बस्ती। महादेव का कहना है, कि वो तो भला हो पूर्व प्रदेष अध्यक्ष प्रशांत पांडेय और ई. राधे श्याम पांडेय का जिन्होंने हिसाब किताब मांग लिया, वरना कुछ लोग ब्राहृमण महासभा को बेचने का पूरा प्लान बना चुके थे, कहते हैं, कि चाटुकारिता छोड़िए और हिसाब किताब दीजिए। देना तो पड़ेगा ही। कितना भी बचाव कर लीजिए, नहीं कर पाएगें, क्यों नहीं रविवार की बैठक में आए, ऐसा भी नहीं इसकी सूचना नहीं थी, सवाल करते हैं, कि क्या मुंह लेकर मंत्रीजी आते? कहा कि अगर हिसाब-किताब नहीं दिया गया तो आप लागों को ब्राहृमण महासभा को इज्जत के साथ छोड़ दीजिए, वरना कार्यकर्त्ता और पदाधिकारियों के द्वारा कानूनी कार्रवाई की जाएगी। फिर कहा कि अगर प्रशांत पांडेय ने हिसाब-किताब नहीं मोगा होता तो आप लोग ब्राहृमण महासभा को अब तक बेच चुके होते। रामानुज मिश्र कहते हैं, कि माना कि वह व्यक्ति ब्राहृमण महासभा के लिए बहुत कुछ किया, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आप संस्था से गददारी करें, धोखाधड़ी और चोरी आदि में लिप्त रहें, चंदा का तो पूरा हिसाब रखना और देना ही चाहिए, पटल पर सबके सामने रखकर आरोपों से अपने आप को अलग क्यों नहीं करमे? हिसाब देकर कर, सवाल उठाने वालों के मुंह पर तमाचा क्यों नहीं मारते? डा. आशीष नरायन त्रिपाठी कहते हैं, कि इस तरह का आरोप-प्रत्यारोप का एक ही कारण है, कि शुरुआत से लेकर आज तक हिसाब देने में टालमटोल करना, आरोपों के गलत सही का फैसला तब तक नहीं होगा, जबतक पारदर्शिता और प्रमाणिता, अभिलेख, रसीद के साथ आय-व्यय का विवरण जिम्मेदार लोग जैसे महामंत्री और कोषाध्यक्ष सबके सामने नहीं रख देगें, अगर यूंही ऐसा चलता रहा तो महामंत्री और कोषाध्यक्ष के नाते अभी और लोगों पर भी गंभीर आरोप लग सकता है। विषाल द्विवेदी लिखते हैं, कि बहुत दिनों से देख रहा हूं, कि एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लग रहे हैं, जबकि जिम्मेदार मौन व्रत धारण किए हुए बैठे, जिम्मेदारों को इसका जबाव देना चाहिए, मौन रहने से कुछ नहीं होने वाला है। प्रशांत पांडेय ने एक बार फिर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि आप लोगों ने ब्राहृमण महासभा को इस स्थित में छोड़ा ही नहीं कि कोई इसे पूछे भी, रही बात महासभा को बेचने की तो बता दूं, कि जब चंद्रभूषण मिश्रजी नगर पालिका अध्यक्ष का चुनाव लड़ रहे थे, तो महामंत्री षंभूनाथ मिश्र ने धीरेंद्र शुक्लजी से 65 हजार लिया था, जिसका आरोप भी आपके महान गुरुवर पर लग चुका है, और साथ ही अन्य प्रत्याशियों से भी पैसा लिया था, जिसका आरोप साबित भी हो चुका है। उन्हीं के रास्ते पर आप भी चल रहे है। जिस तरह आप बचाव कर रहे हैें,उसका हर बात का जबाव मिल जाएगा, लेकिन हिसाब तो हर हाल में देना ही पड़ेगा। बार-बार रहकर यह सवाल उठ रहा है, कि क्यों नहीं हिसाब-किताब दिया जा रहा? क्यों हिसाब देने से पीछे हटा जा रहा है? क्यों हिसाब देने वालों का बचाव किया जा रहा है, जिस तरह एक दिन पहले की बैठक में 10 लाख देने की बात उठी, उसे पता चलता है, कि पैसे का दुरुपयोग किया गया होगा, क्यों एक साल तक 10 लाख किसी को दिया गया? देने के पीछे मकसद क्या रहा? अगर पदाधिकारी इतना गंभीर आरोप किसी पदाधिकारी पर लगा रहे हैं, तो उसका जबाव देना आवष्यक हो गया, वरना इससे भी गंभीर आरोप झेलने के लिए तैयार रहना होगा। इतनी छोटी सी बात क्यों नहीं महामंत्री और कोषाध्यक्ष को समझ में आ रही है, कि जितना आप लोग हिसाब देने से भागेगें, उतना आप का पीछा होगा। अगर हिसाब देने से महासभा की छवि धूमिल होने से बच सकती है, तो दे देना चाहिए।