बस्ती। आप लोगों को याद होगा कि जब तत्कालीन एडीएम प्रतिपाल सिंह से स्थानीय निकाय का प्रभार हटाकर सीआरओ कीर्ति प्रकाश भारती को दिया गया, तो इस ऐतिहासिक निर्णय का खूब स्वागत हुआ, यहां तक कहा जाने लगा था कि अब स्थानीय निकायों से भ्रष्टाचार समाप्त होगा, कमीशनबाजी का खात्मा होगा, बजट का सही इस्तेमाल होगा, ईओ, चेयरमैन और ठेकेदारों का गठजोड़ समाप्त होगा। व्यवस्था में सुधार होगा, व्याप्त भ्रष्टाचार की शिकायतें दूर होगी। निष्पक्ष जांच होगा, और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होगी। इस निर्णय के जरिए डीएम की मंशा उन अधिकारियों को एक संदेश देने का भी रहा, जो स्थानीय निकायों का संचालन नीजि संपत्ति मानकर कर रहे थे। उनके ठेकेदार काम कर रहे थे। उसी समय मीडिया ने कहा था, कि ‘बदलना हो तो व्यवस्था बदलिए, अधिकारी नही’। आज नगर पंचायत भानपुर की जो स्थित सामने आ रही हैं, और जिसे लेकर क्षेत्र की जनता में रोष व्याप्त हैं, और जिसे देखते हुए मीडिया और वहां की जनता फिर कह रही है, कि कुछ भी नहीं बदला, न अधिकारियों के काम करने की कार्यशैली बदली और न अधिकारी ही बदले, पहले जैसा कमीशन आज भी चल रहा हैं, पहले जैसा भ्रष्टाचार आज भी हो रहा है। जो ठेकेदार पहले पुराने वाले साहब के लिए ठेका पटटी करते थे, आज वही लोग नए वाले साहब के साथ लगे हुए है। तभी तो 20 फिट चौड़ी सड़क को 10 फिट कर दे रहें हैं। सड़क चार माह भी नहीं चलती और टूट जा रही है। नाला का निर्माण होते ही नाला जमीदोंज हो जा रहा है। इस नगर पंचायत की व्यवस्था और निर्माण कार्य को देखकर लगता ही नहीं अब तक विकास के नाम पर 20 करोड़ खर्च हुआ होगा। सवाल उठ रहा हैं, कि जिस नगर पंचायत के प्रशासक एडीएम रहे, वह नगर पंचायत अगर भ्रष्टाचार में डूबा रहेगा तो सवाल तो सब पर उठेगा। जिस नगर पंचायत के ठेकेदार, नेताओं के आदमी होगें, तो उस नगर पंचायत में भ्रष्टाचार की गंगा बहेगी ही, और जिन ठेकेदारों के संरक्षक नेता रहेगें, तो उस नगर पंचायत को बर्बाद होने से कौन बवाएगा? जिस नगर पंचायत के अधिकारी खुद ठेकेदार बन गए हो, उस नगर पंचायत की सड़क कैसे पांच साल तक चलेगी? सड़क अगर चार-पांच में ही टूट जा रही है, तो इसका जिम्मेदार कौन? नेता, ठेकेदार, ईओ, जेई या फिर प्रशासक। देखा जाए तो पिछले लगभग दो तीन सालों से नेताओं और अधिकारियों के ठेकेदारों ने ईओ और जेई के साथ मिलकर 20 करोड़ में से लगभग 15 करोड़ का बंदरबांट किया होगा। अगर किसी नेता को इतने कम समय में इतनी आमदनी हो जाए तो उसे विधायक बनने की क्या जरुरत? और अगर किसी अधिकारी को बिना कुछ किए करोड़ों मिल जाए तो वह जिला क्यों छोड़ना चाहेगा, तभी तो जिले से जबरिया भेजे गए एक एडीएम ने कहा था, कि उन्होंने जितना पैसा नगर पंचायतों और बीडीए से कमाया, उतना पूरा जीवन नहीं कमाया, वैसे भी रुधौली विधानसभा के एक दो ऐसे नेता है, जो यह मान कर चल रहे हैं, अब उन्हें कभी विधायक नहीं होना है, और न विधायक बनाएगी और न ही उनके परिवार के किसी सदस्य को नगर पंचायत भानपुर का चेयरमैन ही बनाएगी, इसी को ध्यान में रखकर वह अपने ठेकेदारों के साथ मिलकर जितना लूटना चाह रहे हैं, उतना नगर पंचायत भानपुर को लूट रहे हैं, अधिकारी भी ऐसे नेताओं का साथ इस लिए दे रहे हैं, ताकि वह भ्रष्टाचार की शिकायत और जांच न कराने लगें। ठेकेदार निडर होकर इस लिए चोरी बेईमानी कर रहा है, क्यों कि उन्हें अपने आका पर पूरा विष्वास रहता है, कि फंसने पर अवष्य बचाएगें, और बचाते भी है। असल में यह लोग ठेकेदार को नहीं बचाते बल्कि खुद को यह समझकर बचाते हैं, कि अगर कहीं उनका ठेकेदार फंस गया तो उनकी आमदनी बंद हो जाएगी। आए दिन जिस तरह नगर पंचायत भानपुर के भ्रष्टाचार का मामला मीडिया में उठ रहा है, उसे देखते हुए स्थानीय लोगों में अधिकारियों और नेताओं को लेकर जबरदस्त रोष व्याप्त हैं, और इसका हिसाब किताब चुनाव में लेने की बातें कर रहे है। अधिकारी आज हैं, कल नहीं रहेगें, लेकिन ठेकेदार और उनके आंका भाग कर कहां जाएगें। नगर पंचायत भानपुर के लोगों का यह दुर्भाग्य रहा हैं, कि उन्हें ऐसा कोई नेता नहीं मिला जो नगर पंचायत भानपुर को भ्रष्टाचारमुक्त करा सके। जितने भी मिले वह भ्रष्टाचारमुक्त करने के बजाए खुद भ्रष्टाचार में लिप्त रहे। मीडिया बार-बार कहती आ रही है, कि नेताओं का यह नहीं भूलना चाहिए कि जनता सबकुछ उन्हें और उनके बेईमान ठेकेदारों को देख रही है। जनता अच्छी तरह जानती हैं, कौन जन सेवक हैं, और कौन ठेकेदार सेवक।