बस्ती। ब्राहृमण महासभा में जो पिछले 25 सालों में नहीं हुआ वह अब होने जा रहा है। एक तरह से कुछ ही दिनों बाद इस ब्राहृमण महासभा में नए युग की गाथा लिखी जाएगी। एक ऐसे युग का अंत होने जा रहा है, जो बहुत पहले हो जाना चाहिए था। इस संस्था को कुछ लोगों के चंगुल से आजाद कराने की जो लड़ाई यहां के लोग लड़ रहे हैं, उनकी मेहनत सफल होने वाली है। नई गाथा लिखने के बाद कोई किसी पर आरोप नहीं लगा सकता। ऐसी पारदर्शी व्यवस्था बनाने पर जोर दिया जा रहा है, जो शीषे की तरह साफ होगा। इसकी शुरुआत हो सकता है, कि पहली अगस्त से हो जाए। पहली बार किसी पदाधिकारी ने लिखित में 2002 से लेकर 2026 तक के आय और व्यय का हिसाब-किताब मय बिल बाउचर और कैशबुक के साथ मांगा है। महासभा के संयुक्त मंत्री विजय बिहारी तिवारी ने इस मामले में राष्टीय अध्यक्ष तीन प्रति उपलब्ध कराते हुए कहा कि अगर जानकारी उपलब्ध कराने में कोई शुल्क लगता हो तो उसे भी वह देने को तैयार है। कहा गया कि 20 जुलाई 26 की बैठक में राष्टीय उपाध्यक्ष सत्ते शुक्ल के निर्देश के क्रम में लिखित जानकारी मांगी जा रही है।
पांच बिंदुओं पर हिसाब-किताब मांगा गया। पहला 2002 से अद्यतन 2026 तक ब्राहृमण सभी में आजीवन सदस्यसें, सहयोगकर्त्ताओं, धन/सामग्री एवं परिसर में हर साल दुर्गा मूर्ति के उपयोग के लिए दि किराए के पंडाल द्वारा प्राप्त धनराशि की रसीद संख्या ाहित सूचना की किसने कितनी धनराशि/सामग्री दी। दूसरा, उक्त धनराशि किस मद में कितना खर्च किया गया, कैशबुक/बिल/बाउचर की छायाप्रति। तीसरा, कब-कब निर्माण समिति का गठन किया गया और कौन-कौन उसके प्रभारी, अध्यक्ष और सदस्य रहे। चौथा, संस्था के बैंक एकांउट के स्टेटमेंट साल 2002 से जुजाई 2026 तक की छायाप्रति या पासबुक की छायाप्रति और पांचवा, नकद धनराशि किसी पदाधिकारी द्वारा अपने पास रखे गए हैं, या नहीं, अगर रखे गएं हैं, ब्राहृमण महासभा का संबिधान/उपपिधि में क्या सीमा है, दोनों का उल्लेख हो, दिया जाए। अध्यक्षजी से कहा गया कि यह सारी जानकारी बैठक के पूर्व उपलब्ध कराया जाए, अगर कोई शुल्क लगता हो तो उसे भी भुगतान किया जाएगा। लिखित में यह हिसाब-किताब मांगने की आवष्यकता तब पड़ी, जब 24-25 सालों से मांगने के बावजूद भी नहीं दिया। जिस तरह के आरोप-प्रत्यारोप लग रहे हैं, उसे देखते हुए हिसाब-किताब देना आसान नहीं होगा। जितने भी आरोप लग रहे हैं, वह सबकुछ पारदर्शी हिसाब-किताब पर निर्भर है। इतना अविष्वास और असंतोष का संकट अन्य संस्थाओं में देखने को नहीं मिलता। जिस दिन यह दोनों संकट के बादल छट गए, उस दिन नए युग की शुरुआत होगी।
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