बस्ती। जो लोग यह समझ रहे थे, कि गोसेवा आयोग के उपाध्यक्ष महेश शुक्ल और पत्रकार विपिन बिहारी त्रिपाठी का मामला शांत हो गया, या फिर प्रशासन ने बीच का सम्मान जनक रास्ता निकाल लिया, उन लोगों की गलतफहमी 20 जुलाई 26 को दूर हो गई, पहले जैसा विवाद तो नहीं हुआ, अलबत्ता बरसात की पानी से हो चुके कीचड़ पर मलवा डालने के कारण अवष्य विपिन बिहारी त्रिपाठी के पुत्र एवं पत्रकार के साथ जिले में सबसे अधिक टैक्स जमा करने वाले विवेक त्रिपाठी को चार घंटे तक बिना किसी कारण के कोतवाली में बैठन पड़ा, इन चार घंटों में चाय तो क्या पानी भी नहीं दिया गया। अब जरा अंदाजा लगाइए कि 100 करोड़ से अधिक के किसी कारोबारी को अगर बिना कोई कारण सिर्फ इस लिए अवैधानिक तरीके से कोतवाली में चार घंटे तक रहना पड़े, क्यों कि वह उस पर मलवा डालकर उसे चलने योग्य रास्ता बनाना चाह रहे थे, उस रास्ते से पिछले 50-52 साल से आ लोग आ जा रहे हैं, नेताजी का फोन एसपी को गया, और कोतवाल की गाड़ी आई और बैठाकर कोतवाली ले गई, ले जाने से पहले पुलिस ने इस लिए मोबाइल ले लिया, कि कहीं फोन न कर सके। चार घंटे बाद तब छोड़ा गया, जब इन्होंने लिखकर दे दिया कि जब तक इसका कानूनी विवाद हल नहीं हो जाता। तब तक यथा स्थित बनाए रखेगें। इस घटना ने यह साबित कर दिया, कि प्रशासन उन्हीं लोगों का साथ देता है, जो सत्ता के करीब रहते हैं, प्रशान उन लोगों को चार घंटे में पानी तक नहीं पूछता जो सबसे अधिक टैक्स जमा करतें है। जिसे सम्मान मिलना चाहिए, उसे अपमानित होना पड़ रहा है। सवाल उठ रहा है, कि पुलिस ने अभी तक विपिन बिहारी त्रिपाठी के उस तहरीर पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं किया, और क्यों नेताजी के एक फोन पर भागे-भागे चली आई? अगर पुलिस तहरीर पर कोई कार्रवाई कर देती तो आज पुलिस की जयजयकार होती। पुलिस ने मलवा को जेसीबी लगवाकर साफ करवाया और उसका फोटोग्राफ साहब को भेजवा, उसके बाद रिहाई मिली। पहले वाले विवाद के बाद लोगों के प्रयास से यह लगने लगा था, कि चलो दोनों पक्षों को अपनी-अपनी गलती का एहसास हुआ होगा, लेकिन नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, बल्कि उस परिवार को एक बार फिर अपमानित होना पड़ा, जो बैनामाशुदा जमीन पर रास्ते के लिए मलवा डाल रहा था। बार-बार कहा जाता है, कि घंमड ठीक नहीं होता। अगर नेताजी मोहल्ले वालों के लिए रास्ता नहीं बनवा सकते तो अगर कोई दूसरा बनवा रहा है, तो उसे भी नहीं बनवाने दे रहे हैं, यह भी नहीं कि रास्ता नेताजी की निजी जमीन से निकाला जा रहा है। ऐसे जनहित के कार्य में तो सभी को मदद करनी चाहिए। अगर कोई परिवार बार-बार अपमानित होता है, तो उस परिवार के प्रति लोगों की सिंपैथी बढ़ जाती है, और अपमानित करने वालों के प्रति कम हो जाती है। जब मोहल्ले वाले ही विरोध करने लगेंगे तो कोई कब तक रह सकता है। कहा भी जाता है, कि जिस नेताओं के सिर से सत्ता के घमंड का नशा उतरता है, तो उस दिन वह अपने आपको सबसे अधिक असहाय महसूस करते है। वैसे भी कहा गया है, कि कभी मोहल्ले की राजनीति और पत्रकारिता नहीं करनी चाहिए। इतिहास गवाह हैं, कि जिसने भी मोहल्ले की राजनीति की, उसके राजनैतिक भविष्य पर वहीं विराम लग गया। शुक्लजी और त्रिपाठीजी के मामले में जो प्रशासन का नजरिया रहा, उसे पूरी दुनिया ने देखा, और इसी नजरिए के चलते भाजपा अपने मूल मतदाताओं से कटती जा रही है, उन लोगों से कटती जा रही है, जिन्हें भाजपा अपना परम्परागत वोट मानती है। भाजपा के किसी भी नेता को पार्टी हित में ऐसा कोई भी काम नहीं करना चाहिए, जिससे पार्टी की छवि खराब हो और चुनाव में पार्टी का नुकसान हो। नेता के चलते अगर एक व्यक्ति दुखी और परेशान होता तो यह माना जाता है, कि जिस पार्टी का नेता, उस पार्टी का कम से कम 20-25 वोट का तो नुकसान होता ही है। इससे अधिक भी हो सकता है। इसी लिए कोई समझदार नेता ऐसी कोई भी गलती नहीं करता, जिससे उसकी छवि खराब हो और पार्टी का नुकसान हो। लोग माने-या न माने हारने और जीतने का यही सबसे बड़ा कारण भी होता है।