बस्ती। सवाल उठ रहा है, कि अगर बिना औषधि लाइसेंस के करोड़ों की सर्जिकल उपकरण की खरीद हो रही है, तो इसे कौन करवा रहा है, और किसकी देखरेख में लोगों की जिंदगियों के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है, डीएम, सीएमओ, एसआईसी, सीएमएस एवं एमओेआईसी? ऐसे-ऐसे फर्मो से खरीद करवाई जा रही है, जिसके पास न तो डग लाइसेंस हैं, और न जीएसटी नंबर, टस्ट जैसी संस्था से खरीद करवाई जा रही है। लगभग 90 फीसद बिना डीएल और जीएसटी वाले फर्मो से मेडिकल उपकरण की खरीद और आपूर्ति ही नहीं कर करवाई जा रही है, बल्कि इन्हें करोड़ों रुपये का भुगतान भी हो रहा हैं, बिना जीएसटी का कैसे भुगतान हो रहा है, यह जांच का विषय है। बड़े पैमाने पर जीएसटी की चोरी हो रही है। बताया जाता है, कि जब से सीएमओ डा. राजीव निगम आए हैं, तब से यह फर्जीवाड़ा चल रहा है। हाईकोर्ट के आदेश के बाद अगर कोई फर्म बिना डीएल के मेडिकल उपकरण की खरीद करता हैं, और उसे भुगतान होता है, तो इसके लिए डीएम को जिम्मेदार माना गया हैं, सीएमओ की जिम्मेदारी तो बाद में आएगी, लेकिन सबसे पहले डीएम जिम्मेदार होगें। क्यों कि 2007 में जब डीएल देने की जिम्मेदारी सीएमओ की थी, तो नकली दवाओं से कईयों की मौत हो गई थी, इसे लेकर हाईकोर्ट में एक पीआईएल दाखिल हुआ, उसके बाद दवा और औषधि उपकरणों की खरीद और बेचने का लाइसेंस देने का अधिकार डीएम को दिया गया, जो भी छापे और जांच होगी, वह सीएमओ के आदेश और निर्देश पर नहीं बल्कि डीएम के आदेश पर होगी। इस नए आदेश का फर्क बहुत पड़ा और नकली दवाओं के बिक्री का कारोबार लगभग रुक गया, हाल के अगर कोडिन सिरप को छोड़ दिया जो कोई बड़ा मामला सामने नहीं आया। लेकिन इस आदेश का प्रभाव जिले के स्वास्थ्य महकमे पर नहीं पड़ा। कहने का मतलब अपने लाभ के लिए सीएमओ, एसआईसी, सीएमएस और एमओआईसी ऐसी फर्मो से भारी कमीशन के लालच में मेडिकल संबधी उपकरण की खरीद करवा जिनके पास न तो डीएल हैं, और न जीएसटी नंबर ही है। यह सभी लोग मिलकर ऐसा अवैध कारोबार कर रहे हैं, जिससे न सिर्फ जीएसटी की चोरी हो रही है, बल्कि ऐसे उपकरण खरीदे जा रहे हैं, जो अधोमानक होते हैं, और जिसके इस्तेमाल करने से मरीज की जान भी जा सकती है। इस तरह के कारोबार करने और कराने वाले सरकार और समाज सभी के दुष्मन होते है। एमपी नर्सिगं फर्म का आपरेट मिश्राजी के द्वारा करने का दावा किया जा रहा है। इसकी सच्चाई जांच में ही हो सकती है। इस तरह का कारोबार करने वाले अक्सर अपने मित्रों के फर्मो का इस्तेमाल करते हैं, और इसके एवज में उन्हें लाख-दो लाख दे देते है। जाहिर सी बात जो उपकरण बिना डीएल और बिना जीएसटी वाले फर्मो से खरीदा जाएगा, उनकी आपूर्ति भी न के बराबर होगी। यानि यहां पर फिर सीएमएसडी स्टोर के प्रभारी की भूमिका सामने आ गई। बहरहाल, अगर इस मामले में सीएमओ ने कोई कार्रवाई नहीं की तो बात उनपर भी आ सकती है। रही बात डीएम की तो पहले भी कहा जा चुका है, कि जिन मामलों में डीएम का इन्वाल्वमेंट रहता है, उन मामलों में घोटालेबाज अपने आपको सुरक्षित महसूस करते है। डीएम को भी इस बात की जांच करनी चाहिए, कि कहीं हाईकोर्ट के दिषा-निर्देशों की अवहेलना तो नहीं हो रही है।
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