बस्ती। पत्रकार संगठनों के पदाधिकारियों का दायित्व माला पहनने से ही नहीं पूरा हो जाता, उन्हें यह साबित करना पड़ेगा कि उन्होंने जो शपथ खाई हैं, उसे पूरा करेगें, अब तो शपथ-ग्रहण समारोह पर ही सवाल उठने लगें है। शपथ ग्रहण होते ही इसके पदाधिकारी यह भूल जातें हैं, कि इन्हें अपने दायित्वों का भी निवर्हन करना है। पत्रकार संगठनों और उनके पदाधिकारियों की स्थित यह हो गई, कि वह तमाशवीन बन कर रह गए हैं, कोई पत्रकार मारापीटा जाए या कोई किसी पत्रकार को नेता अपमानित करें, पत्रकार संगठनों से कोई मतलब नहीं रहता। यह इतने कमजोर होते जा रहें हैं, कि एक निंदा प्रस्ताव तक पारित नहीं करते, साथ में चलना, धरना प्रदर्शन और पत्राचार करना तो बहुत दूर की बात है। हाल की दो घटनाओं ने पत्रकार संगठनों के पदाधिकारियों की पोल खोलकर रख दी, लोगों को पता चल गया कि संगठन के पदाधिकारी कितना डरपोक और कमजोर है। अभी तक तो जनता इन्हें कमजोर और डरपोक कहती थी, अब तो पत्रकार भी इन्हें कमजोर और डरपोक कहने लगें। सवाल उठ रहा है, कि जब पत्रकार को अकेले ही झेलना है, तो फिर संगठन का दामन क्यों पकड़ा जाए? जो पत्रकार बिना किसी संगठन से जुड़े अपने दायित्वों का निवर्हन कर रहे हैं, वह उन पत्रकारों से अधिक सुखी हैं, जो किसी संगठन से जुड़े हुएं है। कम से कम उन्हें कोई अफसोस तो नहीं होगा। जो संगठने अपने सदस्यों के हितों की रक्षा नहीं कर सकतें है, उसके लिए खड़ा नहीं हो सकतें, ऐसे संगठनों के होने और न होने का क्या मतलब? बार-बार कहा जा रहा है, कि पत्रकारों को अपने दम पर पत्रकारिता करना चाहिए, किसी संगठन के भरोसे नहीं।

वैसे भी पत्रकारों की स्थित बहुत ठीक नहीं है। अगर कोई पत्रकार कोई खबर लिखता या चलाता है, तो वह खबर किसी के पक्ष में हो सकता हैं, या फिर विपक्ष में, पक्ष में गया तो कोई बात नहीं अगर विपक्ष में गया तो उसे गालियां मिलेगी, मार भी खाना पड़ेगा, अपमानित भी होना पड़ेगा, जलालत भीे झेलनी पड़ेगी और मुकदमें का दंश भी झेलना पड़ेगा। सवाल उठ रहा है, कि इसमें आखिर पत्रकारों का क्या कसूर? क्यों इसकी सजा अकेले पत्रकारों को ही मिलती है? आखिर इन सबके लिए कौन जिम्मेदार? संगठनें, जनता, संपादक या फिर प्रशासन? जिस तरह पत्रकार बिना सबूत और पक्ष के खबर नहीं लिखता, ठीक उसी तरह उसे अपमानित करने और मारने से पहले पत्रकार की गलती क्यों नहीं पूछी जाती? पत्रकार को ही क्यों अपमानित और मारा जाता, क्यों कि उस संपादक को मारा और अपमानित किया जाता, जिसने खबर को प्रकाशित किया? जब पत्रकारों को ही अपमानित और मार खानी है, तो उन्हें चौथा स्तंभ क्यों कहा जाता है? क्या मार खाने के लिए उन्हें चौथा स्मंभ कहा जाता? अगर समाज की निगाह में पत्रकार चौथा स्तंभ हैं, तो फिर वही समाज पत्रकारों को अपना दुष्मन क्यों समझती है? अगर चौथा स्तंभ कमजोर है, तो संगठने कैसे मजबूत हो सकती है? इस लिए अगर संगठनों को मजबूत होना है, तो उन्हें चौथे स्तंभ को मजबूत करना होगा। पता नहीं पत्रकारों को ऐसा क्यों लगता जा रहा है, कि वह जिस संगठन से जुड़ा हुआ है, उस संगठन का पदाधिकारी इतना कमजोर क्यों होता जा रहा हैुं? अगर किसी संगठन का अध्यक्ष कमजोर हो जाएगा, तो संगठन और उसके सदस्य कैसे मजबूत होगें? यह सवाल उन जिलाध्यक्षों के लिए है, जो कमजोर साबित हो रहें, जिलाध्यक्षों को ऐसा कोई भी काम नहीं करना चाहिए, जिससे उनका सिर एक सदस्य के सामने झुक जाए। कोई किसी को कुछ भी नहीं देता, लोग एक दूसरे को सम्मान और प्यार ही देते हैं, अगर यह सम्मान और प्यार भी नहीं रहा तो फिर अपना जताने और कहने का कोई मतलब नहीं। जब भी पत्रकारों पर कोई आफत आती है, तो न तो संगठनें दमदारी से आवाज उठाती, और न प्रषासन ही कोई मदद करता, नेता निंदा तक नहीं करतें, बल्कि कहते हैं, कि चलो पीटा गया अच्छा हुआ, बहुत ईमानदारी दिखा रहा था, यही सच हैं, और इसी सच के साथ अगर पत्रकारिता करनी हो तो करिए, नही ंतो परचून की दुकान खोलकर जीवनयापन करिए, मजे में रहिएगा, फिर जीभरके उन्हें गाली दिजीएगा, जिसने आपकी मुसीबत में मदद नहीं की। ध्यान देने वाली बात यह है, कि सांसद और विधायकों की तरह भी पत्रकारों का पेट और परिवार होता है। उनका संस्थान तो उन्हें कोई वेतन तो देता नहीं, अलबत्ता पत्रकार बनने का शुल्क अवष्य ले लेता है। आज के अधिकांष पत्रकारों के सामने रोजी रोटी का संकट है। मुफलिसी के बावजूद अगर कोई पत्रकार ईमानदारी से अपने दायित्वों का निवर्हन करता है, तो भी उसे चोर ही कहा जाता, इसके लिए और कोई नहीं बल्कि पत्रकार बिरादरी ही जिम्मेदार है। अगर किसी भ्रष्टाचारी ने पत्रकार को पीटा और पत्रकार संगठनें चुप रही तो उस भ्रष्टाचारी का मनोबल बढ़ेगा। अब सबसे बड़ा सवाल उठ रहा है, कि जब पत्रकार ही पत्रकार का साथ नहीं देगा, तो प्रशासन क्यों देगा? अगर किसी को संगठनों और संपादकों का सच देखना हो तो उसे पत्रकार विपिन बिहारी त्रिपाठी और विनोद जायसवाल के पास जाना चाहिए। कोई भी अध्यक्ष संगठन की परिभाषा बदलने का प्रयास न करें, कोई भी संगठन इस लिए नहीं बनता कि मौके पर खड़ा न हों, संगठनें इसी लिए बनाइ जाती है, ताकि पीड़ित पत्रकार अपने आपको अकेला न समझें।