बस्ती। ‘कहां गुम हो गए, पार्टी को शुन्य से शिखर तक पहुंचाने वाले कैडर’ की खबर को भाजपा के उपेक्षित कैडर वाले नेता रवींद्र गौतम ने फेसबुक पर पोस्ट क्या किया, मानो कोई भूचाल सा आ गया। इस खबर ने मानो कैडर के लोगों के पुराने जख्मों को हरा कर दिया। अनेक कैडर के लोगोें ने फोन करके कहा कि एैसा लगता है, कि मानो जिले में पार्टी को बुलडोजर से ध्वस्त करने का प्रयास ऐसे लोग कर रहे हैं, जिनके पास संगठन का कोई पद नहीं, लेकिन यह जताना और दिखाना चाह रहे हैं, कि जिले में वही होगा जो हम चाहेगें, ऐसा भी नहीं कि इन्होंने जो कहा वह करके नहीं दिखाया, तभी तो इनके साथ में एक भी केैडर वाला नहीं हैं, जो हेैं, उनमें अधिकांश आयातित है। बहरहाल, पार्टी का अगर कोई बड़ा नेता सोशल मीडिया के कमेंट पर ध्यान देगा तो उसे लगेगा कि वाकई पार्टी पर बुलडोजर चलाने की तैयारी हो रही है। मीडिया बार-बार यह कहती आ रही है, कि अगर किसी नेता को अपने बारे में जानना हो तो सोषल मीडिया पर पूछ लीजिए, कि उनका अब तक कार्यकाल कैसा रहा? यकीन मानिए, नेताजी को सिर पकड़कर बैठ जाना पड़ेगा। फिर भी उनके साथ में रहने और चलने वाले आयातित लोग इसे विरोधी की साजिश बताने में नहीं हिचकेगें।
अगर सभी कमेंट को लिख दिया जाए तो अखबार भर जाएगा, इस लिए कुछ ही कमेंट बताए जा रहे है। यह उस तरह के कमेंट हैं, जिससे भाजपा के वर्तमान स्थित और जनता की सोच का पता चलता है। सिद्वार्थ श्रीवास्तवा लिखते हैं, कि गुम नहीं हो गए, एकांत में बैठकर मंथन कर रहे हैं, कि आयातित लोग कब गुलाटी मारकर दूसरी जगह जाए और संगठन आदेश दे कि पुराने झंडा ढ़ोने वाले आ जाए, नारा लगाने। राजनाथ श्रीवास्तव कहते हैं, कि अभी पार्टी को उनकी जरुरत नहीं हैं, पार्टी अभी दलबदलूओं के साथ मिलकर मलाई काटने में व्यस्त है। जब पार्टी 14 साल के बनवास में जाएगी तो ढ़ूढेगें। हरीश ओझा लिखते हैं, कि वो सिर्फ सत्ता दिलाने के लिए ही है, यूज एंड थ्रो वाली बीजेपी है, इन्हें कार्यकर्त्ता नहीं दलाल पसंद है। विजय द्विवेदी लिखते हैं, सबका साथ और सिर्फ अपना विकास, कार्यकर्त्ताओं का....। इस पर हरीश सिंह हसंते हुए 100 नंबर देते है। अवध न्यूज लाइव की ओर से लिखा गया कि अब शिखर से शुन्य की तरफ....आगे भगवान जाने। प्रकाश चौधरी लिखते हैं, कि भाई साहब नमस्कार, काम करैय वाले कार्यकर्त्ता नहीं जीहजूरी वाले चाहीं। कमल किशोर शुक्ल लिखते हैं, कि सत्ता एक नषा है, इसी लिए चाणक्य जैसे हजारों ़ऋषी मुनी सत्ता से दूर रहकर राष्ट निर्माण में लगे रहें, सत्ता के कुछ स्वाभाविक गुणदोश होते हैं, जिस पर नियंत्रण नियंताओं को करना मूल कार्यकर्त्ता जीवन भर कार्यकर्त्ता रहता है, जबकि अन्य दलों से आए कार्यकर्त्ता वरिष्ठ नेता उसी दिन बन जाता है, और उसका सत्ता की मलाई पर स्वाभाविक रुप से अधिकार बन जाता है। कैडर के चतुरगुन राजभर का दर्द हैं, कि कथाकथित पार्टी के जिम्मेदार लोगों ने पार्टी की मजबूती के लिए काम नहीं कर रहे हैं, बल्कि निष्ठावान समर्पित एवं लोकप्रिय कार्यकर्त्ताओं और नेताओं को कमजोर करने के लिए पूरी ताकत से काम कर रहे हैं। यह कारवां रुकने का नाम नहीं ले रहा है, कार्यकर्त्ताओं में अभी भी सही रुटीन पर जिम्मेदार लोगों से आशा कर रहा है, कि अच्छी शुरुआत करें, जिससे पार्टी को मजबूती मिले। देखना है, कि इसकी शुरुआत कब से होगी। सत्यब्रत सिंह लिखते हैं, कि कोई भी विशाल बृक्ष अपनी कमजोर दिखने वाली जड़ों से ही मजबूत होता है, यदि जड़ों की उपेक्षा की जाएगी तो उसकी स्थिरता पर प्रष्न चिन्हृ लगना स्वाभाविक है।
