बस्ती। कहना गलत नहीं होगा, कि अगर जिला, मनरेगा में सबसे अधिक भ्रष्टाचार वाला जिला बना है, तो उसके लिए सिर्फ सचिव, रोजगार सेवक, कंप्यूटरआपरेटर और तकनीकी सहायक को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। कहा भी जाता है, कि जब पीओ और एपीओ नहीं चाहेगें तब तक एक भी फर्जी मस्टरोल नहीं निकल सकता और तब तक सीडीओ और डीसी मनरेगा नहीं चाहेंगें तब तक कोई बीडीओ फर्जीवाड़ा नहीं कर सकता। कहने का मतलब इतना बड़ा फर्जीवाड़ा कोई अकेले नहीं कर सकता है, फर्जीवाड़ा करने के लिए सिर्फ कर्मचारी ही नहीं, अधिकारी भी अपना ईमान और धरम बेच रहे है। देखा जाए तो इस बिकने के खेल में सबसे आगे अधिकारी ही नजर आ रहे है। जिस सीडीओ और डीसी मनरेगा पर सबसे अधिक विष्वास जनता ने किया था, उन्हीं लोगों ने विष्वास तोड़ा। कैसे एक आईएएस सीडीओ जिसके पास आक्सफोर्ड की डिग्री की हो, वह कैसे भ्रष्ट लोगों के चंगुल में फंस गया? लोग समझ ही नहीं पा रहे हैं, इन्होंने आते ही जिस तरह का अपना तेवर दिखाया था, उससे बीडीओ ने कुछ तक कमीशन लेना बंद कर दिया था, डीसी मनरेगा से लेकर बीडीओ तक परेषान रहे कि अगर यह जिले में रह गए, तो हम लोगों की कमाई ही बंद हो जाएगी। फिर न जाने ऐसा क्या हो गया, कि कमीशनबाजी का खेल जारी हो गया। ब्लॉक वाले खुद सवाल करते हैं, कि क्या बिना सीडीओ की जानकारी में कमीशन लिया जा रहा है? सीडीओ भले ही ईमानदार हों, लेकिन ऐसी ईमानदारी का क्या फायदा जब उनके अधीनस्थ बेईमान होगें? रही बात नेताओं की तो अगर यह लोग इसी लायक होते तो जिला मनरेगा में भ्रष्टाचार को लेकर अव्वल न बनता। फर्जीवाड़ा का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है, कि झमाझम बारिश में भी फावडा़ चला। खेतों में खड़ी होने के बावजूद खेतों का समतलीकरण दिखाकर लूटपाट किया गया। तालाबों में जलकुंभी भरी हुई फिर भी सफाई के नाम पर जेबे भरी गई। ऐसा लगता है, कि मनरेगा को लोगों ने कमाई का सबसे बड़ा जरिया बना लिया। अगर जरिया न होता तो रुधौली विकास खंड के ग्राम पंचायत पैड़ा में चार परियोजनाओं पर एक भी फावड़ा नहीं चला और 10 दिन में चार हजार मस्टरोल निकल गया। इस ग्राम पंचायत के सचिव अजय सिंह, रोजगार सेवक केवलपति और तकनीकी सहायक देवेश राय और बीडीओ ने यह ठान लिया हैं, कि जब तक ग्राम पंचायत को खोखला नहीं कर देगें, तबतक चैन से नहीं रहेगें। अगर शिकायत के बाद भी कार्रवाई नहीं होती है, तो माना जाता है, कि सभी लूट के हिस्सेदार है। अब जरा अंदाजा लगाइए कि पैड़ा में जिन मजदूरों का फोटो अपलोड किया गया, उनमें 10-12 साल के नाबालिग बच्चे हैं, और सभी ने जो कपड़ा पहन रखा है, वह सर्दी का है। स्थल से फोटो खींच लिया, लेकिन एक भी फावड़ा नहीं चलाया। सवाल उठ रहा है, कि भुगतान करते समय क्या यह सब नहीं देखा जाता? फिर ऐसे फोटोग्राफी करवाने से क्या फायदा जो फर्जी हो, कहने का मतलब परियोजना फर्जी मस्टरोल फर्जी और मनरेगा मजदूर फर्जी। फर्जी करने वालों का यह जमावड़ा करीब-करीब सभी ग्राम पंचायतों में मिल जाएगा।