बस्ती। जिस तरह पीएचसी और सीएचसी के डाक्टरों का मरीजों के प्रति जो रुखा और गैरजिम्मेदाराना रर्वैया बार-बार सामने आ रहा है, उससे पता चलता है, यह लोग डाक्टर न होकर कसाई हो गएं है। अगर कोई एमरजेंसी में मरीज को रात विरात अस्पताल ले जाता तो बुलाने के बाद भी डाक्टर नहीं आते हैं, किसी तरह आते हैं, तो कहते हैं, कि क्यों हमारी नींद हराम कर रहे हो, तब मरीज कहता है, कि डाक्टर साहब मेरा मां मर रही है, काफी गंभीर है, तो कहते हैं, कि मरी तो नहीं न, इतना शोर मचा रखा है, डाक्टर को सोने भी नहीं देते। जब मरीज का तीमारदार कहता है, कि डाक्टर इस बार देख लीजिए, आइंदा आपकी नींद हराम करने नहीं आउंगा, इस पर डाक्टर और नाराज हो जाते हैं, और कहते हैं, कि नेतागिरी करते हो। इतना सबकुछ हो जाने के बाद भी डाक्टर साहब मरीज का ठीक से इलाज नहीं करते, जब दूसरा कोई डाक्टर आता है, तो वह बाहर की इतनी दवा लिख देता है, कि तीमारदार मरीज को लेकर शहर की ओर भाग जाता है। डाक्टर साहबों की इसी लापरवाही के चलते पीएचसी बहादुरपुर में इलाज के लिए आया मरीज बाढू गुप्त निवासी सेखुपुरा 16 मई को अस्पताल आया, जब कोई डाक्टर नहीं मिले तो उसके परिजन बस्ती लेकर जाने को तैयार हुए, लेकिन बेचारा बस्ती भी नहीं पहुंच सका और रास्ते में ही उसकी मौत हो गई, अगर पीएचसी के डाक्टर उसका इलाज कर देते तो शायद मरीज बच जाता, लेकिन इससे डाक्टरों से क्या मतलब मरीज मरे या जिए इनसे कोई सरोकार नहीं है। हां अगर इनके पैसा मिल जाए तो सबकुछ छोड़कर अस्पताल आ जाते है।

सर्रैया खुर्द निवासी आलोक मिश्र अपनी माताजी को गंभीर स्थित में 16 मई 26 को इलाज के लिए सीएचसी बहादुरपुर कलवारी सुबह पांच बजे ले आए, माताजी को सांस फूलने की बीमारी थी, जब उन्होंने देखा कि अस्पताल में कोई भी डाक्टर नहीं हैं, तो उन्होंने एमआईसी को फोन किया बहरहाल, एमओआईसी के बहुत कहने पर डा. प्रशंसा जायसवाल सुबह 7.20 पर गुस्से में लाल होते आई और कहने लगी कि किसका मरीज हैं, जिसके लिए हमारी नींद को हराम कर दिया। झाल्लाकर कहीं कि तुम्हारी माताजी मर जाए हमसे क्या? रोज यहां पर न जाने कितने मरीज आते हैं, और मर जाते है। कोई जरुरी नहीं कि मरीज जिंदा ही रहे। एक महिला डाक्टर का इस तरह अंसवेदनशील होना हैरान करने वाली बात है। बहरहाल, वह वहां से फिर सोने चली गई, बाद में कोई डाक्टर आए और उन्होंने बाहर की आठ दवा लिख दिया, जिसे देख मरीज का सिर चकरा गया। वह माताजी को लेकर पानी की टंकी के पास होम्योपैथ के डा0 वर्मा को दिखाया, उनकी दवा से माताजी ठीक हो गई। अस्पताल वालों ने माताजी को जिस बेड पर लेटाया उस पर चददर भी बिछा हुआ नहीं था। आलोक मिश्र जब बाहरी दवा वाला पर्चा लेकर बाहर आया और पता किया कि कितने की दवा है, तो उसे बताया गया कि 15-16 सौ लगेगा। यह वही बाहर की दवा होती है, जिसपर डाक्टर को 50 फीसद कमीषन मिलता है। इसका खुलासा अनेकों बार हो चुका है। दवा खरीदने में जहां 15-16 सौ लगता वहां 50 रुपये के होम्योपैथ की दवा में काम हो गया। 15-16 सौ रुपया खर्च करने के बाद भी इसकी कोई गारंटी नहीं कि मरीज ठीक ही हो जाएगा, क्यों कि बाहर की वही दवाएं होती है, जो 10 रुपये की 100 रुपये में बिकती है। मरीज ठीक भी नहीं होता अलबत्ता लोकल की दवा होने के कारण हालत और भी खराब हो जाती है। मरीज मर भी जाता है। आलोक मिश्र ने इसकी षिकायत डीएम से करते हुए डाक्टर के खिलाफ कार्रवाई करने की अपील की है।