बस्ती। वैसे तो जिलेभर के नगर पंचायतों में भ्रष्टाचार का बोलबाला है, किसी में कम तो किसी में अधिक, खासबात यह है, कि कमीशन का खेल तो साहब के बदलने के बाद भी जारी है। हर नगर पंचायत में हर काम का कमीशन रेट फिक्स है। नगर पंचायत बभनान, रुधौली, कप्तानगंज और मुंडेरवा में तो खुले आम बोली लगाकर काम दिया जाता है। किसी में 30 फीसद तो किसी में 35 फीसद तक कमीशन का खेल हो रहा है, सबसे अधिक रोड लाइट पर कमीशनबाजी हो रही है, तभी तो एक भी नगर पंचायत में पूरी तरह रोड लाइट नहीं जलती। भानपुर नगर पंचायत में तो लाइट के मामले में सारे रिकार्ड तोड़ दिए गए, सबसे अधिक धन लाइट पर ही खर्च इस लिए किया गया, क्यों कि सबसे अधिक कमीशन इसी में मिलता है, कागजों में तो ब्रांडेट कंपनी की लाइट लगना दिखाया गया, लेकिन लगाया लोकल है। अगर आप लोग नगर पंचायत भानपुर के कमीशन का रेट जानेगें तो दंग रह जाएगें। सरकार तो काम के लिए 100 रुपये की स्वीकृति देती है, लेकिन काम 30 रुपये का होता है, बाकी 70 फीसद जीएसटी और कमीशन में चला जाता है। 29 रुपया विभागीय कमीशन, 10 रुपया उन नेताओं का जिनके पैड पर काम आता, इसमें वर्तमान और पूर्व दोनों जनप्रतिनिधि शामिल रहते है, ठेकेदार का लाभांस 10 रुपया, मेट, लेबर और सुपरवाइजर भी कम से तीन रुपया चोरी करेगा और 18 रुपया जीएसटी में चला जाएगा, इस तरह 100 रुपये में से 70 रुपया फीसद कमीशन और जीएसटी में चला गया, बचा 30 रुपया, अब 30 रुपये में कैसे 100 रुपये का काम किया जा सकता है। इसी लिए सड़क बनते ही टूट जाती है, नाला बनते ही ढ़ह जाता है। जब कि देखा जाए तो सिर्फ 18 रुपया जीएसटी में जाना चाहिए, और 82 रुपये का काम होना चाहिए, कहा भी जाता है, कि अगर साहब और नेता कमीशन लेना बंद कर दे तो भी काफी हद तक गुणवत्तापरक निर्माण कार्य हो सकता है। सवाल उठता है, कि न साहब न नेता और न चेयरमैन कमीशन लेना बंद करेगें, तो कैसे कोई नगर पंचायत भ्रष्टाचारमुक्त होगा। सबकुछ बंद हो सकता है, लेकिन साहब और चेयरमैन अपना कमीशन नहीं बंद कर सकते हैं, क्यों कि इन लोगों विष्वास ईमानदारी से काम करने में नहीं बल्कि बेईमानी से काम करने में रहता, अगर नहीं रहता तो कोई साहब यह नहीं कहते कि उन्होंने जितना पैसा बस्ती से कमाया उतना पूरे जीवन में नहीं कमाया। नगर पंचायत भानपुर में मंडप से थाना सोनहा तक जरा नाली निर्माण की गुणवत्ता को तो देखिए, क्या आप लोग भ्रष्टाचार नहीं कहेगें? बार-बार सवाल उठ रहा है, कि जो घटिया निर्माण कार्य क्षेत्र की जनता और मीडिया को दिखाई देता, वह क्यों नहीं नेताओं एडीएम, ईओ या फिर जेई को दिखाई देता? सच तो यह है, कि यह लोग सच को देखना ही नहीं चाहते अगर देखना चाहते तो क्या कभी ऐसी घटिया नाली का निर्माण हो पाता, जो बनते ही भरभराकर गिर गया, और नाली का वजीद ही समाप्त हो गया।

 ‘भाजपाई’ ही ‘भाजपाई’ के ‘दुश्मन’

नगर पंचायत भानपुर में अगर कोई भाजपाई भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ता हैं, या फिर जांच कराने को लिखता है, तो उसके रास्ते में और कोई नहीं सबसे पहले भाजपाई ही रोड़ा बनते है। रोड़ा इस लिए बनते हैं, क्यों कि यह उनके हितों पर कुठाराघात जो होता है, यानि नगर पंचायत भानपुर की बर्बादी में सपाई कम और भाजापाई अधिक है। भाजपा के नितेश शर्मा जैसे लोगों ने जब-जब भी शिकायत किया या भ्रष्टाचार एवं भ्रष्टाचारियों पर हमला बोला, तब तब इन्हें सबसे पहले अपने लोगों के विरोध का सामना करना पड़ा। इन्हें पार्टी से अलग-थलग और कमजोर करने का भी प्रयास किया गया। पूर्व सांसद हरीश द्विवेदी के प्रति इनकी वफादारी और ईमानदारी को कौन नहीं जानता। इन्हें जहां अपनी ईमानदारी और वफादारी का ईनाम मिलना चाहिए था, वहीं इन्हें तिरस्कार और अपमान सहना पड़ा। इनके ही प्रयास का नतीजा रहा कि डूडा के भ्रष्ट जेई को भानपुर नगर पंचायत छोड़ना पड़ा। उस समय भी जेई को बचाने का काम सबसे अधिक भाजपाईयों ने ही किया। इनका कहना है, कि भानपुर को नगर पंचायत बने लगभग छह साल हो गए, लेकिन उन्होंने न तो कभी ठेकेदारी किया और न उनके नाम से कोई फर्म है।