बस्ती। मार खाने वाले पत्रकार की कार्यषैली भले ही आइडिएल पत्रकार की तरह न रही हो, और उन पर धन उगाही जैसे आरोप लगता रहा हो, इन सबके बावजूद बभनान के पत्रकारों को अपने साथी का साथ देना चाहिए था, लेकिन साथ देने को कौन कहे, बभनान के दो बाबू साहब पत्रकारों की दुकाने चेयरमैन साहब की मेहरबानी से चलती रहे, इस लिए दोनों पत्रकारों की भूमिका मरवाने से लेकर घर पर समझौता कराने और पत्रकार संगठन के कार्यालय में मिठाई का डिब्बा लेकर माफी मांगने तक में रही है। कहने को तो यह दोनों पत्रकार बाबू साहब हैं, लेकिन इनके भीतर बाबू साहब जैसा कोई गुण नहीं है। इज्जतदार बाबू साहब अपनी आनबान और षान के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं, बाबू साहब गरीबी में रह सकते हैं, लेकिन किसी की गुलामी या फिर अपने साथियों को कभी धोखा नहीं दे सकते। इन दोनों पत्रकारों की गददारी का पता तभी चल गया था, जब यह दोनों पीड़ित पत्रकार के घर गए, और उन पर समझौता करने का दबाव यह कर बनाया कि अगर समझौता नहीं किए तो फिर पहले की तरह 376 में फंस जाआगे। जो पत्रकार एक बार 376 में फंस चुका हो, और जिसका वह उसका अंजाम देख चुका हो, अगर उससे यह कहा जाए कि अगर समझौता नहीं करोगें तो फिर 376 में फंस जाआगे, तो मजबूरी समझी जा सकती है। पत्रकार का एक वर्ग ऐसा भी जो यह कह रहा है, कि समझौता वेसे नहीं हुआ होगा, अवष्य डील हुई होगी। क्यों कि बड़े-बड़े से व्यक्ति 376 के नाम पर कांप जाता है, और यह तो एक पत्रकार है, इनकी क्या मजाल। जिन दो बाबू साहब पत्रकारों को अपराध करने वालों के खिलाफ आवाज उठाना चाहिए था, वही पत्रकार अपराध करने वालों की गाड़ी में कभी पत्रकार के आवास तो कभी ग्रापए के जिलाध्यक्ष के पास हर्रैया ले जातें है। हालांकि हर्रैया में चेयरमैन साहब को खरी खोटी सुनाया गया, और कहा गया कि मिठाई का डिब्बा ले जाइए। हालांकि चेयरमैन साहब ने गलती की माफी भी मांगी, लेकिन उन्हें माफ नहीं किया गया, देखा जाए तो पत्रकार को मारने के मामले में चेयरमैन से अधिक उन दो बाबू साहब पत्रकार को जिम्मेदार ठहराया जा रहा, जिन्होंने अपनों का साथ न देकर गैरों का इस लिए दिया ताकि उनके पत्रकारिता की दुकाने चलती रहे। ऐसे दुकान चलाने वाले पत्रकारों को हर्रैया तहसील के सभी पत्रकारों को बायकाट कर देना चाहिए। बैठक कर इन दोनों पत्रकारों के और चेयरमैन के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित करना चाहिए, और चेयरमैन के भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाना चाहिए। ताकि फिर कोई चेयरमैन या नेता किसी पत्रकार पर हाथ न उठा सके। फिर कहा जा रहा है, कि अगर किसी पत्रकार को भ्रष्टाचार या भ्रष्टाचारियों के खिलाफ आवाज उठाने या लड़ाई लड़ने में डर लगता तो उसे पत्रकारिता छोड़ देना चाहिए, नहीं तो प्रबल मलानी जैसे लोगों से मार खाने के लिए तैयार रहिए। पत्रकारिता का मेरा अनुभव कहता है, कि अगर पत्रकार निडर और निष्पक्ष है, तो वह किसी भी भ्रष्टाचारी से लड़ सकता है, और इसे करके भी दिखाया गया है। पत्रकारों को भी अपना वसूल बनाना होगा। पत्रकारों को कभी रिएक्ट नहीं करना चाहिए, रिएक्ट करने के बजाए समय का इंतजार करना चाहिए, और जब समय मिले तो छोड़ना भी नहीं चाहिए। तीन साल पहले भाजपा के एक बड़े नेता ने वाट्सअप पर ‘रंडी’ शब्द का इस्तेमाल किया था, चाहता तो एफआईआर दर्ज करवा देता, लेकिन नहीं समय का इंतजार किया, और वह समय तीन साल बाद मिला, तब नेताजी का मिठाई का डिब्बा भी आया और ‘सारी’ वाला पत्र भी आया। पत्रकारों को शोसल मीडिया पर कभी भी रिएक्ट नहीं करना चाहिए, और बदले में कोई पोस्ट ही करना चाहिए। दोनों खतरें से खाली नहीं है।
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