बस्ती। लोकसभा चुनाव के बाद से ही हर कोई यह जानना चाहता है, कि जिले में आखिर उस व्यक्ति के बिना एक पत्ता क्यों नहीं हिल सकता, जिसके पास न तो जिले में और न प्रदेश में और न देश के संगठन में कोई पद हो। यह भी सवाल उठ रहा हैं, आखिर पदहीन व्यक्ति के बिना कभी पत्ता हिलेगा भी या नहीं? पूछा जा रहा है, कि पदहीन व्यक्ति कैसे इतना मजबूत हो सकता है, कि जिले की राजनीति उसके इर्दगिर्द घूमे। जिले के संगठन में इतनी दखलदांजी हो कि उनकी मर्जी के बिना कोई पदाधिकारी तो क्या कार्यसमिति का सदस्य तक नहीं हो सकता। इसका मतलब यह हुआ कि जिस व्यक्ति के पास पद हैं, वह महत्वहीन है, और जिसके पास नहीं वह महत्वपूर्ण है। अगर ऐसा है, तो एक मजबूत संगठन के होने या न होने का क्या मतलब? यही कारण है, कि जिले का संगठन मजबूत नहीं हो रहा है। जब हर चीज महामहीम की इच्छा और अनिच्छा पर निर्भर होगा तो संगठन कैसे मजबूत होगा? भाजपा जैसी पार्टी का जिलाध्यक्ष अगर कमजोर होगा तो उसका प्रभाव संगठन के कामकाज पर पड़ता है। अधिकारी मनमानी करने लगते हैं, कार्यकर्त्ताओं में निराशा उत्पन्न हो जाती है। हर फैसले पर उंगली उठने लगती है। पदहीन व्यक्ति को भी उस व्यक्ति के मान और सम्मान का ख्याल रखना चाहिए, जिसके हाथ में जिले की बागडोर हो। किसी को यह कहने और सुनने का मौका नहीं देना चाहिए, कि जिले की बागडोर संभालने की बागडोर किसी और के पास हो। बहरहाल, जब भी कोई निर्णय होता है, तो यह कहा और माना जाता है, कि इस निर्णय के पीछे महामहीम का हाथ होगा। जब भी कोई पदाधिकारी चुना जाता है, तो वह सबसे पहले और सबसे अधिक जयजयकार महामहीम का ही सोषल मीडिया के जरिए करता हैं, ऐसा करने वाले यह भूल जाते हैं, कि प्रदेष और जिलाध्यक्ष भी हैं। जिलाध्यक्ष की तो जयजयकार कर भी लेते हैं, लेकिन प्रदेश अध्यक्ष की षायद ही कोई करता हो, जब कि पदाधिकारी की सूची पर अंतिम मोहर प्रदेश अध्यक्ष की ही लगती है, और जारी लिस्ट में जिलाध्यक्ष यह भी कहते हैं, कि प्रदेश अध्यक्ष की अनुमति और सहमति से ही सूची जारी की जा रही है। पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्त्ता और वरिष्ठ नेता कहते हैं, कि जिले के संगठन को विधानसभा चुनाव से पहले इतना मजबूत होना पड़ेगा, कि पांचों विधानसभाओं में भाजपा का परचम लहराए। पार्टी के जिलाध्यक्ष को अपने होने का कार्यकर्त्ताओं के बीच एहसास कराना होगा, उन्हें यह भरोसा दिलाना होगा, कि पार्टी और हम आप लोगों के साथ हैं, यह भी एहसास कराना होगा, कि आप लोगों को पूरा सम्मान मिलेगा, जिले के अधिकारी तक आप लोगों का सम्मान करेगें, हमारे रहते किसी चौकी इंचार्ज या एसओ की हिम्मत नहीं पड़ेगी कि आप लोगों की मोटरसाइकिल को वह न छोड़े। यकीन मानिए, जिस दिन जिलाध्यक्ष अपने कार्यकर्त्ताओं को अपने होने का एहसास कराने में सफल हो गए, तो वह प्रदेश के हीरो हो जाएगे। अगर जिलाध्यक्ष को कार्यकर्त्ताओं से जाने-अनजाने में हुई गलती की माफी भी मांगनी पड़े तो पार्टी हित में मांग लेना चाहिए। जिलाध्यक्ष को अगर प्रदेष का हीरो बनना हैं, तो पार्टी हित में बड़पन दिखाना ही होगा, वरना 2027 में विलेन बनने को तैयार रहे। रही बात महामहीन की तो उन्हें और भी बड़ा उदार होना पड़ेगा। अगर जिलाध्यक्ष और महामहीम को 2027 फतह करना है, तो अपने उपर लगे धब्बे को मिटाने का प्रयास करना होगा। तभी पार्टी और दोनों की मंशा सफल होगी।
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