बस्ती। सभी असली/नकली प्रमुखों को पीछे छोड़कर बहादुरपुर के बाप-बेटे ने मिलकर मनरेगा में जिस तरह भ्रष्टाचार का इतिहास रच डाला, उसे तब तक याद किया जब तक कोई ब्लॉक इस ब्लाक के भ्रष्टाचार के रिकार्ड को न तोड़ दे। जो बहादुरपुर पिछले पांच सालों में कभी अंडर फाइव में भी नहीं रहा, उसने कार्यकाल के अंतिम साल में 35.61 करोड़ खर्च करके नंबर वन हो गया। कैसे नंबर वन हो गया, यह बताने की आवष्यकता नही। बनकटी, परसरामपुर, कुदरहा, गौर, कप्तानगंज, सल्टौआ, रामनगर और कुदरहा ब्लाकों के सूरमा प्रमुख वह मकाम हासिल नहीं कर पाए, जिसे बाप और बेटे ने मिलकर हासिल किया। इसके लिए भले ही बेटे के खिलाफ असलहा के बल पर भुगतान कराने के मामले में दो बार एफआईआर दर्ज हुआ, प्रधान संघ की ओर से धरना प्रदर्षन हुआ, इनके भ्रष्टाचार की शिकायतें सीएम तक हुई। लेकिन यह दोनों कभी टारगेट से नहीं भटके, एफआईआर और शिकायतों की परवाह न करते हुए यह दोनों ने वह कर दिखाया, जिसे करने के लिए बड़े-बड़े प्रमुख सपना देखते है। इसका सारा श्रेय पूर्व सांसद हरीश द्विवेदी को जाता, इनके चलते यह खुद तो निपट गए। लेकिन छोड़ गए भ्रष्टाचार में रिकार्ड बनाने को। पिछले पांच साल से कभी बनकटी तो कभी कुदरहा ही नंबर वन रहा। लेकिन जिस तरह बंदूक की नोक पर इतिहास रचा गया, उसका अनुश्रवण करना आने वाले असली/नकली प्रमुख के लिए कठिन नहीं होगा। पिछले साल बनकटी ने 50 करोड़ का आकड़ा छूकर पूरे देश के प्रमुखों को बता दिया, कि भले ही बस्ती पिछड़ा हुआ क्षेत्र हैं, लेकिन भ्रष्टाचार करने में किसी से पीछे नहीं है। सबसे अधिक नंबर वन बनने का रिकार्ड कुदरहा के नाम रहा, यहां के प्रमुख का साथ किस्मत पिछले दो सालों से साथ नहीं दे रही है, वरना, नंबर वन का तमगा किसी और के नाम नहीं होता, इस ब्लॉक के प्रमुख की बदकिस्मती रही कि इन्हें ‘संजय नायक’ जैसा दूबारा बीडीओ नहीं मिला, वरना इनका रिकार्ड तोड़ना बनकटी और बहादुरपुर के नकली प्रमुखों में दम नहीं था।
25-26 में जिले में मनरेगा के नाम पर एक साल में ही तीन अरब 12 करोड़ से अधिक खर्च हो गया। खर्च करने का यह आकड़ा 24-25 में साढ़े चार अरब था, इस तरह देखा जाए तो पिछले पांच साल में जिले में मनरेगा के नाम पर लगभग 20 अरब खर्च हुआ। ध्यान देने वाली बात यह है, कि 20 अरब खर्च हो गए, लेकिन न तो मजदूरों को सौ दिन का रोजगार मिला और न ही कोई ग्राम पंचायत और क्षेत्र पंचायत माडल ही बना। सवाल उठ रहा है, कि आखिर 20 अरब कहां खर्च हुआ, जाहिर सी बात हैं, कि कागजों में काम हुआ और फर्जी भुगतान हुआ। जब ग्राम पंचायतों में 20 अरब का काम नहीं तो फिर यह 20 अरब कहां गए, यह इतना बड़ा सवाल, जिसे पूछने की हिम्मत भाजपा और विपक्ष के नेता नहीं दिखा पाए। बनकटी का खोरिया ग्राम पंचायत अगर हर साल तीन-चार-पांच करोड़ खर्च करेगा तो बनकटी भ्रष्टाचार में नंबर वन बनेगा ही। इस ब्लॉक को नंबर वन बनने का खिताब 24-25 में मिल चुका है। एक अपुष्ट आकड़े के अनुसार 20 अरब में से आधे से अधिक भ्रष्टाचारियों की जेबों में गया, तभी तो कोई गांव माडल नहीं बन पाया। जो 25-26 में तीन अरब 12 करोड़ खर्च हुए, उसमें सात नकली प्रमुखों ने आधे से अधिक यानि एक अरब 90 करोड़ से अधिक यानि 75 फीसद धनराशि मिलकर खर्च किया। इनमें नबर वन बहादुरपुर ने 35.61 करोड़, दूसरा बनकटी 34.32 करोड़, तीसरा परसरामपुर 32.07 करोड़, चौथा हर्रैया 25.26 करोड़, पांचवा गौर 23.10 करोड़, छठां कप्तानगंज 19.57 करोड़ और सातवां सल्टौआ 16.16 करोड़। अब जरा असली प्रमुखों का हाल सुनिए, असली में नंबर वन कुदरहा के प्रमुख रहे, 30.41 करोड़, विक्रमजोत 19.19 करोड़, रुधौली 18.38 करोड़, रामनगर 18.35 करोड़, दुबौलिया 17.51 करोड़, सदर 11.26 करोड़ और सबसे गरीब साउंघाट 10.01 करोड़। इनमें रामनगर के प्रमुख यशंकात सिंह को रुधौली और साउंघाट के प्रमुख अभिषेक कुमार को महादेवा विधानसभा से 27 का चुनाव भी लड़ना है। जाहिर सी बात कि एक चुनाव में कम से कम सात से आठ करोड़ का खर्चा आता है। अगर चुनाव फंस गया तो यह आकड़ा दस करोड़ तक भी पहुंच सकता है। अगर इन दोनों को भाजपा से टिकट मिल गया तो यह खेत बेचकर तो चुनाव लड़ेगें नहीं। पार्टी की ओर से एक करोड़ से अधिक नहीं मिलेगा, बाकी धन या तो चंदा से या फिर चोरी चमारी के रास्ते ही आ सकता है। देखा जाए तो अभिषेक कुमार पिछले पांच सालों में लगभग 50 करोड़ से अधिक मनरेगा में खर्च किया होगा, रही बात यशंकात सिंह की तो इनका आकड़ा लगभग 80 करोड़ होगा। क्षेत्र पंचायत निधि का अगर जोड़ लिया तो लगभग सात आठ करोड़ और खर्च किया होगा।
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