संयुक्त मंत्री विजय बिहारी तिवारी के बाद राष्टीय उपाध्यक्ष ई. राधेष्याम पांडेय ने भी मांगा हिसाब

बस्ती। ब्राहृमण महासभा में आरोप प्रत्यारोप और बचाव का दौर जारी है। एक तरह से महासभा में चंदा चोरी और पत्थर चोरी को लेकर घमासान मचा हुआ है। चंदा चोरी के बारे में तो सभी को पता है, पत्थर चोर के बारे में भी सभी को पता है, लेकिन कोई नाम नहीं ले रहा है, वह व्यक्ति भी नाम नहीं ले रहा है, जिसने पत्थर चोरी के बारे में लोगों को बताया था। ब्राहृमण महासभा के लोगों को शायद यह नहीं मालूम कि अब तो मंदिर की चर्चा गांव, गढ़ी, कस्बों, चाय की दुकानों और अस्पतालों तक में होने लगी है, जो भी जान रहा है, वह हैरान हो रहा है, और कह रहा है, कि इतने बड़े-बड़े महारथी के रहते चंदा और पत्थर कैसे चोरी हो गया? आखिर यह लोग कर क्या रहे थे? जिन ब्राहृमण सभा के लोगों का नाम पहले आदर के साथ में लेते थे, आज उन्हीं का अनादर कर रहे हैं, चोर कहकर बुला रहे है। कहते हैं, कि राम मंदिर और ब्राहृमण महासभा के मंदिर में क्या फर्क रह गया? आज जिस तरह इस स्थिति के लिए लोग एक दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, उससे स्थित और भी विस्फोटक होती जा रही है, क्यों कि लोगों के मन में आक्रोश और गुस्सा है। हर कोई महामंत्री ओैर राष्टीय अध्यक्ष को इसके लिए जिम्मेदार मान रहे है। अध्यक्षजी की सबसे बड़ी परीक्षा मंदिर का हिसाब-किताब दिलाने पर हैं, अगर यह हिसाब-किताब दिलाने में सफल रहे तो इनकी बहुत बड़ी सफलता मानी जाएगी। रही बात महामंत्रीजी की तो सारे फसाद का जड़ इन्हीं को माना जा रहा है, जिस तरह आए दिन इनकी अनियमितता सामने आ रही है, उससे पता चलता है, कि इन्होंने और कोषाध्यक्ष ने अपनी जिम्मेदारी को ठीक तरीके से नहीं निभाया, वरना ऐसी नौबत ही न आ पाती। जिस संगठन में हिसाब-किताब मांगा जाए, समझ लेना चाहिए, कि उस संगठन के जिम्मेदार अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा रहे है। बार-बार सवाल उठ रहा है, कि इतने बड़े-बड़े महारथी के रहते कैसे कोई एक व्यक्ति संगठन पर इतना हावी हो सकता है? कैसे वह व्यक्ति मनमानी करने लगता है? किसी ने लिखा भी है, कि महामंत्री के इस्तीफा देने से कुछ नहीं होने वाला और न हिसाब देने से संगठन पर लगे दाग ही धुल पाएगें। अब आसानी से इस संगठन पर कोई विष्वास नहीं करेगा, खुद संगठन के लोग ही विष्वास नहीं करेगें। अगर मंदिर का निर्माण हो गया होता तो सारे गुनाह छिप जाते, एक तो 20 सालों में मंदिर का निर्माण पूरा नहीं हुआ, उपर से चंदा चोरी और पत्थर चोरी जैसे आरोप लगने लगे, आरोप तो बहुत सारे लगे, लेकिन सबसे गंभीर आरोप चंदा और पत्थर चोरी और हिसाब न देना रहा। इस संगठन पर लोगों का विष्वास तभी होगा, जब मंदिर बन जाएगा, और