बस्ती। सवाल उठ रहा है, कि भले ही सरकार किन्नरों को मुख्य धारा से जोड़ना चाहती हो, लेकिन जब तक किन्नर नहीं चाहेंगी तब तक इन्हें कोई भी योजना मुख्य धारा से नहीं जोड़ सकती। सवाल यह भी उठ रहा है, क्या किन्नर मुख्य धारा से जुड़ने को तैयार हैं? जाहिर सी बात हैं, कि मुख्य धारा से जुड़ने के लिए उन्हें नेग मांगने की परम्परा को छोड़ना होगा?, जिसे वह आसानी से तैयार नहीं होगीं, क्यों कि जो कमाई नेग मांगने में हैं, वह कमाई मेहनत करके कमाने में नहीं है। यही आकर सरकार की मंषा धूमिल हो सकती है। कहा जा रहा है, कि जिन किन्नरों की आमदनी डेली हजारों में हो, वह आमदनी सामान बेचकर नहीं होगी। जिन किन्नरों को 15-20 मिनट में 40-50 हजार कमाने की आदत हो, क्या वह हजार-दो हजार पर संतोष कर पाएगंी? नेग मांगकर जो ऐशोआराम की जिंदगी जी रही है, क्या वह आठ-दस घंटे दुकान पर बैठ पाएगंी? मुख्य धारा से जुड़ने में सबसे बड़ी समस्या उन किन्नरों के सामने खड़ी होगी, जो 50 साल से अधिक की हो चुकी है। ऐसे में सरकार का स्किल डवलपमेंट योजना का क्या होगा? सरकार और किन्नरों से अधिक समाज इन्हें मुख्य धारा से जुड़ता हुआ देखना चाहती हैं, अनेक लोगों का कहना है, कि जब यह लोग मुख्य धारा से जुड़ जाएगी तो उन लोगों को इनके उत्पीड़न और षोषण से मुक्ति मिल जाएगी। कहते हैं, कि जिस तरह श्राप देने के नाम पर यह लोग शादी-विवाह और बच्चों के जन्म के समय आकर बवाल करती है, और न देने पर नंगा नाच करती है, उसे देखते हुए समाज चाहता है, कि इन्हें जितनी जल्दी हो सके सरकार को मुख्य धारा से जोड़ देना चाहिए। इनकी मांग हजार-दो हजार नहीं बल्कि लाख-पचास हजार की होती है। यह भी सही है, कि गरिमा गृह में वही लोग सेल्टर लेने आएगी जो दूसरे प्रांत की होगीं, इनमें वे किन्नर भी हो सकती है, जो अपराधी प्रवृत्ति की होगीं या फिर अपने प्रांत या जिले में कोई अपराध करके आएगंी। हालांकि इसकी पूरी व्यवस्था की गई है, कि कोई गलत किन्नर, गरिमा गृह का नाजायज लाभ न उठा सके। क्यों कि बहुत सी ऐसी किन्नर हैं, जिनके पास परिचय-पत्र तो होगा, लेकिन वह अपराध करके आई हांेगी। स्थानीय किन्नर तो इसका लाभ नहीं उठा सकती, क्यों कि यहां की लगभग सभी किन्नर आर्थिक रुप से इतना मजबूत हो चुकी है, कि उन्हें शेल्टर होम में रहने की कोई आवष्यकता ही नहीं। बार-बार कहा जा रहा है, कि स्थानीय किन्नर कभी नहीं चाहेंगी  िकवह मुख्य धारा से जुड़े, मुख्य धारा से जुड़ने का मतलब ऐशोआराम की जिंदगी को त्यागना होगा, त्याग इस लिए नहीं सकती क्यों कि इनकी इसे आदत पड़ गई है। ताली बजाकर लोगों की जेबें हल्की करने वाली किन्नर, सबकुछ त्याग सकती है, लेकिन ताली बजाना नहीं त्याग सकती, और जब तक ताली बजाना नहीं छोड़ेगी तब तक इन्हें सरकार चाहें तो भी मुख्य धारा से नहीं जोड़ सकती। दषकों से चली आ रही परम्परा को तोड़ना किसी भी किन्नर के लिए आसान नहीं होगा। कोई या न समझे कि यह मुफलिसी की जिंदगी गुजार रही हैं, कोई भी ऐसी किन्नर नहीं होगी, जिनके घर में दो-तीन एसी न लगी हो, और जिनके पास खुद का चार पहिया वाहन न हो। इन लोगों के पास इतना गहना होता है, कि उतना एक छोटे-मोटे सुनार के पास नहीं होगा। कुछ ऐसी भी किन्नर हैं, जिन्होंने उन किन्नरों का नाम खराब कर दिया, जो जजमान को परेषान और उन्हें लूटने का काम करती है। वहीं पर 60 फीसद ऐसी किन्नर हैं, जो यह समझती और जानती हैं, कि जजमान ही उनके लिए भगवान हैं, ऐसे लोग अपने भगवान रुपी जजमान का मन कभी नहीं दुखी करती, इन्हें जो प्रेम से मिल गया, उसे लेकर खुशी-खुशी आशीर्वाद देकर चली जाती, ऐसे लोग कभी श्राप का डर दिखाकर जजमान को लूटती। देखा जाए तो आज 90 फीसद जजमान लूटपाट करने वाली किन्नरों के उत्पीड़न से दुखी और नाराज हैं, चूंकि घर की महिलाओं में यह घर कर गया है, कि अगर इन लोगों ने श्राप दे दिया तो उनके परिवार का नुकसान हो सकता है, जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है। वैसे भी कहा गया है, कि अगर कोई किसी का मन दुखी करके कुछ लेता है, तो वह कभी सुखी नहीं रहता। अगर यह लोग किसी को श्राप दे सकती है, तो पीड़ित व्यक्ति भी इन्हें श्राप दे सकता है, यह बात जब कुछ किन्नर से कही गई तो उन्होंने भी इसे माना। बहरहाल, कुल मिलाकर गरिमा गृह योजना कितना सफल होगा, यह तो समय ही बताएगा, लेकिन एक बात तो तय मानी जा रही है, कि किन्नर अपनी परम्परा को नहीं तोड़ सकती है। अपवाद स्वरुप एक दो अवष्य हो सकती है।