बस्ती। परिवारवाद का जहर राजनैतिक संगठनों की तरह अराजनैतिक संगठनों में भी तेजी से फैल रहा है। सिख समाज के बाद यह जहर ब्राहृमण महासभा में फैल गया। महासभा के लल्लू पांडेय का कहना है, कि परिवारवाद के कारण अनेक संगठनें जीरो हो गई। इन्होंने इसके राष्टीय अध्यक्ष अशोक कुमार शुक्ल से कहा कि ब्राहृमण महासभा के उत्थान के लिए कठोर कदम उठाना आवष्यक हो गया हैं, जो लोग कार्य करने में असमर्थ या फिर जिनकी आयु अधिक हो चुकी है, उन्हें पदमुक्त कर उनके स्थान पर उर्जावान लोगों को जिम्मेदारी दी जाए। पूछा कि बिना किसी पूर्व निर्धारित कार्यक्रम और बिना किसी सहमति के कैसे राष्टीय पदाधिकारी की नियुक्ति हो गई? क्यों ऐसे निर्णय से महासभा की गरिमा एवं प्रतिष्ठा पर प्रष्नचिंहृ लग रहा है। आकाश पांडेय कहते हैं,  िकवह राष्टीय अध्यक्ष का बहुत सम्मान करते, लेकिन न जाने वह किसके मोह में मौन है, यह समझ में नहीं आ रहा है, कहा कि जो छवि आपकी है, उसे बनाए रखिए। डा. आशीश नरायन त्रिपाठी कहते हैं, कि परिवारवाद के चलते अगर किसी की नियुक्ति होती है, तो उसकी जिम्मेदारी अध्यक्ष की भी होती है, कहा कि भीष्मपितामह की तरह मौन रहने से संगठन में असंतोश की वेदना और पीड़ा सबको झेलनी पड़ती है। डा. अशीश नरायन त्रिपाठी कहते कि ब्राहृमण महासभा की चारदीवारी से बाहर निकलकर सड़क पर सबसे सामने उजागर हो गया, और यह सारे विवाद सार्वजनिक रुप से ब्राहृणत्व को अपना गौरव, महसूस करने वाले किसी भी ब्राहृमण व्यक्ति के लिए कुंठा और असंतोश की भावना पैदा करती। प्रशांत पांडेय कहते हैं, कि ब्राहृमण महासभा का भविष्य अब अध्यक्षजी के हाथ में है। आंेकार लिखते हैं, कि अध्यक्षजी ब्राहृमण महासभा में टेडर नीति कब से होने लगी, पंडितजी महाराज अब तो आखें खोलिए, लोग चीख-चीख कर कह रहे हैं, कि परिवारवाद हावी हो रहा है। भगवान परसराम की तरह ऐसे लोगों को सर्वनाष करिए। आप उदासीनता का परित्याग कर अपनी आंखों से अंधकाररुपी छाया हटाए। आकाष पांडेय लिखते हैं, कि जब राष्टीय ब्राहृमण महासभा का सब कुछ कार्यभार महामंत्री शंभूनाथ मिश्र के हाथ में है, कहां से कितना चंदा आया, कितना व्यय हुआ, किसे बुलाना किसे नहीं बुलाना है, तो इसका जबाव भी इन्हें ही देना पड़ेगा, महासभा की जमीन का बचाना है, तो इसके लिए महामंत्री को आगे आना होगा, और सारे आरोपों का जबाव देना होगा।