बस्ती। थाना लालगंज में दिल को दहला देने वाला मुकदमा दर्ज हुआ है। ग्राम नेतुआ के अभिशेक पाल पुत्र पप्पू पाल, रत्नेश पाल उर्फ अंशु पुत्र राजन पाल, प्रभात पाल उर्फ सूरज पाल पुत्र विश्वजीत पाल, आलोक पाल पुत्र पप्पू पाल एवं विनय पाल पुत्र बब्लू पाल के खिलाफ न्यायालय के आदेश  पर इन्द्रमोहन पुत्र सियाराम निवासी बारीघाट थाना लालगंज ने एससीएसटी और लूट सहित अन्य गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज करवाया है। आरोप में कितनी सच्चाई हैं, इसका पता तो पुलिसिया जांच के बाद ही पता चलेगा। इस मामले में लालगंज पुलिस पर पुनः दलित की तहरीर पर मुकदमा दर्ज न करने और आरोपियों को बचाने का आरोप लग रहा है। सवाल उठ रहा है, कि आखिर पुलिस ने इतने गंभीर घटना को क्यों नहीं संज्ञान में लिया? और क्यों नहीं एफआईआर दर्ज किया? क्या पुलिस न्यायालय के आदेश का इंतजार कर रही थी? यही वे सब कारण होते हैं, जिनके चलते पीडितों का विष्वास पुलिस पर से उठता जाता है, और न्यायालय पर बोझ बढ़ता जाता हैं। कहा भी जाता है, कि पुलिस उन्हीं मामलों में रुचि लेती है, जिन मामलों में उनकी रुचि होती है। पुलिस की रुचि वाली भूमिका के चलते न जाने कितने पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पता, और आरोपी का मन बढ़ता है। सीधा सा सवाल हैं, अगर पीड़ित न्यायालय नहीं जाएगा तो उसका एफआईआर नहीं दर्ज होगा, और जब तक एफआईआर दर्ज नहीं होगा, तब तक पीड़ित को न्याय नहीं मिलेगा। पुलिस की इसी लापरवाही के चलते न्यायालयों का बोझ ब़ढ़ता जा रहा है। ध्यान देने वाली बात यह है, कि हर कोई इस लायक नहीं होता कि वह कोर्ट कचहरी के व्यय को वहन कर सकें। बहरहाल, जो मुकदमा दर्ज हुआ  अगर वह सही है, तो नितांत निंदनीय और मानवता को तार-तार करने वाला है। ऐसा लगता है, कि आज भी सामांतों का राज हैं, जिसमें एक दलित के साथ कुछ भी किया जा सकता है, उसे नंगा करके कील लगे बेंत से बेरहमी से मारा सकता है, बेहोशी की हालत में छोड़ा जा सकता हैं, मोबाइल और चार हजार रुपया छीन लिया जा सकता हैं, मोटरसाइकिल को क्षतिग्रस्त करके उसे गढ़ढे में गिरा दिया जा सकता है। जातिसूचक गांलियां दी जा सकती है। कनपटी पर पिस्टल सटाया जा सकता है। इतनी बड़ी घटना के पीछे का कारण पता नहीं चलता, लेकिन इस घटना को लेकर पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ हैं, और लोग सवाल कर रहे हैं, कि क्या किसी दलित को जीने का हक है, कि नहीं? इस तरह की घटनाएं पूरे समाज को झकझोककर रख देती है। पता नहीं उन लोगों को अफसोस हुआ होगा, कि नहीं? जिन लोगों पर आरोप लगाए गए है। इस एक घटना ने पांच बाबू साहबों के भविष्य पर भी सवाल खड़ा कर दिया, जिन धाराओं में मुकदमा दर्ज हैं, उन धाराओं में बिना जेल गए जमानत भी नहीं हो सकती। सवाल उठ रहा है, कि अगर यही मायावती की सरकार होती तो क्या किसी बाबू साहब में इतनी हिम्मत एक दलित को नंगा करने की पड़ती? और क्या लालगंज थाने की पुलिस एफआईआर दर्ज से मना करती? इसी लिए मायावती के कार्यकाल को न सिर्फ याद किया जाता है, बल्कि मायावती की आवष्यकता भी बताई जा रही है, ताकि कोई कानून के साथ खिलवाड़ न कर सके।  

पीड़ित के अनुसार घटना 18 मई 2026 की है। गौरा धुंधा के पास उसे जाति सूचक शब्दों का प्रयोग किया गया, कनपटी पर पिस्टल सटाकर उसे लात मूका थप्पड़ व हाकी से मार पीटकर जबरन घसीटकर फार्चूनर गाडी में बैठा लिया गया, बन्धक बना कर तेनुआ प्राथमिक विद्यालय के पास ले जाया गया, मोबाइल टेक्नो जिसका मो0न0 6362637397 व जेब में रखा 4000 रुपया नकद छीन लिया गया, नंगा करके जातिसूचक गालियां देते हुए कील लगे बेंत से बेरहहमी से मारा पीटा गया, जान से मारने की धमकी दी गई, बेहोशी की हालत में मौके पर छोड़ कर फरार हो गए, मो0सा0 यू0पी 51 ए0एम1964 क्षतिग्रस्त कर लावारिश हालत में गढ्ढे में गिरा दिया गया।