बस्ती। ऐसा लगता है, कि मानो मदरसा दारुल उलूम अहले सुन्नत फैजुन्नबी कप्तानगंज के प्रबंधक और छह दामाद वाले प्रबंधक के नाम से चर्चित हाजी मुनीर अली से एक तरह से ईमानदारी को त्याग दिया है। जिन मदरसे के प्रबंधकों से सबसे अधिक ईमानदारी की उम्मीद समाज करता है, बगर वही लोग बेईमानी के रास्ते पर चलने लगेगे तो समाज का उत्थान कैसे होगा? मदरसे के प्रबंधकों को खासतौर पर जो हज करके आए हैं, उनसे समाज बहुत कुछ उम्मीद करता है, लेकिन जब ऐसे लोग शिक्षा के नाम पर भ्रष्टाचार करने लगते हैं, तो समाज पूरे मदरसे को षक की निगाह से देखने लगता है। कहना गलत नहीं होगा, कि अधिकांश मदरसे के प्रबंधक भ्रष्टाचार में डूबे हुएं हैं, उन्हें गलत और सही का एहसास ही नहीं होता, यह उन लोगों को प्राथमिकता देते हैं, जो गलत होते हैं, उन शिक्षकों को बढ़ावा देते हैं, जितना मार्कशीट ही फर्जी होता है, ऐसे-ऐसे मदरसों की फर्जी अंक पत्र लाने वाले को नौकरी देते हैं, जिनकी मान्यता ही नहीं, ऐसे-ऐसे षिक्षक कप्तानगंज के मदरसे में पढ़ाते हैं, जिनका अंक पत्र उस मदरसे का हैं, जिसकी मान्यता मार्कशीट जारी होने के बाद हुई, अगर ऐसे फर्जी अंक पत्र वालें को मदरसे के प्रबंधक बिना अंक पत्रों का सत्यापन कराए, नौकरी पर रख लेते हैं, तो इसमें गलती किसकी है, जाहिर सी बात हैं, कि नौकरी पाने वाले की गलती तो नहीं मानी जाएगी, बल्कि उस प्रबंधक की मानी जाएगी, जो पैसा लेकर बिना डिग्री का सत्यापन कराए नौकरी देते है। ऐसे लोगों को यह कर नौकरी दी जाती है, कि दस हजार माहवार देना होगा।

अब हम आप लोगों को मदरसा दारुल उलूम अहले सुन्नत फैजुन्नबी कप्तानगंज के प्रबंधक और छह दामाद वाले प्रबंधक के नाम से चर्चित हाजी मुनीर अली के फर्जीवाड़े को बताते है। इस मदरसे में दो शिक्षक फर्जी अंक पत्र के जरिए प्रबंधक की मेहरबानी से पिछले लगभग 16 साल से नौकरी कर रहे है। एक का नाम हैं, मो. नसीम रजा पुत्र जामिन अली निवासी पिलखाई बस्ती, यह पिछले 2010 से फर्जी तरीके से शिक्षक बने हुए है। इनके फर्जी योग्यता के बारे में तत्कालीन जिला अल्प संख्यक अधिकारी धर्मदेव त्रिपाठी से सारे साक्ष्य के साथ की गई, लेकिन इन्होंने मोटी रकम लेकर बिना जांच पड़ताल किए, गलत को सही बना दिया, गुलाम हुसैन पुत्र अकबर अली की ओर से इस बात के साक्ष्य दिए गए कि इन्होने जिस मदरसे से अंक पत्र हासिल किया उसकी मान्यता 2008 में हुई, और इन्होंने 2004 में अकं पत्र हासिल किया। सवाल उठ रहा है, कि जिस मदरसे की मान्यता 2008 में हुई, वह कैसे 2004 का अंक पत्र दे सकता है? फिर इसकी षिकायत जिला अल्प संख्यक अधिकारी प्रियकां अवस्थी से गुलाम हुसैन ने की, इन्होंने भी पैसा लेकर क्लीन चिट दे दिया। यह तक नहीं देखा कि जिस मदरसे का अंक पत्र हैं, उसकी मान्यता कब की है। मामला रजिस्टार तक पहुंचा लेकिन वहां पर पैसा भारी पड़ा।

अकं पत्र वही मदरसा जारी कर सकता, जिसकी मान्यता होती, बिना मान्यता वाले मदरसा अगर कोई अंक पत्र जारी करता है, तो उसे फर्जी माना जाता है। चूंकि कदम-कदम पर हाजी साहब फर्जी वाले शिक्षक के साथ खड़े रहे, इस लिए फर्जी होने के बाद भी कोई कार्रवाई जिम्मेदारों ने नहीं किया। दूसरे फर्जी शिक्षक का नाम अब्दुल लतीफ पुत्र हसमत्तुलाह निवासी कप्तानगंज है। इनकी डिग्री जिस दारुल उलूम मोहम्मदिया अहलु सुन्नत फैजे गौसिया बैरागल दुबोैलिया की है, उसकी आज तक मान्यता नहीं हुई। फिर भी प्रबंधक इन्हें पिछले 2010 से लगभग एक लाख का वेतन दे रहे है। अगर हाजी मुनीर के स्थान पर अन्य कोई ईमानदार प्रबंधक होता तो कब का दोनों फर्जी शिक्षकों को निकाल बाहर करता, लेकिन हाजी साहब ठहरे बेईमान प्रबंधक इस लिए इन पर कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसकी डिग्री असली हैं, और किसकी नकली।