इसके भीतर की गंदगी साफ होगी। गंदगी को साफ करना सबसे अधिक जरुरी है। जिस मंदिर में गंदगी हो उस मंदिर में वैसे भी लोग जाना पसंद नहीं करते। संगठन की गंदगी जब तक साफ नहीं होगी, तब तक संगठन के लोग एक दूसरे पर विष्वास नहीं करेगें, गंदगी को साफ करने की जिम्मेदारी सिर्फ अध्यक्षजी की ही नहीं है, इसे सभी को मिलकर साफ करना होगा, तभी खोया हुआ गौरव हासिल किया जा सकता है। जब आपस में ही विष्वास का संकट हैं, तो बाहर तो रहेगा ही। संगठन से जुड़ा हर व्यक्ति यह चाहता है, कि संगठन का स्वरुप पहले जैसा वाला न रहे, और यह तभी संभव होगा, जब अध्यक्षजी मौन को तोड़ेगे, देखा जाए तो आज सबसे अधिक दांव अध्यक्षजी की इज्जत की हीे लगी है। हर कोई अध्यक्षजी के योगदान को सराहता है, उनके व्यक्तित्व को बेहतर बताता है, लेकिन आज तक एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं मिला, जिसने यह कहा हो कि महामंत्री बहुत अच्छे हैं, इनका कोई दोष नहीं। जो व्यक्ति अपने ही संगठन के लोगों के बीच संदेह की नजर से देखा जाए, उसे तो एक मिनट भी संगठन में नहीं रहना चाहिए, क्यों कि जब विष्वास ही नहीं रहा, तो पद लेकर क्या होगा? अब जरा राष्टीय उपाध्यक्ष ई. राधेष्याम पांडेय के उस पत्र पर विचार करने की आवष्कता है, जो उन्होंने राष्टीय अध्यक्ष को लिखा।

इन्होंने स्पष्ट लिखा है, कि संगठन के आय-व्यय, दान, सदस्यता शुल्क, निर्माण कार्य एवं अन्य वित्तीय की जिम्मेदारी किसी एक पदाधिकारी को न देकर कम से कम पांच से सात सदस्यों की समिति को दी जाए, महामंत्री, कोषाध्यक्ष एवं समिति के अन्य सदस्यों की स्वीकृति के बिना किसी महत्वपूर्ण वित्तीय का निर्णय न लिया जाए, प्रत्सेक भुगतान और व्यय समिति के अनुमोदन एपं आवष्यक अभिलेखों के आधार पर ही किया जाए, मंदिर निर्माण, भवन निर्माण या अन्य किसी परियोजना का संचालन भी बहुसदस्यीय के माध्यम से किया जाए, जयपुर से आए पत्थर की चोरी की जांच स्वंतत्र एवं निष्पक्ष कराई जाए, 2002 से 2026 जुलाई तक के समस्त आय-व्यय की बिल बाउचर के साथ पास करने वाले का नाम सहित स्वतंत्र आडिट एवं सत्यापन कराया जाए, पदाधिकारियों के मनोनयन एवं नियुक्तियों की समीक्षा की जाए। कहा गया कि संगठन के कुछ सदस्यों के द्वारा यह चिंता जताया गया कि शंभूनाथ मिश्र और सत्ते षुक्ल आपस में सगे साले और बहनोई हैं, भविष्य में ऐसी व्यवस्था बनाई जाए कि एक ही परिवार के निकट संबधी को ऐसे पदों पर न रखा जाए, जहां वित्तीय, प्रशासनिक एवं निर्माण संबधी निर्णय पर प्रभाव पडता हो, कहा कि संगठन की गरिमा, पारदर्शिता एवं समाज के विष्वास को सर्वोपरि रखते हुए प्रत्येक महत्वपूर्ण निर्णय कार्यकारिणी की जानकारी एवं अनुमोदन से ही लिया जाए। ताकि संगठन में पूर्ण पारदर्षिता स्थापित हो सके।