बस्ती। अगर कोई भुक्तभोगी मरीज सोशल मीडिया पर आकर लाइव में यह कहें, कि जहर खा लेना लेकिन सूर्या हास्पिटल मत जाना तो, समझ लेना चाहिए, यह अस्पताल क्यों पूरे प्रदेष में इतना बदनाम है? सूर्या अस्पताल से मरीजों को बचाने के लिए जिस तरह से कारोबारी हेंमत लोगों से यह अपील कर रहे हैं, कि मेरे वीडियो को खूब वायरल करो, ताकि किसी मरीज को सूर्या अस्पताल से बचाया जा सके। कहते हैं, कि सात दुष्मनों को भी इस अस्पताल में मत ले जाना, वरना मरीज कभी अपने पैरों पर नहीं चल सकेंगा। दुनिया में किसी भी आथर््ाि के सर्जन के पास चले जाना लेकिन सूर्या वाले के पास मत जाना। इस अस्पताल के बारे में अपना अनुभव बताते हुए कहते हैं, कि इस अस्पताल के डाक्टर भगवान नहीं राक्षस है। ठग नहीं महाठग है। कहते हैं, कि यह देश का पहला ऐसा डाक्टर होगा, जिसके पर्चे में पहले ही दवा लिखी रहती है, यह जेनरिक दवाओं को पेटेंड के दर में मरीजों को देता है। इस अस्पताल में मरीजों का जितना शोषण होता है, उतना शायद ही किसी अस्पताल में होता होगा, इसी लिए उपभोक्ता फोरम में सबसे अधिक मुकदमा इसी अस्पताल के डाक्टर्स पर चल रहे है। हर्जाना और जुर्माना भी सबसे अधिक इसी अस्पताल पर लगता है। वायरल वीडियो में कह रहे हैं, इस अस्पताल वाले उनके पैर को ही छोटा कर दिया, मछली बाजार की तरह इस अस्पताल में मरीजों को लेटाया जाता है, डिल मशीन से छेद किया जाता है। कहते हैं, कि छह माह बाद पता चला कि उनके पैर की हडडी तो जोड़ी ही नहीं गई, फैजाबाद गया, वहां के डाक्टर बड़ी मुस्किल से इलाज और आपरेशन करने को तैयार हुए, यहां के डाक्टरों ने भी कहा कि उनके पास सूर्या अस्पताल के ही खराब किए मरीज आते है। हडडी तो जुड़ गई, लेकिन एक पैर छोटा हो गया, उसके बाद हमने अपने मैनेजर को बहुत समझाया लेकिन पिता का आपरेशन करवाने सूर्या में चला गया, पता चला कि पैर ही खराब कर दिया, अब उन्हें दो लोग पकड़कर ले जाते है। आपरेशन के बाद जिस मरीज को अपने पैर में चलना चाहिए, उनमें अधिकांश को बैसागी के सहारे चलना पड़ रहा है। सस्ता समझकर लोग इनके यहां आपरेषन कराने चले जाते हैं, लेकिन आपरेशन के बाद मरीज और उनके परिजन को पता चलता है, कि यह अस्पताल सस्ता है, या फिर मंहगा। इस अस्पताल में सबसे अधिक अजूबे होते हैं, किसी की हडडी का आपरेशन किसी और जगह कर दिया जाता है, आपरेशन के दौरान कैचीं और रुई रह जाना आम बात है। इस अस्पताल में सबसे अधिक लूटपाट होती है। यहां पर मरीजों को मरीज नहीं बल्कि सोने की अंडा देने वाली मुर्गी समझा जाता है। जबतक मरीज और परिजन कंगाल नहीं हो जाते हैं, तब तक यह डिस्चार्ज नहीं करते। चूंकि सबसे पुराने अस्पतालों में इसका नाम होता है, और जिला अस्पताल के पास है, इस लिए अंजाने में मरीज चले जाते हैं, और जो एक बार चला गया, समझो वह बाद में अपनी किस्मत पर रोएगा। इस अस्पताल में पैसे की बरसात होती है, फिर संवेदनशीलता और मानवता नाम की कोई चीज नहीं है। पहले पिता पर आरोप लगता था, और अब पुत्र पर लापरवाही और मरीजों का षोषण करने का आरोप मरीज और उनके परिजन लगा रहे है।