सबसे सही और सटीक कमेंट प्रमोद कुमार शुक्ल की ओर से आया, इन्होंने लिखा कि पहले भाजपा में अगर किसी कार्यक्रम में 100 लोगों को बुलाया जाता था, तो 20 आते थे, फिर 2013 में यह संख्या बढ़कर 30 हो गई, फिर जब केंद्र में भाजपा की सरकार बनी तो संख्या में तेजी से इजाफा हुआ, और 60-70 तक पहुंच गया। मगर जब 2017 में यूपी में भाजपा की सरकार बनी तो अचानक बिन बुलाए कार्यक्रमों में 100 की जगह 500 आने लगे, इस भीड़ में बेचारे शुरुआत वाले 20 अंतिम पक्ंित में पहुंच गए। यह जो 480 दिखते हैं, ऐसा लगता है, कि इनके बाप-दादा जनसंघ के समय संस्थापक सदस्य रहें हो, बेचारे 20 घर में जाकर बैठ जाते हैं, क्यों कि वो नए आयातित भाजपाईयों की तरह नौंटंकी नहीं कर सकते। सुमित शुक्ल लिखते हैं, कि भैया आज के युग में कार्यकर्त्ता नहीं बल्कि नेताओं को चापलूसी करने वाला चाहिए। संजय ओझा लिखते हैं, कि भाजपा में आने वाले लोग सिर्फ राजनीति करने वाले लोग नहीं है, वह राष्ट धर्म सर्वोपरि मानते हुए रुकते हैं, और लूटते भी है, दिक्कत उस टीम मैनेजमेंट से हैं, जिसमें संघ भाजपा समर्पित कैडर सेट नहीं हो पा रहा है, इसी लिए बिचौलिए नये नेता का तमगा हासिल कर चुके है। फेसबुक पर पोस्ट करने वाले भाजपा के रवींद्र गौतम के बारे में रामू गुप्त लिखते हैं, कि जब अपन जैसे कर्मठी ईमानदार लोगों को दरकिनार कर दिया गया तो अफर आपको भाजपा में रहने का कोई मतलब नहीं, भईया जब आप की बारी आई तब भी दरकिनार कर दिया गया, और जब तक आप की बारी नहीं आई थी, तब तक कहा गया कि इंतजार करो, कहते हैं, कि बुरा करने वालों के साथ भी बुरा होता है, यह जिले की जनता प्रत्यक्ष रुप से देख भी चुकी है, आप से ज्यादा गैरों पर भरोसा किया, जो विपक्ष से आए, उन्हें सबसे पहले प्राथमिकता दी गई। फिर दूसरे कमेंट में लिखते हैं, कि भाजपा को तो गुम होना ही था, गायघाट नगर पंचायत से टिकट आपको मिलना था, लेकिन वहां पर भी धोखा हुआ, ऐसे ही नगर पंचायत बनकटी का भी हाल है, बुरी तरह लोकसभा हारे, फिर उसी को जिलाध्यक्ष बना दिया जाता, पता नहीं कौन गुण देख बनाया। सर्वाजीत सिंह लिखते हैं, कि पार्टी में अब चरणवंदना और रुपया चल रहा हैं, 2027 में न हम रहेगें और न कोई भाजपा का विधायक ही रहेगा। राना प्रताप सिंह लिखते हैं, कि कैडर के गुम होने के बाद पार्टी गुम होने के रास्ते पर आ जाएगी। धमेंद्र जायसवाल कहते हैं, कि आप्रवासी नेता भाजपा में प्रवासी हो गएं है।, बस देखते जाइए, शुन्य तक कौन रहता। सुनील पी यादव लिखते हैं, कि पहले वाली सरकार चोर थी, लेकिन अब की तो चंबल के डकैत। अविनाश सिंह लिखते हैं, कि शुन्य से शिखर और फिर पतन की ओर।
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