीन नर्सिगं होम के संचालकों से है। मैलकाम नामक कंपनी का अनुबंध एक ऐसे नामचीन नर्सिगं होम के संचालक के साथ हैं, जो सिर्फ टेबलेट और सिरप लिखने के लिए हर साल करोड़ों रुपया देती है। सबसे अधिक अधोमानक दवा लिखने का आरोप भी मरीजों के द्वारा इसी नामचीन नर्सिगं होम के संचालक पर नियमित लगाया जा रहा है। ऐसे भी अनेक खून चुसवा डाक्टर्स हैं, जिन्हें खुद नहीं मालूम कि उनके पास कितनी दौलत है। ऐसे डाक्टर ने अपने पेशे को गिरवी रखकर और बेचकर दौलत एकत्रित किया। इन लोगों ने अपनी छवि को इतना खराब कर दिया, कि कोई भी इन्हें इज्जत की नजर से नहीं देखना पसंद नहीं करता। यहां तक कहते हुए सुना गया, कि देखों खून चुसवा डाक्टर जा रहा है। यह इतने बिकाउ हो चुके है, कि इन्हें कोई भी अधोमानक दवा बनाने वाली कंपनी वाला आसानी से खरीद सकती है।
बच्चों के एक नामचीन और बदनाम डाक्टर हैं, जिनका आवास और नर्सिगं होम मेडिकल स्टोर के अग्रवालजी ने इस षर्त पर बनवाया, कि वह वही दवा लिखेगें, जो हम कहेगें। दवा पर कोई कमीशन भी नहीं मिलेगा। लगभग चार-पांच करोड़ का नर्सिगं होम बनकर तैयार हो गया, आज आठ साल हो गए, अग्रवालजी ने लगाया पांच करोड़, कमाया 16 करोड़, यह सिर्फ आठ साल की कमाई है। ऐसा भी नहीं कि इन आठ सालों में खून चुसवा डाक्टर ने कमाया नहीं होगा, इतना कमाया कि लोग सोच भी नहीं सकते, अब तो इनका नाम 100 करोड़ के क्लब में भी शामिल हो गया, चूंकि यह जमीन का कारोबार भी करते हैं, और इन्होंने डा. ताहिर की तरह न जाने किनी माओं की गोद को सूना किया होगा। इन्हें जिला अस्पताल से जबरिया लाया गया, ताकि खुलकर अग्रवालजी और डाक्टर मिलकर लूटपाट कर सके। अभी तक आप लोगों ने अधोमानक दवा बनाने वाली कंपनियों को ही डाक्टर का नर्सिगं होम, बेटा बेटी की षादी और रिसेप्षन का खर्चा उठाते सुना होगा, लेकिन यह नहीं सुना होगा, कि कोई मेडिकल स्टोर वाला भी डाक्टर का आवास और नर्सिगं होम बनवाकर डर्टी डील कर सकता है।
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