बस्ती। लगभग 80 फीसदी अधिकारी और कर्मचारी रिटायरमेंट के अंतिम दिनों में इस लिए बेईमान से ईमानदार बन जाते हैं, क्यों कि उन्हें अपनी पेंशन की चिंता रहती है। वहीं 20 फीसद ऐसे बेईमान और चोर अधिकारी और कर्मचारी होते हैं, जिन्हें न तो अपने पेंशन की चिंता रहती है, और न जेल जाने का ही डर रहता हैं, ऐसे ही स्वास्थ्य निदेशालय में एक डारेक्टर डा. रतन पाल सिंह सुमन हैं, जिन्होंने रिटायरमेंट के आठ दिन पहले अपनी नौकरी का सबसे बड़ा घोटाला किया, इन्होंने सारे नियम कानून को तोड़कर और अपने अधिकार से बाहर जा कर श्री इंटरप्राइजेज के भगवान यादव को प्रदेश भर के अस्पतालों के चददर की धुलाई का सात अरब का आर्डर दे दिया, वह भी प्रति चददर 1245 रुपये में, जब कि वही चददर बस्ती में 245 रुपये में धुला जा रहा है। इनका क्या होगा, यह तो नहीं मालूम, इन्हें पेंशन मिलेगा कि नहीं? यह भी नहीं मालूम। यह भी नहीं मालूम की बाते इस लिए कही जा रही है, क्यों कि योगीजी हैं, तो सबकुछ मुमकिन है। इनके राज में न तो भ्रष्टाचारियों की जांच होती है, और न उन्हें जेल ही भेजा जाता है।

बात हम लोग बस्ती के सीएमओ डा. राजीव निगम की कर रहे हैं, इनका भी रिटायरमेंट करीब, और यह भी नहीं चाहेंगे, कि अपना पेंशन खराब करें, हालांकि यह जब से जिले में आए हैं, भ्रष्टाचार के जरिए इन्होंने पैसा कमाने के आलावा और कुछ नहीं किया, यह इनकी खुशकिस्मती रही कि इन्हें चीफ फार्मासिस्ट अजय मिश्र, आरसीएच डा. बृजेश शुक्ल, एनएचएम के बाबू संदीप राय, सीएमओ कार्यालय के बाबू प्रेमबहादुर सिंह, ठेकेदार अजय दूबे, रवि शेखर, अविनाश पांडेय और अमरजीत दूबे जैसे लोग मिल गए। इन सभी के पास लगभग भ्रष्टाचार करने का अच्छा खासा अनुभव है। इन लोगों ने प्रशासनिक योग्यता विहीन चाइल्ड स्पेलिस्ट सीएमओ को अपनी जाल में फंसा कर इतना गलत काम करवाया कि अगर उसकी जांच हो जाए तो सीएमओ को पूरी जिंदगी कोर्ट कचहरी का चक्कर लगाने में बीत जाएगा। सीएमओ का सहारा लेकर घपलेबाजों ने किया करोड़ों का फर्जीवाड़ा और सीएमओ को चार फीसद थमा लगभग दस करोड़ का बंदरबंाट कर लिया। खासबात यह है, कि जितने भी फर्जीवाड़ा हुआ, वह सीएमओ के आवास पर लगभग सात बजे के बाद हुआ, ऐसे समय हुआ जब साहब मूड में रहते थे, अब आप समझ गए होगें कि अधिकांश अधिकारी ऐसे समय किस मूड में रहते है। इसी मूड का फायदा घपलेबाजों ने खूब उठाया। मूड बनाने के लिए मंहगी से मंहगी व्यवस्था की गई। जब साहब पूरे मूड में होते तो पत्रावली थमा दी जाती, तब साहब यह नहीं देखते कि वह जिस पत्रावली पर हस्ताक्षर कर रहे हैं, वह सही हैं, कि नहीं? घपलेबाजों ने सीएमओ साहब को इतनी बुरी तरह फंसा दिया कि इन्हें कुछ समझ में नहीं आ रहा है, कि आखिर कैसे वह अपनी पेंशन बचाएगें। यह लोग यही काम तत्कालीन सीएमओ डा. आरएस दूबे से नहीं करवा पाए, क्यों कि दूबेजी इन लोगों पर नहीं बल्कि साथ में लाए अपने लोगों पर भरोसा करते थे। इसी लिए दूबेजी को कमाई करने के मामले में सबसे सफल सीएमओ माना जा रहा है। इन्होंने जाते-जाते उस वार्ड ब्याय राम ललित बौद्व से भारी रकम लेकर सीएमएसडी स्टोर पर तैनात कर जिसे दूबेजी ने चीफ फार्मासिस्ट का फर्जी हस्ताक्षर करते पकड़ा था, जिसके चलते उसका तबादला गौर सीएचसी कर दिया, लेकिन जैसे ही वार्ड ब्याय ने मोटा लिफाफा दिया, वेैसे ही तबादले का रदद करते हुए वापस सीएमएसस्ी स्टोर कर दिया, दूबेजी ने तो चीफ फार्मासिस्ट को भी नहीं छोड़ा, और इनसे भी मोटा लिफाफा ले लिया, अगर नहीं लिए होते तो दूबेजी अजय मिश्र के खिलाफ न सिर्फ कार्रवाई करते, बल्कि इनके और वार्ड ब्याय के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करवाते। बिडंबना देखिए जिनसे दूबेजी ने मोटा लिफाफा लिया, उसी ने नोटिस थमा दिया, दूबेजी को मोटा लिफाफा लेकर किनारे हो गए, फंस गए जांच टीम के सदस्य। आज भी जांच टीम इसके लिए दूबेजी को जिम्मेदार मान रही है। मीडिया निगमजी को सलाह दे रही हैं, कि अब कोई भी ऐसा कार्य मत करिएगा, जिससे पेंशन खतरे में पड़ने और जेल जाने की संभावना रहे। क्यों कि जिन लोगों को आपने मालामाल किया, वे लोग किसी के भी नहीं हैं, जाते-जाते यह लोग 15वां वित्त आयोग का पांच करोड़ का बंदरबांट करना चाहेंगें, कम से कम अब तो ईमानदार बन जाइए, और टेंडर करवा दीजिए, जिस दिन आपने टेंडर करवाने का मन बनाया, उसी दिन से यह लोग आपके विरोधी हो जाएगें। यह सही है, कि अगर सीएमओ ने टेंडर करवाया, तो उन्हें कुछ नहीं मिलेगा, लेकिन करवाया तो चार फीसद के दर से 20 लाख मिलेगा, इस 20 लाख के लिए सीएमओ को खतरा ही खतरा रहेगा। सीएमओ साहब खतरा मोल ले लीजिए, और प्रयास किजिए कि टेंडर ही न हो। बजट सरेंडर हो जाए तो होने दीजिए, लेकिन इसमें कुछ मत कीजिए। नहीं तो जिंदगीभर तक पछताना पड़ेगा। वैसे भी फर्जी भुगतान करवाकर प्रेमबहादुर सिंह ने आपको फंसा रखा है। हो सके, तो सबसे पहले पत्रावली गायब करने और भतीजे देवेंद्र सिंह, दीवानचंद्र पटेल और जय कांस्टक्षन को करोड़ों रुपये का फर्जी भुगतान करने के आरोप में निलंबित करते हुए एफआईआर दर्ज करवा देना चाहिए, ताकि आप का बचाव कैग की जांच में हो सके।