बस्ती। वैसे तो जिला कार्यकारिणी की जो सूची जारी हुई हैं, उस पर तो कई सवाल उठ रहे हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है, कि अगर पार्टी ‘प्रत्यूश विक्रम सिंह’ को तीन बार जिला उपाध्यक्ष पद का मौका दे सकती है, तो ‘दुष्यंत विक्रम सिंह’ जैसे युवा और पार्टी के प्रति समर्पित रहने वाले को एक बार मौका क्यों नहीं दे सकती? एक ही व्यक्ति को बार मौका देने का क्या मतलब निकाला जाए? यह मतलब निकाला जाए कि दुष्यंत विक्रम सिंह से अधिक प्रत्यूश विक्रम सिंह निष्ठावान हैं? या फिर दुष्यंत सिंह महामहीम और जिलाध्यक्ष के मानक पर खरा नहीं उतर पा रहे हैं? एक ही व्यक्ति को बार-बार पद देना एकाधिकार को बढ़ावा देने जैसा माना जाता है। किसी भी व्यक्ति को इस लिए बार-बार पद नहीं मिलना चाहिए क्यों कि वह किसी के चहेतंे हैं। दो राय नहीं कि दोनों भाजपा के प्रति पूरी तरह समर्पित कार्यकर्त्ता हैं, दोनों एक ही परिवार से आते हैं, और दोनों भाई भी है, और यह ऐसे पिता के होनहार पुत्र हैं, जो भले ही विधायक नहीं बन पाए, लेकिन उनके भीतर जो पार्टी के प्रति लगाव और समर्पण की भावना हैं, वह बहुत कम लोगों में देखने को मिलती है। दोनों भाई काफी उर्जावान और पार्टी के लिए कुछ भी त्याग करने को तैयार रहतें है। सवाल उठ रहा है, कि अगर दोनों उर्जावान और पार्टी के प्रति समर्पित हैं, तो फिर एक को ही क्यों बार-बार सम्मान दिया जा रहा है? और क्यों दूसरे का बार-बार अपमान किया जा रहा है? इस सवाल का जबाव उन लोगों को देना है, जो यह कहते हैं, कि पार्टी किसी एक व्यक्ति की बपौती नहीं होती है।
पार्टी ने मनमोहन श्रीवास्तव उर्फ काजू को मौका न देकर बहुत बड़ी गलती की हैं, इस गलती का खामियाजा पार्टी को कितना भुगतना पड़ सकता है, इसका अंदाजा तो नहीं हैं, लेकिन जिस तरह इनके पक्ष में लोग खड़े हो रहे हैं, और पार्टी से सवाल कर रहे हैं, उसे देखते हुए कहा जा सकता है, कि पार्टी को इनके बारे में पुनः विचार करना चाहिए। खाटी कार्यकर्त्ता रवींद्र गौतम जैसे का बार-बार नजरंदाज करना भी पार्टी के लिए षुभ नहीं माना जा रहा है। एक तरह से कुछ लोगों ने इनके राजनैतिक भविष्य को ही कुछ लोगों के द्वारा समाप्त करने की साजिश बता रहे है। आज तक लोगों को यह समझ में नहीं आया कि आखिर इन्हें किस गुनाह की सजा दी जा रही है। देखा जाए तो इनका सबसे बड़ा गुनाह ‘यस मैन’ न बन पाना रहा। जिस व्यक्ति ने लगभग 40 साल पार्टी को दिया, अगर उसे अभी तक कोई लाभकारी पद नहीं मिला और इनके स्थान पर नेता के चालक को दिया गया तो जाहिर सी बात हैं, कि निराशा तो होगी ही। बहरहाल, वर्तमान की राजनीति में रवींद्र कुमार गौतम को सबसे अधिक ‘अनलकी’ माना जा रहा है, वरना पार्टी के प्रति वफादारी और लगन में इनके भीतर कोई कमी नहीं। यह किसी नेता के मनई-तनई नहीं बन सके, यही इनकी सबसे बड़ी कमजोरी मानी जा रही है। पार्टी के लोगों ने ऐसे को पुरस्कार दिया, जो पहले बसपाई बने, फिर सपाई बने और बाद भाजपाई, इनका नाम हैं, दिलीप पांडेय, यह किसान मोर्चा के जिलाध्यक्ष भी हैं, अगर इनसे कोई यह पूछे कि इतने दिनों में आपने कितनी किसान रैलियां की और कितने किसानों को भाजपा से जोड़ा तो यह नहीं बता पाएगें। इनके बारे में पार्टी के लोगों का ही कहना है, जो व्यक्ति पार्टी को 10-15 वोट नहीं दिला सकता, उसे जिला उपाध्यक्ष बना दिया। आखिर इन्हें किस काबिलियत पर उपध्याक्ष बनाया गया और दुष्यंत विक्रम सिंह जैसे को जिनके पास न जाने कितने ऐसे समर्थक और वोटर्स हैं, जो किसी के हार और जीत का कारण बन सकतें है। इन्हें किसके कारण मौका नहीं दिया गया, इसका जबाव किसी के पास भी नहीं। गन्ना समिति के चेयरमैन को जीताने में इनकी अहम भूमिका रही। विधायक के विरोध में आवाज उठाने वाले सुनील सिंह को उसका ईनाम मिला और उन्हें मंत्री बना दिया गया। मंत्री बनाए राकेश शर्मा को पूर्व सांसद का करीबी बताया जा रहा है। वीरेंद्र गौतम का मंत्री से जिला उपाध्यक्ष पर प्रमोशन किया गया। जिला मंत्री सुरेंद्र चौधरी को भी महामहीम का कृपा पात्र बताया जा रहा है। मंत्री सुधारक पांडेय को जिलाध्यक्ष के कोटे का माना जा रहा। यह ठेकेदार भी है। इससे पहले इन्हें कोई जिम्मेदारी नहीं मिली, पहली बार इन्हें मंत्री पद मिला। मंत्री विनय सिंह भारद्वाज को भी विधायक का विरोधी होने का पुरस्कार मिला। इनका कोई खास राजनीति ग्राउंड नहीं। जिन लोगों को पुरस्कार मिला, उनमें अधिकांश ऐसे हैं, जिनका कोई जनाधार नही, यह जनता के बीच में नहीं रहतें, सवाल उठ रहा है, कि जिन पदाधिकारियों को कोई खास जनाधर न हो, वह कैसे 2027 में भाजपा की नैया पार लगाएगें? जिनके पास जनाधार है, उन्हें तो पार्टी ने किनारे कर दिया। पार्टी ने बनिया और कायस्थ की उपेक्षा करके खुद का नुकसान किया। इससे परम्परागत वोट जुड़ने के बजाए छटक जाएगा। भाजपा वाले देखते और हाथ मलते रह जाएगें।
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