बस्ती। अगर कोई ठेकेदार सीडीओ के कामकाज को लेकर सवाल खड़ा करता तो इसकी समीक्षा सीडीओ को इस लिए करनी चाहिए, ताकि भविष्य में कोई और सवाल न खड़ा कर सके। एक अच्छे और ईमानदार अधिकारी यही चाहतें है, कि लोग उसके कामकाज से संतुष्ट रहें, और किसी को उससे कोई शिकायत न रहे। फिर भी अगर किसी अधिकारी के कामकाज पर कोई सवाल उठाता है, तो बजाए नाराज होने के उसे इस बात की समीक्षा करनी चाहिए कि क्यों किसी ने उसके कामकाज को लेकर सवाल खड़ा किया है? लेकिन बहुत कम ऐसे अधिकारी होते हैं, जो स्वंय के कामकाज की समीक्षा करते हैं, समीक्षा करने के बजाए उस व्यक्ति को अपना निषाना बनाने का प्रयास करते हैं, जिसने सवाल उठाए, यही कारण है, कि आज कोई अधिकारी आम आदमी का हीरो नहीं बन पाता, जनता की नजर में हीरो वही अधिकारी बनते हैं, जो जनता का सम्मान करना जानते हैं, और उनकी समस्याओं का निदान करते हैं, जब अधिकारी से कोई संतुष्ट ही नहीं होगा तो अधिकारी हीरो कैसे बनेगें? आज जो अधिकारी जिले में आ रहे हैं, वह जनसेवक बनकर नहीं बल्कि शासक बनकर आ रहे है। यह लोग भूल जाते हैं, कि सरकार ने इन्हें आम जनता की सेवा करने के लिए भेजा है। जनसेवक तो यह नहीं बन पाते, अलबता नेता सेवक अवष्य बन जाते हैं, अगर ऐसा नहीं होता तो एक नकली प्रतिनिधि का अधिकारी उठकर स्वागत नहीं करते।
अब हम आपको बताते हैं, कि क्यों एक ठेकेदार ने सीडीओ के कामकाज पर सवाल उठाने की हिम्मत किया? इससे पहले भी स्वास्थ्य विभाग में सिविल का कार्य करने वाले ठेकेदार दीपक कुमार मिश्र ने साक्ष्य के साथ बाबू प्रेम बहादुर सिंह के द्वारा फर्जी तरीके से एक-एक लाख के अंदर आर्डर के जरिए 40 लाख का कार्य दीवानचंद्र पटेल को देने की कर चुके हैं, स्पष्ट है, कि लाखों रुपये कर गबन दोनों ने मिलकर किया, लेकिन आज तक सीडीओ ने न तो गबन करने के आरोप में बाबू और ठेकेदार के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाया और न षिकायत का ही निस्तारण किया। उसके बाद मिश्राजी ने छह अक्टूबर 26 को सीडीओ को एक और शिकायत पत्र दिया, जिसमें किसी के द्वारा उनका हस्ताक्षर स्कैन करके उन्हें बदनाम करने की नीयत से फर्जी शिकायत किया, इस पर सीडीओ ने सीएमओ को आवष्यक निर्देश दिया। मिश्राजी ने सीडीओ को लिखा कि आपके कार्यालय में बिना मोबाइल और बिना ओरिजिनल हस्ताक्षर के षिकायती पत्र पर निर्देश जारी कर दिया जाता है। जिस पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं की गई। लिखा कि स्वास्थ्य विभाग में ठेकेदारी के आलावा वह और कोई काम नहीं करता। कहा कि प्रार्थी अपना पूरा नाम दीपक कुमार मिश्र लिखता है, और शिकायत दीपक मिश्र के नाम से फर्जी तरीके से की जाती है, ताकि विभाग में मेरी छवि खराब हो सके। इससे पहले भी मेरे नाम से फर्जी की जा चुकी है। कहा कि चूंकि मेरे द्वारा बाबू और ठेकेदार के खिलाफ साक्ष्य के साथ षिकायत की गई, इसी लिए दोनों ने मेरे नाम से फर्जी तरीके से शिकायत करवा दिया। सीडीओ को लिखा कि जो मेरे नाम से फर्जी शिकायत किया गया, उसे समाप्त किया जाए और गबन के आरोप में बाबू और ठेकेदार के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई जाए, यह भी लिखा कि अगर आप के द्वारा एफआईआर दर्ज करवाने का आदेश नहीं दिया जाता है, तो मेरे द्वारा दर्ज करवा दिया जाएगा। चूंकि ठेकेदार दीपक कुमार मिश्र को नियम कानून से काम करना अच्छा लगता है, और जो कार्य नियम विरुद्व होता है, उसकी शिकायत करते हैं, हाईकोर्ट तक जाते है। कहने का मतलब विभाग में इन्हें एक ईमानदार ठेकेदार तो माना जाता है, लेकिन इनके साथ ईमानदारी नहीं की जाती है, यह हर काम का टेंडर कराना चाहते हैं, बाबू और साहब मिलकर ठेकेदार को लाभ पहुंचाने के लिए बिना टेंडर के करोड़ों का काम और आर्डर दे देते है। यह वही ठेकेदार हैं, जिन्होंने डीएम पर यह आरोप लगाया था, कि मां काली से 25 लाख लेकर मामले को रफादफा कर दिया, जब इसकी शिकायत हुई तो बस्ती से लेकर लखनउ तक तहलका मच गया। अधिकारी अमूमन इस तरह के ठेकेदार से खुश नहीं रहते और मौका मिलते ही इनका नुकसान भी कर देते है। मिश्राजी कितने दिन से सीएमओ से कह रहे हें, कि साहब 15वां वित्त आयोग के पांच करोड़ का टेंडर निकाल दीजिए, लेकिन सीएमओ तैयार ही नहीं हो रहे हैं, इस लिए नहीं तैयार हो रहे हैं, क्योंकि पिछली बार की तरह इस बार भी बंदरबांट करने की रणनीति सीएमओ के आवास पर बन चुकी है। अब आप समझ हैं, कि जो भ्रष्ट लोगों के रास्ते का रोड़ा बन चुका है, उस रोड़े को तो हटाने का प्रयास होगा ही।
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