बस्ती। सवाल उठ रहा है, कि जब जिले में योग्य अधिकारियों की भरमार है, तो फिर क्यों नहीं उसका लाभ आम जनता को मिल रहा? और जनता क्यों नहीं संतुष्ट हो रही? और क्यों नहीं शिकायतों का निस्तारण समय से हो रहा? और क्यों महीनों बाद भी जांच पूरी नहीं होती? तो फिर ऐसे योग्य अधिकारियों के भरमार होने से क्या फायदा? अगर कोई अधिकारी जांच का आदेश देता हैं, और वही अधिकारी जांच पूरा हुए बिना टेंडर का अनुमोदन देता है, तो फिर अनुमोदन देने वाले अधिकारियों पर सवाल तो उठेगा ही? जाहिर सी बात हैं, कि ऐसे अधिकारियों के ज्ञान पर भी सवाल उठेगा। सवाल उठ रहा है, कि क्यों नहीं अनुमोदन देने से पहले अधिकारी ने सीएमओ से पूछा कि क्यों बिना जांच पूरा हुए, अनुमोदन की पत्रावली ले आए? सवाल करना तो दूर की बात हैं, टेंडर का अनुमोदन भी कर दिया। सर्वविदित है, कि जब तक कोई जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक अनुमोदन नहीं दिया जा सकता, अगर कोई अधिकारी देता है, तो वह अज्ञानतावश देता है, या फिर अधिकारियों के द्वारा अंधेरे में रखकर अनुमोदन लिया जाता है? लेकिन जब यही मामला कोर्ट में जाता है, तो अनुमोदन देने वाला अधिकारी जबाव नहीं दे पाता, जिसका नतीजा अनुमोदन और टेंडर दोनों निरस्त हो जाता हैं, जैसा कि कई बार हो चुका है। अगर कहीं तेज कोर्ट मिल गया तो अनुमोदन देने वाले अधिकारी की खैर नहीं। ऐसा एक बार नहीं कई बार हो चुका है, चूंकि अनुमोदन पर किसी आईएएस अधिकारी का हस्ताक्षर होता है, इस लिए नरमी बरत दी जाती है।

इसी तरह का सवाल जिले के पूर्व प्रभारी मंत्री राजेंद्र सिंह उर्फ मोती सिंह से जब एक पत्रकार ने पूछा कि क्यों डीएम साहबगण एनएचआरएम की पत्रावली पर अध्यक्ष के रुप में बिना जांच पड़ताल किए हस्ताक्षर कर देते हैं? और जब इसकी जांच होती है, तो आईएएस का मामला जानकर छोड़ दिया जाता है, जिसका लाभ अनेक सीएमओ और ठेकेदार उठा चुके हैं, पर कहने लगे कि बहुत सी ऐसी जानकारी होती है, जो डीएम को मालूम नहीं होता, इस लिए डीएम की गलती कम और अनुमोदन की पत्रावली प्रस्तुत करने वाले सीएमओ की अधिक होती है। इसी को देखते हुए दीपक कुमार मिश्र नामक शिकायतकर्त्ता ने मुख्य सचिव को लिखा है, कि वह लोक सेवा आयोग को लिखे कि योग्य आईएएस का चयन अवष्य करे, लेकिन बहुत योग्य का चयन न करें। यह ऐसा मामला है, जिसे लेकर मंडल और जिले के आला अधिकारियों पर अनेक सवाल उठ रहे है, और पूछा जा रहा है, कि सीएमओ ने कैसे उस जय कांस्टक्षन के जनेष्वर चौधरी के नाम सिविल वर्क का अनुबंध कर दिया जो अपूर्ण था? और कैसे सीएमओ ने अनुबंध वाली पत्रावली पर डीएम से अनुमोदन ले लिया, जिसकी जांच खुद डीएम करा रही है। यह भी सवाल उठ रहा है, कि आखिर किसके दबाव में अनुबंध किया गया, वह भी वित्तीय साल 25-26 के अंतिम दिन यानि 30 मार्च 26 को। सबसे बड़ा यह उठ रहा है, कि जब अनुबंध 25-26 का किया गया तो कैसे 26-27 में काम और भुगतान होगा? जिस तरह एक ही दिन में सबकुछ किया गया, वह अपने आप में ही बड़ा सवाल है। दीपक कुमार मिश्र ने लिखा कि हर महीने डीएचएस की बैठक डीएम की अध्यक्षता में होती है, सीएमओ एवं अन्य अधीक्षक शासन से मिले गरीब मरीजों के धन को किस तरह मनमाने तरीके से बर्बाद किया जाता है, और किस तरह टुकड़ों-टुकड़ों में कोटेशन और आर्डर के जरिए एक ही फर्म बाबा इंटरप्राइजेज गोरखपुर को प्रिटिगं और शुभग अग्रवाल को सप्लाई के लिए दिया जाता है, उससे पता चलता है, कि डीएचएस की बैठक सिर्फ दिखावे के लिए होता। एक करोड़ के बजट को किस तरह अनुचित जाभ के लिए उसे 10-10 लाख के दस आर्डर एवं कोटेशन पर चहेते ठेकेदारों को लाभ देने का खेल सीएमओ खेलते हैं, और उस पर आंख बंद करके अध्यक्ष के रुप में डीएम ने हस्ताक्षर कर दे रहें हैं, अगर कहीं इसकी जांच हो जाए तो न जाने कितने सीएमओ और योग्य डीएम फंस जाएगें।