बस्ती। अगर बसपा का प्रत्याशी अपनी ही पार्टी के प्रत्याशी को करोड़ों रुपये का चूना लगाता है, तो इसे आप क्या कहेगें? और क्या समझेगें? यही कहेगें कि चलो अच्छा हुआ कोई विधायक नहीं बना, नहीं तो यह लोग आम जनता और सरकार दोनों को ही ठग लेेते। तभी तो ग्राम प्रधान संगठन ने सोषल मीडिया पर लिखा कि ‘विधानसभा प्रत्याशी ने दूसरे विधानसभा के प्रत्याशी को ठगा, लिखा कि अगर ठग विधायक और सांसद बनकर आएगें तो देश और प्रदेश का क्या होगा? जब यह अमीरजादे विधानसभा प्रत्याशी को नहीं छोड़ रहे हैं, तो यह गरीब जनता का क्या हाल करेंगें...’। दीनानाथ यादव कहते हैं, कि ‘अमीर लोग ठगों के साफट टारगेट होते है, विपिन शुक्लजी विष्वास में ठगे, जो किसी के साथ भी हो सकता है’। अरुणेश पांडेयजी लिखते हैं, कि ‘विष्वास में कुछ भी हो सकता है, जो वर्ग अपने बाप का नहीं होता, वह आप का कैसे हो सकता?। याद कीजिए, 2022 के विधानसभा चुनाव को, अचानक करोड़ों का टिकट खरीदकर जहीर अहमद उर्फ जिम्मी नामक व्यक्ति लावलष्कर के साथ बसपा से चुनाव लड़ने के लिए कप्तानगंज आता है, और आते ही नोटों की बारिश करने लगता है, लोग कहने लगे थे, कि मुंबई का सेठ आया, और यह अपने पैसे के बल पर अन्य प्रत्याषी को आंधी की तरह बहा ले जाएगा। जिसने जितना पैसा मांगा, उसे मिला, जिसने प्रचार के लिए चार पहिया गाड़ी मांगी उसे मिला, पानी की तरह पैसा बहाया, और क्षेत्र के लोगों ने इनके पैसे का खूब उपयोग/दुरुपयोग किया। इन्हें कुल 60937 वोट मिला था, और यह तीसरे स्थान पर रहे। चुनाव तो नहीं जीत पाए, अलबत्ता इनके साथ रहने वाले मालामाल अवष्य हो गए, इसी में एक जिला पंचायत सदस्य भी है, जो खाया-पिया, पैसा और स्कापिओ जिम्मी से लिया, सबसे अधिक लाभ इन्होंने ही उठाया, यह जिला पंचायत सदस्य का चुनाव सपा से जीते, लेकिन जब जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव हुआ, वोट दिया भाजपा को और जब जिम्मी सेठ आ गए, तो उनके साथ बसपा में चले गए। ऐसे लोग किसी के भी प्रति वफादार नहीं हो सकते। ऐसे लोगों की वफादारी पैसे तक ही सीमित है। बताते हैं, कि जहीर अहमद उर्फ जिम्मी ने विधायक बनने के चक्कर में करोड़ों रुपया लुटा दिया, इसके बावजूद हार गए। अब इन्हें कोन समझाने जाए कि अगर पैसे से चुनाव जीता जा सकता है, तो ‘पटवा’ कब का विधायक बन गए होते।  बाद में जिम्मी के बारे में पता चला कि इन्होंने चुनाव के नाम पर लोगों से इतना चंदा मुंबई में वसूला कि उसका आधा भी खर्च नहीं किया, इसी बहाने ब्लैक मनी को चुनाव में खपा दिया। इन्हें रिएल स्टेट का माफिया भी कहा जाता है। अगर यह रिएल स्टेट का माफिया न होते तो विपिन शुक्ल जैसे महारथी को पांच करोड़ का चूना न लगा पाते, अब इसी से अंदाजा लगा सकते हैं, कि जो व्यक्ति शुक्लजी जैसे कारोबारी को ठग सकता है, वह कितना बड़ा ठग होगा। लोग कहते हैं, कि डाइन भी दो चार घर छोड़ देती है, लेकिन इसने डाइन को भी पीछे छोड़ दिया। इसने गांव वालों को भी जमीन के मामले में करोड़ों रुपये का चूना लगाया, किसी से 18 लाख तो किसी से 20 लाख लिया, बैनामा भी किया, लेकिन जब दाखिल खारिज कराने और कब्जा करने गए तो पता चला कि जमीन ही नहीं है। यहां पर भी इसने उन्हीं अपनों को चूना लगाया, जिनके पास दो नंबर का पैसा है। गांव वालों ने विष्वास करके बिना छानबीन किए, जमीन का बैनामा करा लिया, इस ठगबाज ने गांव के पास सफेदाबाद में फर्जी प्लाटिगं के जरिए करोड़ों कमाया। कहते हैं, कि एक ही जमीन को दो-दो बार दो ग्राहकों को बेचा। कोई सामने इस लिए नहीं आ रहा है, क्योंकि इसने सभी को धमका रखा हैं, पैसा वापस करने का तो आष्वासन देता है, लेकिन पैसा कभी नहीं देता, जिस तरह शुक्लजी से जमीन के बदले दूसरी जमीन का बैनामा करने का वादा किया, लेकिन आज तक बैनामा नहीं किया। उसी तरह गांव वालों के साथ भी इसने किया। बता दें कि जिम्मी और शुक्लजी दोनों बसपा से विधानसभा का चुनाव लड़ चुके है। एक हर्रैया से तो दूसरा कप्तानगंज से। दोनों ने विधायक बनने के लिए आवष्यकता से अधिक धन खर्च किया, चूंकि मेहनत की कमाई का पैसा तो था, नहीं, इस लिए पैसे को पानी की तरह बहाया। क्या आप लोग कभी यह भी सोच सकते हैं, कि कोई व्यक्ति किसी को जमीन के लिए पांच करोड़ देता है, और देने वाला व्यक्ति यह देखने नहीं जाता कि जिस जमीन के लिए वह इतनी बड़ी रकम दे रहा है, वह जमीन हैं, भी की नहीं। जो गलती शुक्लजी ने की वही गलती जिम्मी के गांव वालों ने भी की। आपसी लेन-देन में तो विष्वास करने की गुंजाईश रहती है, लेकिन जमीन के कारोबार में जिसने भी विष्वास किया, वह शुक्लजी और वर्माजी जैसे लोगों ने धोखा खाया। शुक्लजी ने तो एफआईआर भी दर्ज करवा दिया, लेकिन वर्माजी जैसे अन्य लोगों ने एफआईआर तक नहीं दर्ज करवायां, जबकि ठगी 2021 में की गई। पांच साल तक अगर कोई चुप रहता है, तो यह माना जाता है, कि दाल में कुछ काला है। सभी को मालूम हैं, कि ठगी का पैसा सिर्फ और सिर्फ कानूनी प्रक्रिया से ही वापस मिल सकता है, बाबू और भईया कहकर नहीं मिल सकता, और न किसी आष्वासन पर ही मिल सकता, अगर मिल जाता तो वर्माजी सहित अन्य ठगी के शिकार लोगों को पांच साल पहले मिल गया होता।