बस्ती। अगर चाचा-भतीजा किसी के बर्बादी का कारण बनते हैं, और जिनके चलते किसी को हार्ट अटैक होता है, तो समाज को चाचा-भतीजा के बारे में गहन अध्ययन करना चाहिए, ताकि फिर कोई चाचा-भतीजा के कारण बर्बाद न होने पाए और न हार्ट अटैक ही हो। केडीसी के सामने स्थित पशुपति मार्बल एंड बिल्डिगं मैटेरिएल के ‘बंटी पांडेय’ का कहना है, कि चाचा यानि ‘अनूप खरे’ भतीजा यानि ‘दिव्याशु खरे’ के कारण उसका कारोबार एवं परिवार बर्बाद हो गया, बैंक का कर्ज तो पत्नी का जेवर बेचकर चुकता कर दिया, लेकिन अभी तक व्यापारियों का कर्ज नहीं चुकता कर पाया। जिसके चलते कारोबार प्रभावित हो रहा है। कहते है, कि जब हम और हम्हारी पत्नी बकाए का सात लाख मांगने अनूप खरे के स्कूल गए, तो उन लोगों ने पैसा तो नहीं दिया, अलबत्ता इतना अपमानित किया कि हार्ट अटैक आ गया। पहला अटैक था, इस लिए जान बच गई। इलाज के दौरान डाक्टरों ने कहा कि अगर दूसरा अटैक हुआ तो जान भी जा सकती है, इसी डर के नाते बकाए का पैसा मांगना छोड़ दिया, कि कहीं अगर दूसरी अटैक हुआ तो जान भी चली जाएगी। कहते हैं, कि पैसा मांगने से अच्छा केस को न्यायालय ले जाना ही बेहतर समझा। हालांकि न्यायालय में मुकदमा चेक पर हस्ताक्षर करने वाले अनूप खरे और दिप्ती खरे के नाम से चल रहा है। समन भी जारी हो चुका है। ध्यान देने वाली बात यह है, कि मुकदमा भतीजा यानि दिव्याशु खरे के नाम से नहीं हैं, फिर भी इन्हें बर्बादी का कारण बताया जा रहा है। वह इस लिए क्यों कि जब भी कोई मामला होता भतीजा ही फ्रंट में आते। भले ही चाहें भतीजा का चेक पर हस्ताक्षर नहीं है, लेकिन सभी काम यही करते और देखते हैं।
न्यायालय में दायर मुकदमे में कहा गया कि 2023 में अनूप खरे के द्वारा साढ़े सात लाख का मार्बल एंव ग्रेनाइट उधार में खरीदा गया, सामान 2024 तक जाता रहा। 17 सितंबर और 20 दिसंबर के बीच पांच लाख और दो लाख का चेक अनूप खरे और दिप्ती खरे के नाम से एचडीएफसी बैंक का दिया गया। दोनों चेक डिस्आनर हो गया। मुकदमें के बाद जो दो चेक सात लाख का दिया, वह भी डिस्आनर हो गया। पहले वाले दोनों चेक के डिस्आनर को लेकर ही मुकदमा दायर किया गया। कहा कि जब चेक मिल गया तो न्यायालय जाना बंद कर दिया। दोनों चेक जब बाउंस हुआ तो बाताकाही हुई। तब दिव्याशु खरे ने 40 हजार नकद दिया। बताया कि बैंक से जो लोन लिया था, सारी पूंजी ब्याज चुकता करने में चला गया। जेवर गहना बेचकर बैंक को 20 लाख चुकता किया। आर्थिक तंगी के कारण बच्चों का स्कूल में दाखिला नहीं करा पाया, बेटा नमोश्री पांडेय का दाखिला सीएमएस स्कूल में कक्षा दस में इस लिए करवा दिया, ताकि कर्ज की कुछ रकम फीस के रुप में वसूल हो सके। एक साल तक स्कूल ने फीस नहीं लिया। हालांकि सामान लगभग 12 लाख का गया, लेकिन भूलवश बिल सिर्फ सात लाख का ही बना। वह भी नहीं मिला। मात्र 40 हजार नकद मिला। कहते हैं, कि कारोबार में तो उधार और नकद तो चलता रहता है, लेकिन उसे नहीं मालूम था, कि उधार देकर वह चाचा-भतीजा के चक्कर में फंस जाएगें। दो बार चेक का बाउंस होना यह साबित करता है, कि देने वाले की नीयत में खोट है। कहते हैं, कि उन्हें और उनकी पत्नी को तब सबसे अधिक तकलीफ हुई, जब अनूप खरे ने स्कूल में अपमानित किया, उसी के चलते हार्ट अटैक हुआ, लखनउ में कर्ज लेकर इलाज करवाया, तब जाकर जान बची। दोस्तों और डाक्टरों की सलाह पर ‘जान हैं, तो जहान हैं’ के तर्ज पर बकाया मांगना बंद कर दिया। कहते हैं, कि एक समय इलाज के दौरान ऐसा लगा कि वह अब नहीं बचेगें, लेकिन डाक्टरों ने बचा लिया। इतने सालों के कारोबार में जो झटका चाचा और भतीजा ने दिया, उतना किसी ने भी नहीं दिया। दुखी मन से कहते हैं, कि भगवान न करे, जीवन में कभी चाचा और भतीजा जैसा ग्राहक दुबारा मिले।
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