बस्ती। सवाल उठ रहा है, कि अगर सीमा खरे पालिका की चेयरर्पन होती तो नगर पालिका का क्या होता? अब आप लोगों की समझ में आ गया होगा, कि जनता ने सीमा खरे को क्यों नहीं नगर पालिका अध्यक्ष चुना? अगर चुन ली गई होती तो पालिका का क्या होता? इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। एक बात तय है, कि देनदारी अवष्य समाप्त हो जाती, और आर्थिक स्थित इतनी मजबूत हो जाती कि कई होटल और स्कूल खुल जाते। लोगों को आज तक यह पता नहीं चला कि जिसके लिए सांसदजी चुनाव में पूरे दमखम के साथ लगे रहें हो, वह कैसे हार गया? भाजपा वालों ने हराया या फिर जनता ने खरे की छवि को देखकर भाजपा प्रत्याशी को वोट नहीं दिया। भाजपा का परम्परागत वोट भी सीमा खरे को नहीं मिला। सत्ता का लाभ भी भाजपा नहीं उठा पाई। यह नगर पालिका के लोगों का दुभागर््य हैं, कि वह जिसे ईमानदार समझकर अध्यक्ष चुनती, वही बेईमान निकल जाता। कोई छोटा तो कोई बड़ा बेईमान, लेकिन निकलते सभी बेईमान। जब अशोक गुप्त और अशोक कुमार श्रीवास्तव जैसा ईमानदार कहे और जाने जाने वाला व्यक्ति बेईमान अध्यक्ष साबित हो सकता है, तो कोई भी हो सकता है। सबसे खराब इतिहास महिला चेयरपर्सन का रहा। लोगों ने महिला समझकर वोट दिया, लेकिन उन्हें क्या मालूम था, कि पालिका की बागडोर महिलाओं के हाथ में नहीं बल्कि उनके पतियों के हाथ में रहेगी। यही कारण रहा कि दुबारा कोई चेयरमैन नहीं बन पाया। चेयरमैन बनने के बाद राजनीति भविष्य पर पूर्ण विराम लग जाता है। क्यों लग जाता है, इसका मंथन वर्तमान के चेयरपर्सन को करना चाहिए। याद कीजिए, कहां हैं, अशोक गुप्त और अशोक श्रीवास्तव।

कहना गलत नहीं होगा, कि बस्ती के पालिका पर अब तक बेईमान अध्यक्ष/चेयरपर्सन ने ही राज किया। कुछ ऐसे भी अध्यक्ष हुए, जिन्होंने शपथ-ग्रहण के दिन से ही बेईमानी शुरु कर दी। कुछ ने बीच में किया तो कुछ ने शुरु से अंत तक बेईमानी ही बेईमानी किया। पालिका के लोग यह मान कर चल रहे हैं, कि अब उन्हें आईडिएल अध्यक्ष नहीं मिलने वाला हैं, उन्हें बेईमानों से ही काम चलाना होगा। ईमानदार अध्यक्ष होना तो भूल जाना चाहिए। कहते हैं, कि जिस पार्टी के लोग ही बेईमान होते हैं, और पैसा लेकर टिकट देते हैं, तो ऐसे में किसी आईडिएल अध्यक्ष का सपना देखने का मतलब खुद को धोखा देने जैसा होगा। एक बहुत ही जानकार का कहना है, कि अध्यक्षों को पैसा और पालिका के लोगों कर दिल जीतना नहीं आता। कहते हैं, कि अगर पांच साल में शुरुआत के दो साल भी ईमानदारी से विकास के नाम पर धन खर्च कर दिया, और अगर वह आखिरी के तीन साल तक बेईमानी करता रहा तो जनता उसे उतना बेईमान और चोर नहीं कहेगी, जिनता अन्य लोगों को अभी तक कहती आई है। जिस भी अध्यक्ष ने पालिका को ईमानदारी से दो साल दे दिया, उसने तीन साल तक पैसा भी कमाया और इज्जत भी, और जो लोग पूरा पांच साल तक बेईमानी करते हैं, उन्हें पैसा तो मिल जाता है, लेकिन इज्जत नहीं मिलती। ऐसे लोगों को कुर्सी पर उतरने के बाद पालिका का चपरासी भी सलाम नहीं करता, सुनना और    काम करना तो बहुत दूर की बात है। सभासदों को भी अगर दुबारा चुनाव जीतना है, तो दो साल तक ईमानदारी दिखानी होगी। जब भी कोई चेयरमैन कुर्सी से उतरता तो जनता कहती कि यह तो पहले वाले से भी बड़ा बेईमान निकला। कहने का मतलब हर आने वाला चेयरमैन जाने वाले से बड़ा बेईमान साबित होता है। जब पालिका के लोगों के किस्मत में ही बेईमान अध्यक्ष लिखे हैं, तो ईमानदार कहां से आएगें।