बस्ती। अगर ‘सुभाष शुक्ल’ जैसा जिम्मेदार, संभ्रात और बड़ा कारोबारी एवं पदाधिकारी सोषल मीडिया पर अनूप खरे के बारे में यह लिखे कि कोई ‘ऐसा सगा नहीं जिसे इन्होंने ठगा नहीं’, तो ‘अनूप खरे’ के बारे में लोगों को जान और समझ लेना चाहिए, कि समाज में इनकी छवि कैसी है? सुभाष शुक्ल उस ‘संकटा प्रसाद शुक्ल’ के भतीजे हैं, जिन्होंने अनूप खरे पर उनका फर्जी हस्ताक्षर और दस्तावेज के जरिए करोड़ों के लोन का गारंटर बनाने की शिकायत करते हुए जांच करने की मांग कर चुके है। श्रीशुक्ल ने जो बात अनूप खरे के बारे में कही, वह इन्होंने दूसरे के अनुभव के आधार पर नहीं, खुद को ठगे जाने के अनुभव के आधार पर कही। इन्होंने अनूप खरे की आज से 24 साल पहले तब चार लाख का कर्ज गांरटर बनकर दिलाया, जब इन्हें कोई सौ रुपया भी उधार देना पसंद नहीं करता था। गारंटी के रुप में श्रीशुक्ल को एडवांस चेक देना पड़ा। शुक्लजी की दरियादिली तो देखिए यह सूद का 12 हजार रुपया हर महीने खुद चुकाते थे। इन्हांेने न सिर्फ पैसे से मदद करवाया, बल्कि दुकान से सामान भी दिया। 2008 तक रकम बढ़कर लगभग नौ लाख हो गई, सूद का पैसा और सामान देते-देते जब षुक्लजी की माली हालत खराब हो गई और इन्हें कारोबार के लिए जब पैसे की आवष्यकता पड़ी तो इन्होंने अनूप खरे से पैसा मांगना शुरु किया, तब खरेजी ने कहा कि मुझे 15 लाख का बैंक से लोन दिला दीजिए, लोन में से आप को नौ लाख देकर हिसाब चुकता कर देंगे। आप लोगों को जानकर हैरानी होगी कि शुक्लजी ने अर्बन बैंक से 15 लाख का लोन भी दिला दिया, और खुद गारंटर बन गए। वायदे के मुताबिक नौ लाख देना था, लेकिन दिया पांच लाख, चार लाख नहीं दिया, बाद में काफी दबाव के बाद इनकी पत्नी ने दो लाख का चेक दिया। अभी भी लाख से अधिक बकाया है। दुखी मन से शुक्लजी कहते हैं, इससे उन्हें बहुत बड़ा सबक मिला।
बैंक के लोन की अदायगी जब नहीं हुई तो बैंक ने गारंटर को नोटिस भेजा और कहा कि बकाया दिलाइए, नहीं तो आप से वसूली की जाएगी। इसी बीच शुक्लजी का सिविल भी गारंटर बनने के कारण खराब हो गया। जब शुक्लजी को बैंक की नोटिस मिली तो यह और इनका परिवार घबड़ा गया, और भागा-भागा बैंक मैनेजर के पास पहुंचें। बैंक मैनेजर ने कहा कि शुक्लजी आप का नाम तो गारंटर से नहीं हटा सकते, लेकिन आप चिंता मत करिए। फिर बैंक ने अपने हिसाब से वसूली करना शुरु कर दिया, रोज बैंक की वसूली वैन और रिकवरी टीम सीएमएस स्कूल पहुंच जाती, और जो मिलता लेकर चली आती। इस तरह लोन का चुकता हुआ। 2010 के बाद जब पहली बार विधानसभा का चुनाव हरीष द्विवेदी लड़े थे, तो अनूप खरे उन्हीं के साथ हो लिए। शुक्लजी का कहना है, कि खरेजी उन्हीं लोगों को निशाना बनाते थे, जो उनके साथ रहता, या फिर जिसने इनकी मदद की। जब यह अपनी सगी भांजी और उसके पति के नहीं हुए, तो समझ जाइए, कि यह किसके हो सकते है। इनके चलते ही लोग गांरटर बनना और मदद/उधार देना बंद कर दिया। कोई इनपर जल्दी विष्वास करने को तैयार नहीं, जितने मुकदमें न्यायालय में इनके और भतीजा के खिलाफ चल रहे हैं, अगर उतना मुकदमा किसी को झेलना पड़ता तो उसका पता नहीं क्या हो जाता? जब भी इनका या फिर इनके भतीजे का नाम कहीं आता है, तो लोग तारीफ नहीं करते, बल्कि न जाने क्या-क्या कहते हैं? अनिल कुमार यादव लिखते हैं, कि ये तो बहुत बड़ा जालिया निकला, यह कुर्सी मेज जबतक बनाता था, तब तक ठीक था। सुधाकर शाही लिखते हैं, कि बहुत लोगों का पैसा खा लिया, किसी से 80 लाख तो किसी से 50 लाख तो किसी से एक करोड़।
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