बस्ती। ‘शुक्लजी’ और ‘त्रिपाठीजी’ के बीच जमीन को लेकर वाद विवाद हुए लगभग छह दिन होने को हैं, लेकिन प्रशासन की ओर से एफआईआर को लेकर कोई निर्णय नहीं लिया गया। जब कि अब तो शुक्लजी की ओर से भी तहरीर दी जा चुकी है। प्रशासन चाहे तो क्रास एफआईआर भी दर्ज करवा सकता है। यकीन मानिए, जिस दिन एफआईआर दर्ज हो गया, भले ही क्रास ही क्यों न दर्ज हो, उस दिन से आधा विवाद समाप्त हो जाएगा, सोशल मीडिया पर जो वाण छोड़े जा रहे हैं, वह बंद हो जाएगा। प्रशासन पर दबाव भी नहीं रहेगा। फिर किसी को लगाने-बझाने का मौका भी नहीं मिलेगा, दोनों पक्ष कोर्ट कचहरी और वकील साहब के चक्कर में पड़ जाएगें। लेकिन यह सब तब होगा जब एफआईआर दर्ज होगा, और जमीन की पैमाईश होगी। दोनों नहीं हुआ, जमीन की पैमाईश के लिए अभी तक दोनों पक्षों में किसी ने भी सरकारी शुल्क तक जमा नहीं किया। लेखपाल की माने तो जमीन की पैमाईश करना उतना आसान नहीं हैं, जितना लोग समझ रहे है। क्यों कि अधिकांश लोगों का गाटा संख्या इधर उधर हो गया, यानि जमीन कहीं और मकान कहीं और बन गया। जिस जमीन को लेकर विवाद चल रहा है, उसकी भी अगर ठीक से पैमाईश की जाए तो कुछ जमीन नाला तो कुछ रास्ता तो कुछ बने मकान में मिलेगा। जो बैनामे के जरिए जमीन खरीदी गई है, उसके गाटा संख्या की पैमाईश हो सकती है। क्योंकि वह आबादी में घोषित है। सवाल उठ रहा है, कि ऐसे में विवाद का हल निकले तो कैसे निकले? समझौता होने की तो बहुत दूर की बात है, दोनों पक्ष एक टेबुल पर बैठने को तैयार नही। सवाल उठ रहा है, कि ऐसे में मामले का निस्तारण होगा तो कैसे होगा? बात इतनी आगे बढ़ चुकी है, कि आपसी समझौते का रास्ता तक बंद हो चुका है। विवाद होने से पहले सुलह सपट की संभावना थी, लेकिन विवाद होने के बाद वह भी लगभग समाप्त हो गया। लोग अक्सर कहते भी है, कि कोई हमारा किसी से जमीन का झगड़ा है, नहीं कि सुलह नहीं हो सकता। कहने का मतलब अगर कोई विवाद दो पक्षों में जमीन को लेकर होता है, तो उसके सलटने की संभावना न के बराबर होती है, क्यों कि लोग अक्सर इसे अपने मान सम्मान और मूंछ से जोड़ लेते है। मंूछ नीचे न हो भले ही चाहें सबकुछ दांव पर लग जाए। ऐसे लोगों को शायद यह नहीं मालूम कि इसी मूंछ के चलते न जाने कितने परिवार तबाह हो चुके हैं, उनकी खुशियां चली गई, मुकदमा लड़ते-लड़ते जमीन, मकान और जेवर तक गिरवी या बिक चुके है। फिर भी फैसला नहीं होता, घर का मुखिया मुकदमा लड़ते-लड़ते स्वर्गवासी हो जाते हैं, लेकिन उन्हें वह दिन देखने को नशिब नहीं होता, जिसके लिए उन्होंने अपनी पूरी जवानी कोर्ट कचहरी का चक्कर में बर्बाद कर दिया। घर तक बर्बाद हो जाता है, और यह सब कुछ एक जमीन के टुकड़े के लिए होता है। आपसी दुष्मनी बढ़ जाती, भाईचारा समाप्त हो जाता है। आज न्यायालयों और तहसीलों में सबसे अधिक मुकदमें जमीन को लेकर ही लड़े जा रहे है। यह उस झूठी शान का नतीजा हैं, जिसमें यह कहा जाता है, कि भले ही चाहें पैसा, जायदाद और इज्जत चली जाए, लेकिन मूंछ नीचे नहीं होनी चाहिए।

एक केजी क्लास के बच्चों को भी यह मालूम हैं, कि जमीनी विवाद होना ठीक नहीं हैं, क्यों कि इसके चलते न जाने क्या-क्या बर्बाद हो जाता हैं। सवाल उठ रहा है, कि जब एक केजी क्लास का बच्चा यह समझ सकता है, तो बुद्वजीवि लोग क्यों नहीं समझ रहें है? जमीनी विवाद के चलते ही न जाने कितने परिवार को अपनों को खोना पड़ा होगा। फिर सवाल उठ रहा है, कि जो काम आपसी सुलह समझौते से हो सकता है, उसके लिए क्यों मुकदमेंबाजी और वाद विवाद किया जाए? फिर कहा जा रहा है, कि मनी और पावर वह सबकुछ कराती है, जिसे कभी सपने भी नहीं सोचा जा सकता। अगर किसी के पास मनी है, तो वह उसका उपयोग/दुरुपयोग करता है, और अगर किसी के पास पावर का तो वह भी उसका उनयोग/दुरुपयोग करने का प्रयास करता है, और अगर किसी के पास दोनों होता है, वह अपने अतीत को भूल जाता है। हालांकि कि अंत में नुकसान तो दोनों का ही होता है, किसी का कम तो किसी का अधिक। लेकिन नुकसान तो होता ही है। अगर कोई समझ सके तो समझ ले, कि दुनिया में इज्जत से बढ़कर कोई दौलत नहीं होती, और जिसने इस दौलत को मनी और पावर के घमंड में खो दिया, समझो उसने सबकुछ खो दिया। वाद-विवाद करने वालों को यह नहीं भूलना चाहिए, कि लोगों को इसी बहाने अपना उल्लू सीधा करने का मौका मिल जाता है। चढ़ाने वाले, इधर-उधर करके आग लगाने वाले तो बहुत मिल जाएगें, लेकिन जरा सोचिए आप को क्या मिला? बदनामी और टेंषन। मीडिया बार-बार कह और लिख रही है, कि इतिहास गवाह है, कि छोटी-छोटी घटनाएं ही बड़ा रुप लेती है, इस लिए इससे बचिए। क्यों कि अंत में झेलना तो दो परिवारों को ही पड़ता है? एक समय ऐसा भी आता है, जब कोई काम नहीं आता, इस लिए जमीन को लेकर वाद विवाद से बचिए, जो इससे बच गया, वह और उसका परिवार सुखी और चैन की नींद सोया। इस लिए समझदारी इसी में है, कि समझदारी दिखाइए और अपने मान-सम्मान और इज्जत को बचाइए। सत्ता हमेषा किसी के साथ नहीं रहती। इसी जिले में जिले के लोगों ने ऐसे-ऐसे सूरमा को भी देखा जिनके मूतने से वाकई दीया जलता था, लेकिन अब वह दीया बुझ चुका है, और उस दीए को बुझाने वाला कोई और नहीें बल्कि मनी और पावर का घमंड से बुझा। लोग कहते भी है, क्या जमीन जायदात लेकर उपर जाना, जानते हुए भी मारामारी करते है।