बस्ती। बार-बार मीडिया और तीमारदार यह क्यों सवाल उठा रहें हैं, कि आखिर क्यों बच्चों के डाक्टर गौड़ और डा. तारिक के अस्पतालों में ही हंगामा होता, और बच्चों की मौत क्यों इन्हीं दोनों अस्पतालों में ही सबसे अधिक होती है? क्यों नहीं 20-25 सालों से सेवा करने वाले बच्चों के डाक्टर एसपी चौधरी, डा. इकबाल अहमद, डा. एनके श्रीवास्तव और डा. पीके श्रीवास्तव के अस्पतालों में तीमारदार हंगामा करते और बच्चों की मौत होती? कहा भी जाता है, कि जो डाक्टर तीमारदारों को संतुष्ट नहीं कर सकता, और बच्चों का इलाज ईमानदारी से नहीं कर सकता, उन डाक्टरों के अस्पतालों में हंगामा होना और बच्चों की मौत होना लाजिमी है। यह सही है, कि प्राइवेट अस्पताल सेवा के साथ रोजी रोटी के लिए ही खोले जाते हैं, लेकिन यह भी सही है, कि अगर कोई अस्पताल सिर्फ और सिर्फ पैसा कमाने के लिए खोले जाते है, तो उन अस्पतालों में हंगामा और बवाल होगा ही। कितने ऐसे डाक्टर हैं, जो यह कहते होगें कि चलो पैसा नहीं है, तो कोई बात नहीं, जब होगा तो दे देना, लेकिन यहां पर मरीज और तीमारदार की चडडी और बनियाइन तक उतार ली जाती है, क्या ऐसे अस्पतालों के डाक्टर को भगवान का दूसरा रुप कहा जा सकता है? तीमारदार या मरीज अगर किसी डाक्टर को कसाई या कातिल कहने लगे तो उस दिन डाक्टरों को अपनी डिग्री को जला देना चाहिए। डाक्टर इस लिए नहीं बनते कि वह मरीजों के साथ इलाज और दवा के नाम पर लूटपाट करें, आज क्यों लोग डा. रमेश चंद्र श्रीवास्तव और डा. वीके वर्मा को मरीज भगवान का दर्जा देतें है, क्यों कि इन दोनों ने कभी अपने पेशे को पैसे के लिए बदनाम नहीं होने दिया, और न किसी को चोर और बेईमान डाक्टर कहने का मौका ही दिया। बच्चों के डाक्टरों में तो और अधिक सवेंदनषीलता होनी चाहिए, क्यों कि अधिकांश बीमार बच्चे या तो गरीब परिवार के या फिर मध्यम श्रेणी के होते है? चूंकि मामला किसी के जिगर के टुकड़े का होता है, इस लिए वह डाक्टर को इस उम्मीद के साथ अपने जिगर के टुकड़े को सौंप देता है, ताकि डाक्टर बच्चों को जीवन दान दे सके। किसी अस्पताल का नाम लाइफ लाइन लिख देने से वह लाइफ लाइन नहीं बन जाता, उसके लिए सवेंदनशीलता होना अति आवष्यक हैं, और जो डाक्टर अपने मरीज के प्रति संवेदनशील होते हैं, वही सफल होते है। पैसा कमाना कोई बुरी बात नहीं हैं, लेकिन पैसे के लिए मरीज या तीमारदार को धोखा देना बुरी बात है। भले ही चाहें कोई डा. रमेश चंद्र श्रीवास्तव और डा. वीके वर्मा जैसा नहीं बन सकता है, लेकिन डाक्टर एसपी चौधरी, डा. इकबाल अहमद, डा. एनके श्रीवास्तव और डा. पीके श्रीवास्तव जैसा तो बन ही सकता है। जिस दिन डा. गौड़ और डा. तारिक किसी गरीब के बच्चे को अपना बच्चा समझ कर इलाज करेगें, उस दिन न तो उनके अस्पताल में कोई हंगामा करेगा और न किसी बच्चे की मौत ही होगी। अगर कोई चूक या गलती हो भी जाती है, तो मरीज से ऐसा रिष्ता बनाइए कि वह माफ कर दें। इसी लिए कहा जाता है, डाक्टर गौड़ और डाक्टर तारिक जैसा मत बनिए, डाक्टर एसपी चौधरी, डा. इकबाल अहमद, डा. एनके श्रीवास्तव और डा. पीके श्रीवास्तव जैसा बनिए, और अगर बन सकते हैं, तो डाक्टर रमेष और डाक्टर वर्मा जैसा बन जाइए। बदनाम डाक्टर कहलाने से अच्छा ईमानदार डाक्टर कहलाइए। जान बचाने में जो सकून और आंनद हैं, वह जान लेने में नहीं। बड़ों के मामलों में तो थोड़ी बहुत लापरवाही चल भी जाती है, लेकिन बच्चों के मामले में नहीं चलती। इसे बच्चों के डाक्टरों को ध्यान देना होगा।
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