बस्ती। अवैध अतिक्रमण को हटाने को लेकर एसडीएम लोग पूरी तरह विफल है। अब लोगों का विष्वास एसडीएम और तहसीलदारों पर नहीं रहा, क्यों कि यह सभी बिके हुए है। इसी लिए अधिकांश लोग अब हाईकोर्ट की ओर रुख कर रहे है। सवाल उठ रहा है, कि जो काम एसडीएम के स्तर का हैं, उसे हाईकोर्ट को क्यों करना पड़ रहा हैं? कहा भी जाता है, अगर हाईकोर्ट न हो तो जिले भर की सरकारी जमीनों को एसडीएम भूमामियों को बेच दें, और बेच भी रहे हैं, कोई रोकने वाला नहीं, जो आवाज उठाता है, उसे या तो कब्जा कराने वाले या फिर पुलिस दबाव बनाकर चुप करा देती है। इस मामले में सबसे अधिक सवाल एसडीएम कोर्ट और साहब पर उठ रहे हैं, पूछा जा रहा है, कि जो निस्तारण एक-दो तारीख में हो जाना चाहिए, वह सालों बाद भी क्यों नहीं हो रहा है? क्यों निस्तारण के बजाए तारीख पर तारीख दे दी जाती है। जाहिर सी बात हैं, कि तारीख तो वही लेगा, जिसने जमीन पर कब्जा किया। एसडीएम और तहसीलदारों ने अब तक अरबों रुपये की सरकारी और गैरसरकारी जमीने बेच दी, पैसा लेकर गलत फैसले दिए, पैरवी करने वाला चिल्लाता रह जाता है, कि साहब आप गलत फैसला कर रहे हैं, लेकिन साहब सुनने को तैयार नहीं, साहब इस लिए नहीं सुनते कि क्यों कि उन्हें मोटी रकम मिली रहती है। सवाल उठ रहा है, कि बनकटी के बसौढ़ी में जो बुलडोजर पांच साल पहले एसडीएम को चलवा देना चाहिए था, उस पर पांच साल बाद क्यों चलाया? वह भी हाईकोर्ट के आदेश पर। अगर एसडीएम साहब का बस चलता तो कभी भी बुलडोजर नहीं चलता। क्यों कि पूरी तहसील सपा नेता राजेश शुक्ल के आगे बिक चुकी थीं, चेयरमैन सपा की और दूसरे की जमीन पर अपने घर तक इंटरलाकिगं सड़क बनाने वाले सपा के, तो डर किसका। अगर सीमा शुक्ल हाईकोर्ट तक न लड़ती तो कभी बुलडोजर न चलता, इसके लिए सीमा शुक्ल बधाई की पात्र हैं, जिन्होंने न सिर्फ लड़ा बल्कि दन लोगों को लड़ने की प्रेरणा दी जिन्हें स्थानीय प्रशासन से न्याय नहीं मिल रहा। सवाल, उठ रहा है, कि आखिर कितने लोग सीमा शुक्ल जैसे हैं, जो व्यवस्था ने लड़ने की हिम्मत रखती है। यह सीमा शुक्ल की जीत और राजेश शुक्ल की हार है। अब एक और सवाल उठ रहा है, जिस इंटरलाकिगं सड़क पर बुलडोजर चला, उस सड़क के निर्माण पर हुए तीन लाख कौन देगा? चेयरपर्सन वेदकला या राजेश शुक्ल? अगर इसी तरह का बुलडोजर दो चार स्थानों पर और चल गया तो अतिक्रमण कम हो जाएगा। सीमा शुक्ल जैसे तो बहुत कम हैं, लेकिन राजेश शुक्ल जैसे हजारों होगें। प्रशासन भी सीमा जैसी लड़ाकू लोगों का साथ नहीं देती, बल्कि राजेश शुक्ल जैसों का साथ देती है। अभी तक स्थानीय प्रशासन एक भी तालाब पर से कब्जा नहीं हटवा पाया, और न सरकारी जमीनों पर काबिज लोगों के घरों पर बुलडोजर चलवाया। जब भी बुलडोजर चला हाईकोर्ट के आदेश पर चला। कहा भी जाता है, कि जब हाईकोर्ट को ही सब करना है, तो फिर एसडीएम न्यायालय का क्या काम? कुदरहा ब्लॉक के छरदही में प्रधान ने खुद सरकारी जमीन पर मकान बना लिया, बुलडोजर चलाने का आदेष भी हुआ, लेकिन आज तक एसडीएम बुलडोजर नहीं चलवा पाए। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है, कि हर कोई सीमा शुक्ल जैसा नहीं हो सकता, और न हर कोई हाईकोर्ट ही जा सकता है। इसी का फायदा भूमाफिया उठाते है।
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