बस्ती। बार-बार बिकने वाले संजय चौधरी एथेनाल फैक्टी के आंदोलन से हटने के एवज में यह कितने में बिके यह तो नहीं मालूम लेकिन विधायक नहीं बन पाएगें, यह अवष्य मालूम है। जिस तरह इन्होंने दसिया के लोगों को धोखा दिया, उसे देखते हुए अगर यह 27 में रुधौली से चुनाव लड़ने की इच्छा रखते हैं, तो इनका विधायक बनने का चांस समाप्त हो गया। इनके साथ ही उस प्रधान का भी दूबारा प्रधान बनने का सपना पूरा नहीं होगा, जिसने सरकारी जमीन पर कब्जा करके सड़क किनारे मकान बनवा लिया। एक का आंदोलन से हटना और दूसरे का आंदोलन का विरोध करना, यह साबित करता है, कि खरीद फरोख्त अवष्य हुई होगी, वरना कोई भी व्यक्ति अपने राजनैतिक भविष्य को इस तरह दांव पर न लगाता। दोनों, क्षेत्र के लोगों की नजरों से गिर चुके और दोनों को क्षेत्र की जनता गददार कहकर बुलाती है। सबसे अधिक आरोप स्थानीय निवासी संजय चौधरी पर गांव वाले लगा रहे हैं, और पूछ रहे हैं, कि जब बिकना ही था, तो पहले बिक गए होते, रोड शो और चौपाल के जरिए विरोध करने की क्या आवष्यकता? गांव का प्रधान तो इतना बड़ा भ्रष्टाचारी हैं, कि उसने गांव वालों और मीडिया के लोगों को ही चोर और बेईमान बना दिया, विरोध करने वाले पत्रकारों के बारे में कहा कि यह लोग विरोध के जरिए धन उगाही करना चाह रहें है। गांव वालों के बारे में कहा कि जब गांव वालों ने जमीनों का पैसा ले लिया तो विरोध क्यों कर रहे हैं? रही बात संजय चौधरी के बारे में तो गांव वालें और मीडिया पहले ही इनके बारे में आषंका जता चुकी थी, यह उस दिन पलट जाएगें, जिस दिन इन्हें को खरीदने वाला मिल जाएगा। जो व्यक्ति कीमत लगाकर गददी पर बैठा हो, उसकी भी कहीं न कहीं बिकने की कीमत होगी, जिस दिन इन्हें अच्छी कीमत मिल जाएगी, उस दिन बिक जाएगें। हुआ भी यही। यही कारण हैं, कि इन पर कोई विष्वास नहीं करता। इनके सामने सबसे बड़ा सकंट विष्वास का है, इन्होंने पैसा तो बहुत कमाया, लेकिन विष्वास नहीं कमाया, और जो व्यक्ति विष्वास नहीं कमा सकता, उसकी कीमत कभी भी और कहीं भी लगाई जा सकती है। पहले 14 लाख लेकर मानचित्र पास किया, और जब 75 फीसद फैक्टी बनकर तैयार हो गई, तो विरोध पर उतर आए। तब इन्हें जनता की परेशानी याद आ गई, इन्हें जनता का जीवन खतरे में दिखाई पड़ने लगा, तब इन्हें फैक्टी से होने वाले नुकसान का पता चला। फैक्टी बंद करवाने के लिए आंदोलन छेड़ा, सड़क पर उतरे, ऐसा लगा कि मानों कि किसानों, नौजवानों और छात्रों को संजय चौधरी के रुप में कोई मसीहा मिल गया। लेकिन जब इन्होंने अचानक आंदोलन से किनारा कसा, उसी दिन आमजनमानस में यह चर्चा होने लगी कि यह बिक गए, फैक्टी मालिक ने इनकी कीमत लगा दी, अगर कीमत न लगी होगी तो या आंदोलन से न हटते, जब इन्होंने आंदोलन षुरु हुआ तो इनके साथ विपक्ष के विधायक राजेंद्र चौधरी कंधा से कंधा मिलाकर चलते थे, संजय चौधरी को देखते हुए लोग इस बात की चर्चा कर रहे हैं, कि कहीं ऐसा न हो कि विधायकजी को अच्छी कीमत मिल जाए, और वह भी संजय चौधरी की तरह आंदोलन से किनारा कस लें। चूंकि नेताओं का रिकार्ड बहुत खराब हैं, इस लिए इसकी संभावना क्षेत्र के लोग इस तरह व्यक्त कर रहे हैं, क्यों कि बिकने की घटना सामने आ चुकी है। बहुत कम ऐसे नेता होते हैं, जो अपने राजनैतिक भविष्य को संजय चौधरी की तरह दांव पर लगातें। क्षेत्रवासियों के मुताबिक 50 लाख की कीमत लगाई गई, लेकिन इनके चाहने वालें चार-पांच लाख बता रहे है। इनकी देखा-देखी प्रधान भी बिक गया, और वह भी फैक्टी मालिक का भाषा बोलने लगा। जब प्रधान ही बिक जाएगा, तो गांव वालों का क्या होगा? बिकने को लेकर गांव वालों में जो रोष व्याप्त हैं, उसे देखते हुए बिकने वालों पर गांव वालों का कभी भी गुस्सा फूट सकता है, अनहोनी घटना से भी इंकार नहीं किया जा सकता। प्रधान को यह नहीं भूलना चाहिए कि वह एलेक्टेट हैं, संजय चौधरी की तरह सलेक्टेड नहीं। गांव वालों ने जिन दोनों पर सबसे अधिक भरोसा किया, उन्हीं दोनों ने गांव वालों के साथ विष्वासघात किया और दगा दिया। क्या इसी विष्वासघात और धोखे के साथ दोनों चुनाव में जाएगें?